यूरोप का लोकतंत्र खतरे में

लोकतंत्र की जन्मभूमि ग्रीस में पिछले दिनों इसके साथ मज़ाक़ हुआ. लोकतांत्रिक तरीक़े से चुने गए प्रधानमंत्री जॉर्ज पापेंद्रु को इस्ती़फा देने के लिए मजबूर किया गया. पापेंद्रु ग्रीस की समाजवादी पार्टी पासोक के नेता हैं तथा उनके पिता और दादा ग्रीस के प्रधानमंत्री रह चुके हैं. ग्रीस के प्रधानमंत्री की ग़लती यही थी कि उन्होंने आर्थिक संकट से जूझ रहे ग्रीस के क़र्ज़ की वापसी के लिए जनमत संग्रह कराकर जनता को इसमें सहभागी बनाने का प्रयास किया था. यह बहुत ही संवेदनशील मुद्दा था. अगर ग्रीस आर्थिक संकट से जूझ रहा था तो फिर उसे यह अधिकार है कि किस तरह से वह इससे बाहर निकले या वह दिवालिया हो जाए. ऐसा ही आइसलैंड के साथ हुआ था. यह देश बैंकों के दुर्व्यवहार के कारण क़र्ज़ में डूब गया था. इसने अपने नागरिकों से संपर्क किया, जिन्होंने अपने क़र्ज़ वापस करने से मना कर दिया. जनमत संग्रह में विजयी होने के बाद आइसलैंड को बाज़ार द्वारा दंडित किया गया. दो वर्षों की जद्दोजहद के बाद आइसलैंड अपनी अर्थव्यवस्था को पटरी पर ले आया. इसके बाद के मुख्य क़र्ज़दाता ब्रिटेन और नीदरलैंड ने इस देश के क़र्ज़ की पुनर्व्यवस्था की बात स्वीकार कर ली. अब ग्रीस को देखें तो वह यूरोपीय संघ तथा यूरोजोन दोनों का सदस्य है. यूरोप के कई देशों में आए आर्थिक संकट के कारण इस संघ पर दो देशों जर्मनी और फ्रांस की दादागिरी चल पड़ी है. इसका मुख्य कारण यही है कि जर्मनी और फ्रांस की अर्थव्यवस्था पटरी पर है और उसके बैंकों ने ग्रीस को क़र्ज़ दे रखा है. इन दोनों देशों ने सभी नियम-क़ायदों को मानने से इंकार कर दिया, जिसके कारण ग्रीस में जनमत संग्रह नहीं हो सका. यही स्थिति अगर आइसलैंड के साथ होती और ब्रिटेन तथा नीदरलैंड ने इसकी सरकार को ब़र्खास्त कर दिया होता तो विश्व स्तर पर कैसी प्रतिक्रिया हो सकती थी.

ग्रीस और इटली दोनों ही देशों के प्रधानमंत्री निर्वाचित नहीं हैं. यहां तक कि वे संसद के सदस्य तक नहीं हैं, केवल उस देश के नागरिक हैं. दोनों ही अर्थशास्त्री हैं, जिनके ऊपर अपने देश को आर्थिक संकट से उबारने की ज़िम्मेदारी है. यूरोपीय संघ में लोकतंत्र मात्र कुछ देशों की मर्ज़ी पर रह गया है. न तो यहां इस बात का डर है कि जनता सरकार के विरुद्ध उठेगी और न ही इस बात का कि वहां सेना लोकतंत्र के विरुद्ध कोई क़दम उठाएगी. वहां के देशों को संघ के कुछ देशों से डर है.

इसी तरह की घटना इटली में भी घटी. इटली के प्रधानमंत्री सिल्वियो बर्लुस्कोनी को इस कारण जाना पड़ा, क्योंकि इटली के बॉन्ड की साख समाप्त होती जा रही थी. ग्रीस और इटली दोनों ही देशों के प्रधानमंत्री निर्वाचित नहीं हैं. यहां तक कि वे संसद के सदस्य तक नहीं हैं, केवल उस देश के नागरिक हैं. दोनों ही अर्थशास्त्री हैं, जिनके ऊपर अपने देश को आर्थिक संकट से उबारने की ज़िम्मेदारी है. यूरोपीय संघ में लोकतंत्र मात्र कुछ देशों की मर्ज़ी पर रह गया है. न तो यहां इस बात का डर है कि जनता सरकार के विरुद्ध उठेगी और न ही इस बात का कि वहां सेना लोकतंत्र के विरुद्ध कोई क़दम उठाएगी. वहां के देशों को संघ के कुछ देशों से डर है. यूरोपीय संघ असमान देशों का संगठन बनकर रह गया है. अमीर देशों के इस संघ में अधिक अमीर देश यह तय करने लगे हैं कि किस देश पर कौन शासन करेगा. सोचने वाली बात यह है कि आ़खिर ऐसा क्यों हो रहा है.देखा जाए तो इसका प्रमुख कारण वैश्वीकरण है. कुछ लोगों का कहना है कि वैश्वीकरण के इस दौर में कोई भी देश आर्थिक रूप से स्वतंत्र नहीं है. पहले के समय में देश क़र्ज़ लेते थे, लेकिन जब वे इस क़र्ज़ को चुकाने की स्थिति में नहीं होते तो मुद्रा छाप लेते थे और क़र्ज़दाता देशों को धोखा देते थे. लेकिन आजकल ऐसा करना संभव नहीं है, क़र्ज़ प्रायः नागरिकों का पेंशन होता है. वे लोग देशी या विदेशी क़र्ज़दाताओं से क़र्ज़ लेते हैं. यह आधुनिक समय की आवश्यकता है. सरकार आजकल एक बड़ी कंपनी से अधिक कुछ नहीं है तथा इसकी विश्वसनीयता हर दिन बाज़ार तय करती है. कोई भी देश अपनी मर्ज़ी के मुताबिक़ क़र्ज़ ले सकता है, लेकिन इसके बाद उसे आर्थिक संकट का सामना करना पड़ा है. पिछले पंद्रह वर्षों से हम वैश्वीकरण का लाभ उठा रहे हैं. आसनी से क़र्ज़ लेकर खर्च कर रहे हैं. घर बैठे हमें क़र्ज़ मिल जाता है. लेकिन इसका परिणाम क्या होता है. भारत के संदर्भ में देखें तो 1991 के बाद इसकी विकास दर का़फी आश्चर्यजनक रही है. यह वैश्वीकरण के बिना संभव नहीं था. लेकिन देखा जाए तो विकास के साथ-साथ इस पर क़र्ज़ का बोझ भी बढ़ा है. हमारे ऊपर इतना क़र्ज़ है कि हमारे कर राजस्व का एक तिहाई भाग लिए गए क़र्ज़ का ब्याज़ चुकाने में चला जाता है, जो कि ग्रीस से अधिक है. पिछले तीन सालों से भारत में मुद्रास्फीति की दर जीडीपी वृद्धि दर से अधिक रही है. हर दिन इसे कम करने के वायदे किए जाते हैं. अगर भारत का ग्रोथ रेट पांच फीसदी या उससे कम हो गया तो इसे बजट संबंधित संकट का सामना करना पड़ सकता है. अतः भारत को भी सावधान रहना चाहिए तथा ग्रीस आदि देशों से सबक़ लेकर सतर्कता के साथ आगे बढ़ना चाहिए, नहीं तो कुछ भी हो सकता है.