हिन्दी फिल्में मुंबई तक सीमित नहीं

कई फिल्मों में अभिनय कर चुके अरविंद टाइटलर का नाम ताजनगरी आगरा में काफी जाना-पहचाना है. कृष्णा तेरे देश में, एक रात का मेहमान, साया, द शैडो, तीसरी चाल एवं ताजमहल जैसी फिल्मों के अलावा टीवी धारावाहिक तफ्तीश और भोजपुरी एलबम नाचे मयूरी में अपने अभिनय का लोहा मनवा चुके अरविंद से पिछले दिनों एक लंबी बातचीत हुई. पेश हैं मुख्य अंश:-

आजकल आप लगातार फिल्में कर रहे हैं….

मुझे कला के क्षेत्र में काफी समय हो गया है. पहले मैं शौकिया तौर पर फिल्मों से जुड़ा हुआ था, मगर अब इसे अपना करियर बना लिया है. इस व़क्त मेरे पास चार-पांच फिल्में हैं, जिनमें एक भोजपुरी फिल्म भी शामिल है.

आप स़िर्फ खलनायक का रोल करना क्यों पसंद करते हैं?

यह सच नहीं है. दरअसल, कलाकार की एक छवि बन जाती है. मेरी शुरुआत खलनायक के सपोर्टिंग रोल के साथ हुई थी. अब मैं मुख्य खलनायक का रोल कर रहा हूं. ऐसी भूमिकाएं मुझे सूट करती हैं. वैसे मैं हर तरह की भूमिकाएं कर सकता हूं. कलाकार स़िर्फ कलाकार होता है.

अभिनय का शौक कैसे हुआ?

मुझे बचपन से ही अभिनय का शौक था. पिता जी चाहते थे कि बड़ा होकर मैं आईपीएस अफसर बनूं, मगर मेरी मां ने मुझे हमेशा सपोर्ट किया. मां के आशीर्वाद और मेरे शौक ने ही मुझे यहां तक पहुंचाया.

हिंदी फिल्मों के लिए आप मुंबई क्यों नहीं गए?

हिंदी फिल्मों का दायरा अब मुंबई तक सीमित नहीं है. पश्चिमी उत्तर प्रदेश में प्रत्येक वर्ष अनेक फिल्मों की शूटिंग होती है. इस दिशा में नोएडा और आगरा अपनी एक खास पहचान बना चुके हैं.

अभिनय के क्षेत्र में सफलता का सूत्र क्या है?

सफलता का कोई तयशुदा फॉर्मूला नहीं होता. काफी लोग अभिनय करने मुंबई जाते हैं, लेकिन उन्हें मौक़ा नहीं मिल पाता. मैंने भी संघर्ष किया, लेकिन फिल्मों में अभिनय के लिए मुंबई का रुख नहीं किया. मैंने सोच लिया था कि पहले पहचान बनाऊंगा, उसके बाद करियर को आगे बढ़ाना है. मेरे पास ऑफर मुंबई से भी आ चुका है, बात बनी तो आप मुझे वहां भी काम करते हुए देखेंगे.

भविष्य की क्या योजनाएं हैं?

योजनाएं तो बहुत सारी हैं, पर उन्हें अमलीजामा पहनाना आसान नहीं है. फिल्म बनाने की योजना है, लेकिन पता नहीं, वह दिन कब आएगा.

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