समीक्षा पर घमासान

साहित्य और विवादों का चोली दामन का साथ रहा है. जब से साहित्यिक लेखन की शुरुआत हुई है, तभी से विषयों को लेकर मतांतर भी हैं. उसी मतांतर की परिणति विवादों में होती है. कुछ विवाद घोर साहित्यिक होते हैं, जिनमें सिद्धांतों और तर्कों के­­ आधार पर ज्ञान की दुनिया में जंग लड़ी जाती है. इस जंग के हथियार होते हैं तर्क और उसके पक्ष में दी जाने वाली दलीलें. विश्व की सबसे प्रतिष्ठित और पुरानी पत्रिकाओं में से एक लंदन रिव्यू ऑफ बुक्स के पन्नों पर इन दिनों दो लेखकों में जंग चल रही है. लेकिन लंदन रिव्यू ऑफ बुक्स के पन्नों पर लड़ी जाने वाली जंग साहित्य से हटकर थोड़ी व्यक्तिगत होती जा रही है. दरअसल एलआरबी में जारी विवाद की जड़ में एक समीक्षा है. हॉवर्ड के प्रोफेसर और लोकप्रिय टेलीविज़न इतिहासकार नायल फर्ग्युसन की किताब सिविलाइज़ेशन- द वेस्ट एंड द रेस्ट छप कर आई. भारतीय मूल के लेखक और स्तंभकार पंकज मिश्रा ने उस किताब की लंबी समीक्षा लंदन रिव्यू ऑफ बुक्स में लिखी, जो नवंबर की तीन तारीख़ के अंक में प्रकाशित हुई. पंकज ने अपनी समीक्षा में नायल की किताब की जमकर ख़बर ली. पंकज ने समीक्षा में जो तर्क दिए थे, वे बेहद ही क्रेडिबल और साहित्यिक परंपराओं के आधार पर दिए गए थे. लंदन रिव्यू ऑफ बुक्स में अपनी किताब की विध्वंसात्मक समीक्षा देखकर नायल फर्ग्युसन ने अपना आपा खो दिया. बुरी तरह भड़के नायल ने अगले ही अंक में संपादक के नाम पत्र लिखकर साहित्यिक जंग का ऐलान कर दिया. सत्रह नवंबर के अंक में नायल का एक पत्र प्रकाशित हुआ, जिसमें उन्होंने पहले तो यह हाई मोरल स्टैंड लेते हुए कहा कि वह विध्वंसात्मक समीक्षा के  ख़िला़फ सफाई देने के आदी नहीं हैं, लेकिन अगर समीक्षा में व्यक्तिगत हमले हों तो फिर सामने आना हमारी मजबूरी है. फर्ग्युसन का आरोप है कि पंकज मिश्रा ने उसे रेसिस्ट बताया है, जो निहायत ही ग़लत है. नायल के  मुताबिक़, पंकज मिश्रा ने उनके  लेखन की तुलना अमेरिकी रेसिस्ट सिद्धांतकार थियोडोर स्ट्रोड की 1920 में लिखी गई किताब- द राइजिं टाइड ऑफ कलर अगेंस्ट व्हाइट वर्ल्ड सुपरमेसी लेखन से की है, जो बेहद ही आपत्तिजनक है. नायल ने पंकज पर अपने लेखन को समझ नहीं पाने का आरोप भी जड़ा और कहा कि समीक्षक ने बग़ैर सही परिप्रेक्ष्य में विचार किए उनकी कृति पर सवाल खड़े कर दिए. अपने पत्र में फर्ग्युसन ने पंकज मिश्रा की समीक्षा छापने के लिए लंदन रिव्यू ऑफ बुक्स की भी खासी लानत-मलामत की है. उन्होंने एलआरबी पर लेखन में वामपंथी राजनीति को बढ़ावा देने और अपने दरबारियों को लगातार छापने का भी आरोप लगाया. आरोपों की बौछार करते हुए नायल यहीं नहीं रुके. उन्होंने तो यहां तक कह डाला कि पंकज मिश्रा की उक्त समीक्षा से एलआरबी जैसी प्रतिष्ठित पत्रिका की प्रतिष्ठा का ह्रास हुआ है. नायल ने पत्रिका और पंकज दोनों से मा़फी मांगने की भी मांग की. विवाद का क़िस्सा यहीं ख़त्म नहीं होता है और उसी अंक में पंकज ने नायल के  आरोपों का तुर्की-ब-तुर्की जवाब देते हुए अपने तर्कों को सही साबित किया है. मा़फी न तो पंकज ने मांगी, न ही पत्रिका ने. हां, पंकज ने इतना ज़रूर सा़फ कर दिया कि उन्होंने नायल पर रेसिस्ट होने का आरोप नहीं लगाया.

