कोई भी पूंजीवादी उद्योगपति, किसी भी देश का वासी क्यों न हो, अपनी पूंजी तब ही लगाएगा, जब उसे उसकी सुरक्षा और उससे लाभ होने का पूरा विश्वास हो. अगर भारत सरकार की नीति उद्योगों के राष्ट्रीयकरण की रही तो कोई भी बाहरी पूंजीवादी अपना एक रुपया भी भारत में नहीं लगाएगा. यह शंका सर्वथा निर्मूल तो नहीं है, पर ग़लत आधारशिला पर स्थित है. कोई भी पूंजीवादी तब तक अपने देश से बाहर जाकर रुपया नहीं लगाएगा, जब तक उसे अपने देश में मौक़ा मिलता रहे. विश्व में कोई भी देश परिपूर्ण हो नहीं पाया है और कभी हो भी नहीं सकता. प्रत्येक देश में पूंजी लगाने के और उससे लाभ कमा सकने के अनेक क्षेत्र खुले पड़े हैं, फिर भी ये विदेशी पूंजीपति भारत में या अन्य पिछड़े हुए देशों में क्यों अपनी पूंजी लगाते हैं, यह विषय परीक्षण करने योग्य है. सृष्टि के आदि से लेकर आज तक मानव-मानव का संघर्ष होता आया है. यह संघर्ष अवश्यंभावी है. चाहे वह संघर्ष साम्राज्य विस्तार की लिप्सा से हो, चाहे अपने धर्म या मत प्रचार के लिए हो, चाहे अर्थमूलक हो, संघर्ष चलता ही रहेगा और चलता ही रहता है.
एक और महत्वपूर्ण प्रश्न इसी दौरान में उठता है. वह है, भारत के पूंजीवादी उद्योगपतियों का यहां से विदेशों में धन भेज देना. यहां के धनिकों को जब यह शंका हुई कि सरकार शायद जमीन, जायदाद और राष्ट्रीयकरण कर लेगी, क्योंकि समाजवादी अर्थव्यवस्था को सरकार मान्यता दे चुकी है तो ये धनिक आशंकित और भयभीत हो उठे. अंग्रेजी सरकार का सहारा सिर पर से उठ ही चुका था. अब क्या करें? वे घबरा गए. बहुतों ने, खास करके राजा-महाराजाओं ने, असंख्य धन, सोना, हीरे, जवाहरात के रूप में या अन्य तरीक़ों से विदेशों में भेज दिया.
गत महायुद्ध में जर्मनी के हिटलर और इटली के मुसोलिनी की तानाशाही से आतंकित होकर बाक़ी देशों ने उनके विरुद्ध युद्ध किया. परिणाम सामने है. आज शांति स्थापित हुए 14 वर्ष बीत गए, पर क्या सही माने में इसे शांति कह सकते हैं? आज दो प्रधान खेमों के बीच का भयानक विस्फोट विश्वयुद्ध में परिणत होने को है. एक ओर है, सोवियत रूस द्वारा संचालित साम्यवाद, जिसमें चीन, चेकोस्लोवाकिया, पोलैंड, हंगरी इत्यादि अनेक देश शामिल हैं. दूसरी तऱफ अमेरिका के नेतृत्व में प्रजासत्तात्मक गणतंत्र राज्य है, जिसमें इंग्लैंड, फ्रांस, जर्मनी इत्यादि देश शामिल हैं और जिनको पूंजीवाद का पोषक माना जाता है. इन दोनों तथाकथित वादों में साम्यवाद और पूंजीवाद में ज़बरदस्त संघर्ष है. दोनों ही दल अपनी-अपनी शक्ति बढ़ाने में प्रयत्नशील हैं. मानव मस्तिष्क के जितने भी विनाशक अणु हैं, उनका पूरा-पूरा उपयोग किया जा रहा है. परमाणु बम, हाइड्रोजन बम इत्यादि भयानक अस्त्र इसी तरह की मनोवृत्ति की देन हैं. दोनों दल बाज़ी लगाकर बैठे हैं कि इस पृथ्वी भर का नाश कौन कितनी जल्दी कर सकता है. इसी प्रतियोगिता में सौर मंडल के दूसरे ग्रहों पर आक्रमण करने की भी होड़ लगी हुई है. अगर सोवियत रूस ने चंद्र लोक पर पहले राकेट या स्पूतनिक भेज दिया तो अमेरिका मंगल ग्रह पर पहले पहुंचने की फिक्र में है. बात देखने-सुनने में आश्चर्यजनक और परियों की ख्याली कहानी दिखाई देती है, पर है यह सच. आज विश्व में अपनी-अपनी शक्ति की माप-तौल बढ़ाने में दोनों पक्ष जोर-शोर से लगे हुए हैं. इसी तरह अपने-अपने पक्ष को ज़्यादा पुष्ट या ताक़तवर बनाने के लिए दोनों ही दल ज़्यादा से ज़्यादा प्रयत्न कर रहे हैं.
