ये मुख़बिरों की बस्ती है

देश में आज भी धर्म और जाति के आधार पर बस्ती, पारा और मोहल्लों का बसना और इनकी पहचान न स़िर्फ मौजूद है, बल्कि स्वीकार्य भी है. परंतु इसी देश में मु़खबिरों की एक बस्ती भी है, यह सुनकर कोई भी चौंक सकता है. यह बस्ती न तो हमारे देश की सीमा पर कहीं गुप्त रूप से बसी है और न ही यहां बसने वाले किसी अन्य देश के नागरिक हैं, बल्कि बस्तर के नारायणपुर ज़िले में मौजूद इस बस्ती में वे आदिवासी रहते हैं, जो नक्सलियों की नज़र में पुलिस के खबरी हैं. ज़ाहिर है, जिसने यह बताया, उसने इसका इतिहास भी बताया.

छत्तीसगढ़ के बस्तर डिवीज़न में नारायणपुर 2007-08 में नया ज़िला बनकर उभरा है. इसके दो ब्लॉक नारायणपुर और अबूझमाड़ हैं. म़ुखबिरों की बस्ती के बाशिंदे इसी माड़ अर्थात अबूझमाड़ से भागकर आए हैं. इस बस्ती में कोई दस दिन पहले आया था, तो किसी को आए हुए दो माह हुए हैं. नारायणपुर शहर के बाज़ार के पीछे दो-तीन छोटे-छोटे टीले हैं और खुले विस्तृत मैदान में यह बस्ती या कह लें कि बस्तियां बसती जा रही हैं. ये वे लोग हैं, जिनसे नक्सलियों का विश्वास उठ गया या जो उनके साथ जाना नहीं चाहते हैं. आज यह स्थिति है कि मु़खबिरों की बस्ती तो बस गई, पर वे अब मु़खबिर नहीं रहे, लेकिन फिर भी बस्ती मु़खबिरों की ही कहलाती है.

नारायणपुर शहर के बाज़ार के पीछे दो-तीन छोटे-छोटे टीले हैं और खुले विस्तृत मैदान में यह बस्ती या कह लें कि बस्तियां बसती जा रही हैं. ये वे लोग हैं, जिनसे नक्सलियों का विश्वास उठ गया  या जो उनके साथ जाना नहीं चाहते हैं. आज यह स्थिति है कि मु़खबिरों की बस्ती तो बस गई, पर वे अब मु़खबिर नहीं रहे, लेकिन फिर भी बस्ती मु़खबिरों की ही कहलाती है. अबूझमाड़ में चारों तऱफ पहाड़ों की श्रृंखलाबद्ध कतारें और घना जंगल है. स्वतंत्र भारत में इस क्षेत्र का आज तक किसी भी तरह का सर्वे नहीं हुआ. वाक़ई अबूझमाड़ आज तक अबूझ है, किंतु पहाड़ों की नीलाभ आभा संकेत देती है कि ये लोहे के पहाड़ हैं, हज़ारों हेक्टेयर में फैले जंगल में बेशक़ीमती इमारती लकड़ियां हैं.

अबूझमाड़ में चारों तऱफ पहाड़ों की श्रृंखलाबद्ध कतारें और घना जंगल है. स्वतंत्र भारत में इस क्षेत्र का आज तक किसी भी तरह का सर्वे नहीं हुआ. वाक़ई अबूझमाड़ आज तक अबूझ है, किंतु पहाड़ों की नीलाभ आभा संकेत देती है कि ये लोहे के पहाड़ हैं, हज़ारों हेक्टेयर में फैले जंगल में बेशक़ीमती इमारती लकड़ियां हैं. साथ हीजड़ी- बूटियों के साथ एक अद्भुत संस्कृति है, जिसकी हम कल्पना भी नहीं कर सकते हैं. इन बस्तियों में अबूझमाड़ के अलग-अलग गांवों से आए आदिवासी बसे हैं. हम जैसे ही इस बस्ती में पहुंचे, लोग घरों में घुस गए और दरवाज़ों तथा खिड़कियों से जांचने और परखने लगे. वैसे भी हमारी दुनिया से दूर रहने वाले इन भोले-भाले आदिवासियों में का़फी झिझक होती है. हम जानते थे कि झिझक टूटेगी और हुआ भी वही, पहले गांव-घर, खेतीबाड़ी और सुख-दुख की बातें होती रहीं. वे भी जानते थे और हम भी कि जिस जख्म को कुरेदना है, उसे पहले सहलाया जाता है. एक बार इसे छुआ तो बस बहता ही चला गया.