दरअसल साहित्यिक विवादों के इतिहास पर अगर हम नज़र डालें तो हिंदी में भी विवादों का एक समृद्ध इतिहास रहा है. पांडे बेचन शर्मा उग्र के लेखन के बाद उठे चॉकलेट विवाद में तो गांधी जी तक को दख़ल देना पड़ा था. कल्पना में उर्वशी विवाद लंबे समय तक चला था. हाल में राजेंद्र यादव के लेख होना सोना पर भी हिंदी साहित्य में बवाल मचा था. विभूति नारायण राय तो छिनाल विवाद में बुरी तरह फंसे ही थे. छिनाल विवाद हिंदी में लंबे अरसे तक चला था. लेकिन साहित्य के मामले कोर्ट कचहरी तक नहीं पहुंचते हैं. का़फी समय पहले उदय प्रकाश और रविभूषण के विवाद में भी कोर्ट कचहरी की धमकी दी गई थी. हाल में हंस और उसके स्तंभकार भारत भारद्वाज को भी महादेवी सृजन पीठ में बटरोही की भूमिका को लेकर अदालती नोटिस मिला था, लेकिन मामला कोर्ट तक पहुंचा नहीं था.

अगले अंक में फिर दोनों के पत्र छपे, जिनमें तर्कों और प्रति तर्कों के आधार पर दोनों ने अपना पक्ष रखा है. पंकज मिश्रा ने सा़फ तौर पर कहा है कि अपनी समीक्षा में उन्होंने वैज्ञानिक आधार पर नायल के लेखन की आलोचना की है, उन पर किसी भी तरह का कोई व्यक्तिगत हमला नहीं किया. अगर बात सभ्यताओं की हो रही है, तो भारत और चीन की सभ्यताओं को तो खासी तवज्जो देनी ही होगी. अगर बग़ैर इन सभ्यताओं को ध्यान में रखकर कोई लेखन होगा, तो उस पर सवाल तो खड़े होंगे ही. उन्होंने यह सवाल भी उठाया है कि क्या महात्मा गांधी के बिना पिछली सदी की सभ्यता का मूल्यांकन किया जा सकता है. क्या पिछले कई दशकों के इतिहास में चीन की उत्पादन क्षमता और भारतीय टेक्नोक्रैट के योगदान को नज़रअंदाज़ किया जा सकता है. पंकज मिश्रा ने तर्कों के  आधार पर यह साबित भी किया है कि यह नहीं हो सकता. लेकिन नायल अब भी पत्रिका और पंकज दोनों से मा़फी की मांग पर अड़े हैं. कुछ दिनों पहले तो उन्होंने कोर्ट में जाने की धमकी भी दी थी. लेकिन लंदन रिव्यू ऑफ बुक्स मज़बूती के साथ पंकज मिश्रा के लेखन के साथ खड़ा है. दोनों मा़फी नहीं मांगने और अपने स्टैंड पर अड़े हुए हैं.

