सरकार को जनता के बीच जाना चाहिए

यह बड़ी राहत की बात है कि सरकार ने खुदरा क्षेत्र में विदेशी कंपनियों को लाने (एफडीआई) के अपने निर्णय को फिलहाल स्थगित कर दिया है. इस पर कॉरपोरेट सेक्टर और शेयर बाज़ार की प्रतिक्रिया प्रतिकूल रही. विभिन्न कारणों से सरकार भारी दबाव में है. यही वजह है कि सरकार की निर्णय प्रक्रिया अगर स्थगित नहीं भी हुई है तो धीमी ज़रूर पड़ गई है. कॉरपोरेट सेक्टर ने स्पष्ट रूप से कहा है कि सरकार निर्णय लेना शुरू करे. ज़ाहिर है, कॉरपोरेट सेक्टर जो निर्णय देखना चाहता है, उसमें वह खुदरा क्षेत्र में एफडीआई और ऐसी नीतियां चाहता है, जिन्हें आम तौर पर सुधार के रूप में देखा जाता है.

हर एक बदलाव सुधार नहीं माना जा सकता है. इस बात में कोई संदेह नहीं है कि अभी अर्थव्यवस्था में मंदी है, कुछ अपनी समस्याओं की वजह से तो कुछ यूरोप और अमेरिका में आए संकट की वजह से. सरकार को इस समस्या के समाधान के लिए क़दम उठाने ही होंगे. देश का मध्य वर्ग रोज़मर्रा की ज़रूरतों वाली वस्तुओं, फल, सब्जी और अनाज की बढ़ती क़ीमतों से परेशान है. दूसरी ओर देश में अनाज का रिकॉर्ड भंडार है. इसलिए अनाज के बढ़ते दामों पर कोई भी सफाई समझ में नहीं आती. सरकार को चाहिए कि वह तुरंत अपने भंडार से अनाज बाहर निकाले, ताकि अनाज की क़ीमतों को नीचे लाया जा सके. हालांकि इससे राजकोषीय घाटा बढ़ सकता है, लेकिन अभी सबसे ज़्यादा ज़रूरत इस बात की है कि आम आदमी को राहत मिलनी चाहिए.

हर एक बदलाव सुधार नहीं माना जा सकता है. इस बात में कोई संदेह नहीं है कि अभी अर्थव्यवस्था में मंदी है, कुछ अपनी समस्याओं की वजह से तो कुछ यूरोप और अमेरिका में आए संकट की वजह से. सरकार को इस समस्या के समाधान के लिए क़दम उठाने ही होंगे. देश का मध्य वर्ग रोज़मर्रा की ज़रूरतों वाली वस्तुओं, फल, सब्जी और अनाज की बढ़ती क़ीमतों से परेशान है. दूसरी ओर देश में अनाज का रिकॉर्ड भंडार है.

बढ़ती जनसंख्या को देखते हुए इस व़क्त कृषि के क्षेत्र में भारी निवेश की ज़रूरत है, ताकि अनाज एवं अन्य खाद्य पदार्थों की कमी न हो. कॉरपोरेट सेक्टर स़िर्फ अपने क्षेत्र की बात कर रहा है, यह भी महत्वपूर्ण है, लेकिन भारत जैसे कृषि प्रधान देश और कृषि आधारित अर्थव्यवस्था में अकेले कोई एक क्षेत्र पूरी अर्थव्यवस्था को मज़बूत नहीं बना सकता, जब तक कि साल दर साल कृषि क्षेत्र में विकास नहीं होगा. संसाधनों के अभाव में सिंचाई के लिए नहरें और अन्य परियोजनाएं किसी तरह चल रही हैं. कुछ राज्य बेहतर कर सकते हैं, लेकिन यह मसला पूरे देश का है. महाराष्ट्र में 70 फीसदी पानी स़िर्फ गन्ना उत्पादन के लिए खर्च कर दिया जाता है. ऐसे में अन्य फसलों का क्या होगा? क्या एक कमज़ोर और मृतप्राय: सरकार इस सबको रोक पाने में सक्षम होगी? सरकार के पास एक और विकल्प है कि वह जनता के बीच जाए, मध्यावधि चुनाव हो, ताकि एक नए जनादेश के साथ बनी सरकार विभिन्न मुद्दों और विसंगतियों का समाधान निकाल सके. अगर ऐसा नहीं होता है और सब कुछ यूं ही 2014 तक चलता रहा तो यह इस देश की जनता और ख़ुद इस देश के लिए भी नुक़सानदेह साबित होगा.