मैली-कुचैली साड़ी में लिपटी वह तरुणी भरसक प्रयास करने के बाद भी भर आए गले को नियंत्रित करते हुए रुआंसे स्वर में बोली मूसा के दगार (चूहे के बिल) में रह रहे थे. जब देखो तो मारपीट, रोज की बेगारी से अच्छा यहां है, आधा पेट रहे या पूरा कम से कम शांति से तो रहते हैं. बस मारपीट के डर से भाग आए. बहुत देर से खामोश बैठा एक अधेड़ किसान फूट पड़ा-जब देखो काम धंधा छोड़कर मीटिंग में जाओ, घंटों खाली सुनना भर है, बोलना नहीं. क्या बोलते हैं मीटिंग में? यही कि इसको तोड़ना है, वहां हमला करना है, यह ट्रेनिंग, वह ट्रेनिंग. अपना काम धंधा, खेतीबाड़ी छोड़कर कितने दिन खाली रहेंगे. अपने ही खेत में बेगारों की तरह काम करना पड़ता था. जो फसल होती थी, उस पर नक्सलियों का क़ब्ज़ा होता था. सरकारी राशन से जो मिलता था आधा वे ले जाते थे. उनके खौ़फ से वह भी बंद हो गया था. गांव में अब न स्कूल है, न अस्पताल और न ही कोई अन्य सुविधा बाक़ी रहने दी गई. कब तक सहते? उन लोगों ने जो कुछ बताया, उसके अनुसार अब अधिकांश गांव में वही लोग बचे हैं, जिनकी या तो कोई मजबूरी है या फिर वह पूरी तरह से उनके साथ हैं.

मु़खबिरों की सूचना यदि सही है तो अबूझमाड़ में नक्सलियों का राज चलता है. शासन-प्रशासन स़िर्फ ओरछा ब्लॉक और सोनपुर गांव तक ही है. इसके आगे उनकी सरहद है, जहां से स़िर्फ आगे पैदल रास्ता है. पूरे माड़ में उनके कैंप हैं, कुछ कैंप तो ऐसे हैं, जहां बरसों से उनके साथ जुड़े सामान्य आदिवासी भी नहीं जा सकते हैं. अति गोपनीय इन अड्डों के चारों ओर लैंडमाइंस बिछी हैं. अंदर हर सुविधा मौजूद है और विदेशों से लोगों का अबाध रूप से आना-जाना लगा रहता है. मु़खबिरों की इसी बस्ती से थोड़ी दूर पर एक और बस्ती है, जो कंटीले तारों से घिरी है. जहां चौबीसों पहर भारी सुरक्षा व्यवस्था रहती है. इसमें क़रीब तीस-चालीस घर हैं. इनमें खास म़ुखबिर रहते हैं, जिन्हें एसपीओ कहा जाता है. ये पुलिस और सुरक्षा बलों के साथ गश्त पर अंदर जाते हैं और उन्हें रास्ता दिखाते हैं. बातचीत में उसने बताया कि पुलिस से ज़्यादा तगड़ी ट्रेनिंग नक्सलियों की है. उनके पास ज़्यादा अच्छे और आधुनिक हथियार हैं और उनके म़ुखबिर ज़्यादा चुस्त हैं.

म़ुखबिर, खबरी, भेदिया या अंग्रेजी में कहें तो इनफॉर्मर, जिसका शाब्दिक अर्थ तो यही होता है पुलिस को सूचना देने वाला, किंतु मर्म को छू लेने वाला अर्थ तो है यातना. गांव-घर अपनों से छूटने और बिछड़ने की यातना. हमेशा संदेह के साथ जीने की पीड़ा. इस मर्मांतक पीड़ा को तो वही महसूस कर सकता है जिस पर लोगों का विश्वास उठ गया है. ज़ाहिर है, जो लोग बरसों से शांति के साथ जी रहे इन आदिवासियों को नकार सकते हैं, वे भला वह इस देश की संप्रभुता को कैसे स्वीकार्य कर लेंगे. देश की आंतरिक सुरक्षा के लिए लगातार चैलेंज बनते जा रहे नक्सली शक्तियों से निपटने के लिए ज़रूरत है, एक मज़बूत राजनीतिक इच्छाशक्ति की. लेकिन कड़वा सच तो यह है कि वोट बैंक की राजनीति जब तक समाप्त नहीं होगी तब तक नक्सलियों पर लगाम कसना संभव नहीं. अलबत्ता म़ुखबिरों की ऐसी कई बस्तियां ज़रूर बस्ती रहेंगी.

(लेखिका लंबे समय से छत्तीसगढ़ में पत्रकार के रूप में काम कर चुकी हैं. इन दिनों कांकेर में रहकर सामाजिक क्षेत्रों में काम कर रही हैं.)

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