हिन्द महासागर में अपनी स्थिति मज़बूत करने और दक्षिण एशिया में चीन के बढ़ते प्रभाव को रोकने के लिए भारत के लिए यह ज़रूरी है कि वह अपने पड़ोसियों को विश्वास में ले. मालदीव के साथ हाल में हुआ समझौता इसी दिशा में उठाया गया एक अच्छा क़दम माना जा सकता है. दक्षेस की बैठक में भाग लेने गए भारतीय प्रधानमंत्री ने मालदीव के साथ द्विपक्षीय संबंध को मज़बूत करने के लिए जो प्रयास किए हैं, उससे भारत को सामरिक और आर्थिक दोनों स्तरों पर लाभ होगा. दोनों देशों ने विकास के लिए व्यवस्थागत समझौते और आतंकवाद से लड़ने में आपसी सहयोग सहित छह समझौते किए. विकास समझौते के तहत मालदीव की राजकोषीय स्थिति को स्थिरता प्रदान करने के लिए भारत उसे 10 करोड़ डॉलर की वैकल्पिक सुविधा देगा. भारतीय प्रधानमंत्री ने कहा कि दस करोड़ डॉलर का यह क़र्ज़ एक वर्ष पहले मालदीव में 500 घरों के निर्माण के लिए घोषित 4 करोड़ डॉलर के क़र्ज़ के अतिरिक्त होगा. दोनों देशों के बीच हुए समझौतों में व्यापार और निवेश, खाद्य सुरक्षा, मत्स्य विकास, पर्यटन, परिवहन, सूचना प्रौद्योगिकी, नवीन और नवीनीकरणीय ऊर्जा, संचार और वायु तथा समुद्री मार्गों के ज़रिये संपर्क बढ़ाने में आपसी सहयोग की योजना का खाका है. इसके अलावा मनमोहन सिंह ने 200 बिस्तरों वाले इंदिरा गांधी स्मृति अस्पताल के जीर्णोद्धार की भी घोषणा की है. भारत मई 2013 तक इस अस्पताल को सुविधा संपन्न बनाकर मालदीव को सौंप देगा. दोनों देशों ने कोच्ची और माले के बीच एक यात्री व माल परिवहन सेवा प्रारंभ करने के प्रस्ताव में त़ेजी लाने का भी निर्णय लिया है. इसके साथ-साथ माले के उत्तर में एक बंदरगाह विकसित करने के मुद्दे पर भी बात की गई. इस बंदरगाह को विकसित करने में भारत सहयोग देगा. हिंद महासागर की समुद्री डाकुओं से सुरक्षा में मालदीव की महत्वपूर्ण भूमिका है. मालदीव की समुद्री सुरक्षा संबंधी क्षमता में विस्तार के लिए भारत ने वहां नेशनल पुलिस एकेडमी बनाने में सहयोग देने की भी घोषणा की है. मालदीव के राष्ट्रपति मोहम्मद नशीद ने भारत के साथ हुए इन समझौते से दोनों देशों के संबंधों में मज़बूती आने की बात कही है. उन्होंने भारत द्वारा की गई आर्थिक सहयोग की घोषणा को अपने देश के आर्थिक विकास को गति देने वाला बताया है तथा कहा है कि इससे दोनों देशों के बीच के आर्थिक संबंधों को एक नया आधार मिलेगा.
एक तो भारत का व्यापारिक मार्ग अवरुद्ध होगा और दूसरा यह सामरिक तौर पर भी कमज़ोर हो जाएगा. ऐसे ही चीन भारत के उत्तर पूर्वी राज्यों तथा उत्तर में समस्याएं खड़ी कर रहा है. आए दिन सीमा उल्लंघन के समाचार आते रहते हैं. अगर भारत के दक्षिण में भी वह अपनी स्थिति मज़बूत कर लेगा तो हमारे लिए समस्याएं और बढ़ जाएंगी. इसलिए मालदीव के साथ मज़बूत सामरिक गठबंधन चीन की चुनौतियों का सामना करने के लिए अत्यावश्यक हैं.