दरअसल साहित्य में इस तरह के विवाद नए नहीं हैं. नोबेल पुरस्कार प्राप्त लेखक वी एस नायपॉल और अमेरिका के वरिष्ठ लेखक पॉल थेरू के बीच के लंबे विवाद को अब तक अंग्रेजी साहित्य में याद किया जाता है. इसके अलावा नायपॉल की महिला लेखिकाओं पर की गई टिप्पणियों पर भी खासा विवाद हुआ था. जब सर विद्या ने जान ऑस्टिन के लेखन की संवेदनात्मक महत्वाकांक्षा की आलोचना करते हुए कह डाला था कि किसी महिला लेखक के लेखन में धार नहीं होती. उसी तरह विद्या ने ई एम फोस्टर को भी शक्तिहीन समलैंगिकों से अनुचित लाभ लेने वाला बताकर और उनके उपन्यास अ पैसेज टू इंडिया को बकवास क़रार देकर अंग्रेजी साहित्य में भूचाल ला दिया था. इसके  बाद हेलन ब्राउन से लेकर एलेक्स क्लार्क तक जैसे लेखकों ने विद्या पर जमकर हमले किए थे और विवाद का़फी लंबा चला था. अंग्रेजी में इस तरह के विवाद स़िर्फ साहित्य में ही नहीं, बल्कि विज्ञान, दर्शन, राजनीतिक लेखन में लंबे समय से चलते रहे हैं. इन विवादों पर कई किताबें भी छप चुकी हैं.

लेकिन इस बार नायल और पंकज मिश्रा के बीच का विवाद थोड़ा अलग है. यह विवाद इस मायने में थोड़ा अलग है कि एक तो इसमें रेसिज्म का आरोप लगा है और दूसरे अदालत में जाने की धमकी है. अंग्रेजी साहित्य पर नज़र रखने वाले कई स्वतंत्र पर्यवेक्षक इस साहित्यिक लड़ाई को एक दूसरे परिप्रेक्ष्य में भी देख रहे हैं. पिछले एक दशक से जिस तरह से एशियाई मूल के नए लेखकों ने अंग्रेजी साहित्य में अपनी दख़ल और पैठ दोनों बढ़ाई है, उससे पश्चिमी लेखकों का एक खेमा का़फी क्षुब्ध रहने लगा है. जब कई एशियाई मूल के लेखकों को पुलित्जर और मेन बुकर पुरस्कार मिलने लगे थे, तो एक प्रसिद्ध अंग्रेजी लेखक ने एलेक्स ब्राउन से मज़ाक में कहा था- वी फील थ्रेटंड. इन तीन शब्दों में पश्चिमी लेखकों की मानसिकता को समझा जा सकता है. वी फील थ्रेटंड की जो मानसिकता है, वही अपनी आलोचना बर्दाश्त करने से न केवल रोकती है, बल्कि विरोधियों के प्रति आक्रामक भी बनाती है.

दरअसल साहित्यिक विवादों के इतिहास पर अगर हम नज़र डालें तो हिंदी में भी विवादों का एक समृद्ध इतिहास रहा है. पांडे बेचन शर्मा उग्र के लेखन के बाद उठे चॉकलेट विवाद में तो गांधी जी तक को दख़ल देना पड़ा था. कल्पना में उर्वशी विवाद लंबे समय तक चला था. हाल में राजेंद्र यादव के लेख होना सोना पर भी हिंदी साहित्य में बवाल मचा था. विभूति नारायण राय तो छिनाल विवाद में बुरी तरह फंसे ही थे. छिनाल विवाद हिंदी में लंबे अरसे तक चला था. लेकिन साहित्य के मामले कोर्ट कचहरी तक नहीं पहुंचते हैं. का़फी समय पहले उदय प्रकाश और रविभूषण के विवाद में भी कोर्ट कचहरी की धमकी दी गई थी. हाल में हंस और उसके स्तंभकार भारत भारद्वाज को भी महादेवी सृजन पीठ में बटरोही की भूमिका को लेकर अदालती नोटिस मिला था, लेकिन मामला कोर्ट तक पहुंचा नहीं था.

(लेखक IBN7 से जुड़े हैं)