भारत-वियतनाम संबंध : चीन को चुनौती

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भारत ने अपनी पूर्व की ओर देखो नीति पर अमल करने की गति बढ़ा दी है. हाल में भारत ने पूर्वी एशिया के कई देशों के साथ गहरे संबंध बनाने की दिशा में प्रयास किए हैं. मालदीव के साथ समझौते किए, बांग्लादेश के साथ संबंध सुधारने के प्रयास तेज किए. भारतीय प्रधानमंत्री की बांग्लादेश यात्रा से उम्मीदें बढ़ी हैं. इसी सिलसिले में एक कड़ी जुड़ी है वियतनाम के साथ भारत के बेहतर संबंध की. वियतनाम की सरकारी तेल कंपनी पेट्रो वियतनाम ने भारतीय कंपनी ओएनजीसी विदेश लिमिटेड के साथ एक क़रार किया है, जिसके तहत दक्षिण चीन सागर में स्थित तेल ब्लॉकों की खोज और तेल निकालने में ओवीएल उसकी मदद करेगा. यह क़रार तीन साल के लिए किया गया है. चीन ने इसका विरोध किया है. उसका कहना है कि दक्षिण चीन सागर का इस क्षेत्र पर उसका दावा है और वियतनाम किसी दूसरे देश के साथ इस तरह का समझौता नहीं कर सकता. चीन के इस विरोध का प्रभाव न तो भारत पर और न वियतनाम पर पड़ा है. दोनों देशों ने इस परियोजना को आगे बढ़ाने का संकल्प लिया है. वियतनाम का कहना है कि वह इस समुद्री क्षेत्र में आर्थिक हितों से संबंधित 1982 की संयुक्त राष्ट्र संधि के अनुरूप ही अपना दावा जताता है. भारत ने चीन के इस रवैये पर कठोर प्रतिक्रिया व्यक्त की और वियतनाम के साथ अपने संबंध मज़बूत बनाने का मार्ग प्रशस्त कर दिया. वियतनाम के राष्ट्रपति ट्रोओंग तान सांग की भारत यात्रा के समय दोनों देशों ने कई अहम समझौतों पर हस्ताक्षर किए, जिनमें ऊर्जा, वाणिज्य, दूरसंचार और विज्ञान के क्षेत्र में सहयोग करने का समझौता प्रमुख है. दोनों देशों ने प्रत्यर्पण संधि पर भी हस्ताक्षर किए हैं. दोनों देशों ने आपसी व्यापार को वर्ष 2015 तक सात अरब डॉलर तक करने का लक्ष्य रखा है. ग़ौरतलब है कि पिछले साल तक दोनों देशों के बीच आपसी व्यापार ढाई अरब डॉलर रहा है. भारतीय प्रधानमंत्री ने वियतनाम के राष्ट्रपति को भरोसा दिलाया है कि भारत उनके देश में और अधिक निवेश करने का भरपूर प्रयास करेगा.

वियतनाम की सरकारी तेल कंपनी पेट्रो वियतनाम ने भारतीय कंपनी ओएनजीसी विदेश लिमिटेड के साथ एक क़रार किया है, जिसके तहत दक्षिण चीन सागर में स्थित तेल ब्लॉकों की खोज और तेल निकालने में ओवीएल उसकी मदद करेगा. यह क़रार तीन साल के लिए किया गया है.