वैसे भारत और मालदीव के बीच शुरू से ही अच्छे संबंध रहे हैं. भारत हमेशा से उपनिवेशवाद का विरोध करता रहा है और अपनी आज़ादी के बाद उपनिवेशवाद विरोधी प्रयास को इसने त़ेज कर दिया था. 1966 में ब्रिटिश ग़ुलामी से मालदीव की मुक्ति में भारत के प्रयासों का भी योगदान रहा है. दोनों देशों ने 1976 में समुद्री सीमा का निर्धारण किया था एवं 1981 में कंप्रिहेंसिव ट्रेड अग्रीमेंट पर भी हस्ताक्षर किए हैं. मालदीव और भारत दोनों ही सार्क के संस्थापक सदस्य हैं. 1988 में जब पीपुल्स लिबरेशन ऑर्गेनाइजेशन ऑफ तमिल इलम के कुछ आतंकवादियों ने मालदीव पर हमला किया था तो मालदीव के तत्कालीन राष्ट्रपति अब्दुल गयूम ने भारत से ही सहायता मांगी थी. भारत ने ऑपरेशन कैक्टस चलाकर आतंकियों के मंसूबों को नाकामयाब कर दिया था. लेकिन कुछ समय से चीन ने मालदीव में अपनी गतिविधियां बढ़ानी शुरू कर दी हैं. वह मालदीव में कई परियोजनाएं चला रहा है. मालदीव के द्वीपों को विकसित करने तथा उसके अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डों का विस्तार करने में उसकी अभिरुचि बढ़ती जा रही है. हाल में चीन ने इस देश में अपना दूतावास भी खोला है. चीन हिंद महासागर में अपनी स्थिति मज़बूत करने के लिए तथा भारत की घेरेबंदी के लिए पूर्वी अफ्रीका के देशों के साथ-साथ पाकिस्तान, बांग्लादेश, मलेशिया, मॉरिशस, श्रीलंका आदि देशों में अपनी उपस्थिति बढ़ा चुका है. सामरिक और आर्थिक दोनों दृष्टिकोणों से यह भारत के प्रतिकूल है. भारत ने भी इन देशों के साथ संबंध मज़बूत करने का प्रयास किया है. मालदीव के साथ भारत ने रक्षा संबंध मज़बूत किए हैं. अगस्त 2009 मे रक्षा मंत्री एके एंटनी के मालदीव दौरे के बाद से भारतीय जंगी जहाज़ और डॉर्नियर विमान समुद्री गश्त और सर्विलांस में मालदीव की मदद कर रहे हैं. इसके अलावा भारत इस देश के 26 द्वीपों पर ग्राउंड राडार नेटवर्क स्थापित करने और उन्हें भारतीय सेना के सर्विलांस सिस्टम से जोड़ने में इसकी मदद कर रहा है. इससे पूर्व भी भारत ने हाइड्रोग्राफिक सर्वे और अन्य सैनिक सहायता मालदीव को दी है. भारत ने 260 फास्ट अटैक क्राफ्ट आईएनएस चिल्लांचांग भी मालदीव को दिया है. भारत की इस सहायता का फायदा मालदीव को मिला है. लेकिन हर देश की अपनी समस्याएं होती हैं. अगर भारत मालदीव को एकतऱफा रियायत नहीं देगा और उसे आर्थिक सहायता नहीं देगा तो धीरे-धीरे वह चीन के नज़दीक जा सकता है. और एक बार अगर चीन यहां सैनिक बेस बना लेता है तो फिर भारत के लिए मुश्किलें बढ़ जाएंगी. एक तो भारत का व्यापारिक मार्ग अवरुद्ध होगा और दूसरा यह सामरिक तौर पर भी कमज़ोर हो जाएगा. ऐसे ही चीन भारत के उत्तर पूर्वी राज्यों तथा उत्तर में समस्याएं खड़ी कर रहा है. आए दिन सीमा उल्लंघन के समाचार आते रहते हैं. अगर भारत के दक्षिण में भी वह अपनी स्थिति मज़बूत कर लेगा तो हमारे लिए समस्याएं और बढ़ जाएंगी. इसलिए मालदीव के साथ मज़बूत सामरिक गठबंधन चीन की चुनौतियों का सामना करने के लिए अत्यावश्यक हैं. भारत ने जो पहल की है उससे चीन की बौखलाहट बढ़ेगी तथा वह मालदीव को अपने विश्वास में लेने के प्रयासों में तीव्रता लाएगा. अब भारत के समक्ष चुनौती इस बात की है कि वह किस तरह चीन के मंसूबों पर पानी फेरता है तथा मालदीव के साथ अपने संबंधों को एक नई ऊंचाई पर ले जाता है.
|
|
|