चीन की जनसंख्या भारत से कहीं ज़्यादा है. वहां की आर्थिक और सामाजिक स्थिति भारत से कोई अच्छी नहीं थी. फिर भी जब सोवियत रूस वाले साम्यवाद के पक्ष में वह देश शामिल हो गया तो विकास और उद्योगीकरण अल्पकाल में ही संभव हो गया. क्या सोवियत रूस ने यह सारी सहायता दया या कृपा करके दी? कदापि नहीं, अपने स्वार्थ-साधन के लिए ही एक देश दूसरे देश को आर्थिक या सैनिक सहायता प्रदान करता है. भारत जबसे स्वतंत्र हुआ है, दोनों ही खेमे वाले इस प्रयत्न में हैं कि भारत उनके खेमे में शामिल हो. सौभाग्यवश इस देश का संविधान प्रजातंत्रात्मक गणतंत्र है और इसके प्रधानमंत्री पंडित जवाहर लाल नेहरू हैं. वह किसी भी पक्ष में शामिल नहीं हुए हैं, न अपने देश को ही किसी गुट में शामिल होने दिया. यही कारण है कि आर्थिक सहयोग भारत को दोनों में से किसी पक्ष से भी पर्याप्त मात्रा में नहीं मिल रहा है.
जर्मनी युद्ध में पराजित और ध्वस्त हो गया था और वह आज भी दो भागों में विभक्त है. एक भाग पश्चिमी पावर ब्लॉक अमेरिका के अधीन है. वह इतनी ज़्यादा तरक्की कर चुका है, जितनी वह ताकत के चरम शिखर पर भी नहीं कर सका था. सोवियत रूस के अधीन जर्मनी का जो भाग है, वहां भी प्रगति भारी परिमाण में हुई है. ऐसा दावा किया जाता है, हालांकि उसका पूरा विवरण प्राप्त नहीं है. कहने का तात्पर्य यह है कि कोई भी विदेशी ताक़त भारत को आर्थिक सहायता देती है तो वह भारत पर कोई उपकार नहीं करती. वे अपने पक्ष का समर्थन बढ़ाने के उद्देश्य से ही ऐसा करते हैं और अगर भारत खुल्लमखुल्ला एक पक्ष का समर्थन करने लग जाए तो उसे पर्याप्त आर्थिक सहायता मिल सकती है. अमेरिका आदि पाश्चात्य देशों का विकास पर्याप्त मात्रा में हो चुका है. उनके उसूल प्रजातांत्रिक गणतंत्र के हैं. अतएव भारत के संविधान द्वारा निर्देशित नीति के वह ज़्यादा निकट हैं. पर किसी शक्ति-गुट में शामिल हों या न हों, यह तो राजनीतिक प्रश्न है, जिसके बारे में कुछ कहने से विषयांतर की संभावना है. कहना इतना ही है कि भारत को अपने विकास के लिए अगर विदेशी आर्थिक सहायता अपेक्षित है ही तो, वह मिले अथवा न मिले, सिद्धांतों का हनन तो कदापि नहीं करना चाहिए. अगर भारतीय जनता के हित में यह है कि तमाम मुख्य उद्योगों का राष्ट्रीयकरण होना ही चाहिए तो स़िर्फ इसी आपत्ति से कि विदेशी सहायता नहीं मिलेगी, राष्ट्रीयकरण रुकना नहीं चाहिए.
एक और महत्वपूर्ण प्रश्न इसी दौरान में उठता है. वह है, भारत के पूंजीवादी उद्योगपतियों का यहां से विदेशों में धन भेज देना. यहां के धनिकों को जब यह शंका हुई कि सरकार शायद जमीन, जायदाद और राष्ट्रीयकरण कर लेगी, क्योंकि समाजवादी अर्थव्यवस्था को सरकार मान्यता दे चुकी है तो ये धनिक आशंकित और भयभीत हो उठे. अंग्रेजी सरकार का सहारा सिर पर से उठ ही चुका था. अब क्या करें? वे घबरा गए. बहुतों ने, खास करके राजा-महाराजाओं ने, असंख्य धन, सोना, हीरे, जवाहरात के रूप में या अन्य तरीक़ों से विदेशों में भेज दिया. वहां यह धन ब्याज कमा रहा होगा या यों ही बेकार पड़ा होगा, पर यह निश्चित है कि ऐसा धन जो विदेशों में भेजा गया है, वह भारत के साथ वैमनस्यपूर्ण परिणाम प्रस्तुत करता है. राष्ट्र का कर्तव्य है कि क़ानूनन इस तरह के कामों को अवैध ही करार न करे, बल्कि उन्हें बाध्य करे कि जो धन वे विदेशों में ले गए हैं, उसे वे लौटा लें और इस तरह की चेष्टाओं का अंत करने के लिए उच्चस्तरीय तात्कालिक सख्त क़दम उठाए जाएं.
महावीर प्रसाद आर मोरारका का जन्म 12 अगस्त, 1919 को नवलगढ़ (झुंझनू) राजस्थान में हुआ था. उद्योगपति, स्वप्नदृष्टा और लेखक से कहीं अधिक वह उदात्त मानवीय मूल्यों के संवाहक थे. उनकी गणना भारत के प्रमुख उद्योगपतियों में की जाती है.
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