वियतनाम ने भारत को अपने एक बंदरगाह न्हा-ट्रांग के इस्तेमाल की इजाज़त भी दी है. दोनों देश के बीच भरोसा बढ़ रहा है, जिसका एक कारण दोनों देशों का चीन के साथ कटु अनुभव भी है. भारत और वियतनाम के बीच बढ़ते संबंध से चीन की परेशानी बढ़ गई है. वह इस क्षेत्र में भारत की मौजूदगी नहीं चाहता है. इसका कारण स़िर्फ आर्थिक नहीं, बल्कि सामरिक भी है. वह प्रशांत महासागर में अपना एकछत्र अधिकार चाहता है और भारत की मौजूदगी से उसका एकाधिकार ख़तरे में पड़ जाएगा. चीन ने कुछ समय पहले वियतनाम गए भारतीय पोत आईएनएस ऐरावत को रोकने की भी कोशिश की थी. इस तरह की हरकतों से चीन भारत पर दबाव बनाना चाहता है, लेकिन भारत भी इस बार कमर कसे हुए है. उसने चीन के बयानों पर कड़ा विरोध जताया है. दरअसल चीन को यह अनुभव है कि इस क्षेत्र के देशों में उसके ख़िला़फ आक्रोश है. पूर्वी एशिया के कई देशों के साथ चीन का सीमा संबंधी विवाद चल रहा है. कई द्वीपों पर अधिकार को लेकर वियतनाम, कंबोडिया, फिलीपींस, लाओस एवं जापान आदि कई देशों का चीन के साथ विवाद चल रहा है. वियतनाम के साथ तो यह विवाद कुछ ज़्यादा गहरा होता जा रहा है. कुछ दिनों पहले वियतनाम की राजधानी में चीन के ख़िला़फ प्रदर्शन भी हुए. वियतनाम के प्रधानमंत्री निएन तान जूंग ने राष्ट्रीय संसद से कहा है कि वियतनाम को पार्सेल द्वीप पर अपनी संप्रभुता जतानी चाहिए. उन्होंने यह भी कहा कि इस विषय पर वह चीन के साथ वार्ता करना चाहते हैं. हालांकि दोनों देशों के बीच एक समझौता भी हुआ है, जिसके तहत आपात स्थितियों का सामना करने के लिए एक हॉटलाइन स्थापित की जाएगी और दोनों देशों के अधिकारी साल में कम से कम दो बार मुलाकात करेंगे, लेकिन इस बात की उम्मीद कम है कि इस समझौते से दोनों देशों के बीच द्वीप पर अधिकार संबंधी विवाद का समाधान हो जाएगा.

इस स्थिति में भारत के पास मौक़ा है कि वह वियतनाम के साथ प्रगाढ़ संबंध बनाकर इस क्षेत्र से चीन का वर्चस्व समाप्त करने की कोशिश करे. भारत को भी वैसी ही नीति अपनानी चाहिए, जैसी चीन भारत के संदर्भ में अपनाता रहा है. उसने भारत को चारों ओर से घेरने की नीति अपनाई है. उसने पाकिस्तान के साथ गहरे संबंध बनाए, जिसका उसे ़फायदा हुआ और नुक़सान भारत को. पाकिस्तान के ग्वादर बंदरगाह का विकास करके उसने वहां अपनी नौसैनिक पहुंच बना ली है. वह नए-नए हथियार देता रहता है, जिसका इस्तेमाल पाकिस्तान भारत के विरुद्ध करता है. इसके साथ ही उसने श्रीलंका के हंबनटोटा एवं कोलंबो बंदरगाह को विकसित करने का काम ले लिया है. भारत के अन्य पड़ोसियों बांग्लादेश, म्यांमार एवं नेपाल में भी चीन ने अपनी पैठ बना रखी है. नेपाल में लोकतंत्र स्थापित होने के बाद उसने वहां की कम्युनिस्ट सरकार को अपने पक्ष में करने की कोशिश की. हालांकि भारत के साथ नेपाल के संबंध अच्छे रहे, लेकिन चीन की कोशिशों के कारण भारत को नुक़सान तो हुआ ही. पिछले कुछ समय से नेपाल में लगभग 900 भारतीय कंपनियां बंद हो चुकी हैं. म्यांमार में चीन कई परियोजनाओं पर काम कर रहा है. उसने चीन से बांग्लादेश तक सड़क मार्ग, जो म्यांमार से होकर गुजरता है, को म्यांमार की मंजूरी दिला दी है. बांग्लादेश के साथ भी चीन ने नज़दीकी बढ़ाई है और भारत को प्रभावित करने की कोशिश करता रहा है. भारत ने अब उसका ही हथकंडा अपनाया है और चीन के आसपास मुख्यत: दक्षिण एवं दक्षिण पूर्व एशिया के देशों के साथ संबंध मज़बूत बनाने की कवायद शुरू कर दी है. भारत ने एकतरफा रियायत और आर्थिक संबंध बढ़ाने के साथ-साथ सामरिक संबंधों की बहाली को भी तवज्जो दी है. भारत अब चीन को उसी की भाषा में जवाब देगा. अगर भारतीय नेतृत्व इस नीति को सही तरीक़े से लागू कर पाया तो चीन को घेरने में भारत को भी ज़्यादा व़क्त नहीं लगेगा.

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One Response to “भारत-वियतनाम संबंध : चीन को चुनौती”

  • R.C.VIVEK says:

    Our country is making good relations with other cAsian Countries but ourcountry has failed to make good relation with their own brothers and sisters due to caste system in the country because untouchable are still untouchable in the country .

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