दक्षिणी चीन के सेंजेन स्थित पोर्ट टाउन में 22 भारतीय व्यवसायी पिछले डेढ़ वर्षों से नारकीय ज़िंदगी गुजार रहे हैं. उन पर हीरों की तस्करी का आरोप है. इन कारोबारियों के परिवारीजनों ने भारत सरकार से अपील की है कि वह इस मामले में हस्तक्षेप करे और उनकी रिहाई सुनिश्चित कराए. परिवारीजनों ने सरकार से इस मामले में ट्रायल शुरू कराने का भी आग्रह किया. जानकारी के मुताबिक़, 8 जनवरी, 2010 को 7.3 यूएस डॉलर की कस्टम ड्यूटी चोरी करने के आरोप में इन कारोबारियों को जेल भेज दिया गया था. ये सभी डेढ़ वर्ष से अधिक समय जेल में गुजार चुके हैं, जबकि इन्हें सज़ा भी नहीं सुनाई गई और न इस मामले में कोई सुनवाई हुई. पीड़ित परिवारों ने आरोप लगाया कि बीजिंग स्थित भारतीय राजनयिक इस मामले में घोर लापरवाही बरत रहे हैं. उन्होंने इस मामले में भारत सरकार की कोशिशों पर भी सवाल खड़े किए. उन्होंने बताया कि वे भारतीय उच्चायोग के संपर्क में हैं, लेकिन उन्हें महसूस हो रहा है कि कोई गंभीर पहल नहीं की जा रही है. हालांकि चीन के सख्त क़ानूनों की वजह से स्थानीय व्यापारी इस बारे में कुछ भी खुलकर कहने से कतरा रहे हैं.
पीड़ित परिवारों ने बताया कि उन्होंने बीजिंग और संघाई में पैरवी के लिए वकीलों से बात की, लेकिन केस काफी उलझा हुआ है. सुनवाई की तारीख़ तय न होने से उन्हें न्याय मिलने में बेवजह देरी हो रही है. हालांकि चीन के विदेश मंत्री ने बीजिंग में दिए गए अपने बयान में कहा था कि इस मामले की स्थिति और गंभीरता पर सरकार विचार कर रही है. उनके मुताबिक़, सेंजेन की अदालत में क़ानून के मुताबिक़ कार्रवाई की जा रही है और मामले की प्रगति रिपोर्ट से भारतीय अधिकारियों को अवगत कराया जा रहा है. एक अन्य बयान में यह भी कहा गया कि मामले में हुए ट्रायल के परिणाम समय-समय पर गुआंगझो स्थित भारतीय राजनयिक को भेजे गए हैं. चीनी अधिकारियों के अनुसार, इस मामले में निष्पक्ष क़ानूनी कार्रवाई की जा रही है. उन्होंने कहा कि हम उन लोगों की धार्मिक, सांस्कृतिक और मानवीय भावनाओं का सम्मान करते हैं. जबकि पीड़ित परिवारों का कहना है कि हमने चीनी अधिकारियों से कहा कि हम उचित जुर्माना देने को तैयार हैं, बावजूद इसके वे इस मामले में अनावश्यक देरी कर रहे हैं. चीन के सख्त कानूनों के चलते पीड़ित परिवारों को तरह-तरह की आशंकाएं सता रही हैं. उनका कहना है कि वे जैन धर्म से ताल्लुक रखते हैं और शाकाहारी हैं. जेल में बंद कई लोगों की तबीयत काफी ख़राब है. अगर जल्द उनकी रिहाई नहीं हुई तो उनकी जान को ख़तरा हो सकता है. भारतीय अधिकारियों का कहना है कि उन्होंने पीड़ित परिवारों की यात्रा के लिए पांच बार व्यवस्था की, लेकिन चीन ने बंदियों से मिलने की अनुमति नहीं दी. कई भारतीय कारोबारियों ने आरोप लगाया कि वे चीनी कंपनियों की ठगी के शिकार हुए. इसी बीच चीन सरकार ने 48 कंपनियों के ख़िला़फ फरेब करने संबंधी एक सूची जारी की है. कहा गया है कि कई फरेबी कंपनियों ने 1.8 मिलियन यूएस डॉलर की रकम विस्तारित की है. इस तरह के सबसे अधिक 29 मामले हेबई प्रांत में सामने आए. जबकि त्यानजेंन म्यूनिसिपल इलाके में 26 मामले सामने आए.
सूत्रों के मुताबिक़, विदेश एवं वाणिज्य मंत्रालय ने इस मामले की विवेचना करते हुए पाया कि ऐसे छह कारण हैं, जो इस तरह की धोखाधड़ी की जड़ में हैं:-
- चीनी कंपनियों के आमंत्रण पर भारतीय कंपनियों के अधिकारी चीन यात्रा पर गए. यह प्रयास आपसी विश्वास बहाली के लिए किया गया. भारतीयों के वापस जाने से पहले चीनियों ने उनसे पैसों की मांग की, ताकि उनके लिए सांस्कृतिक महत्व की चीजें ख़रीदी जा सकें. इस पर भारतीय सहमत हो गए, लेकिन वापस लौटने पर उन्होंने सभी तरह की बातचीत बंद कर दी. जिस वजह से भारतीय कंपनियों को यात्रा और रहने-खाने के खर्च का नुक़सान उठाना पड़ा.
- भारतीय कंपनियां बी-2 पोर्टल के जरिए चीनी निर्यातकों से मदद पाती हैं. निर्यातकों का कहना है कि भारतीय कंपनियों को कुल राशि एक बार में अग्रिम रूप से जमा करनी चाहिए.
- भारतीय कंपनियों ने डील को अंतिम रूप देते हुए चीनी कारोबारियों से प्रोडक्ट के नमूने देने की बात कही थी. सभी ऑर्डरों के लिए अग्रिम भुगतान कर दिया गया और कंसाइमेंट भारतीय तटों पर पहुंच गया. भुगतान सामान पहुंचने और लोडिंग के बाद किया गया. कस्टम द्वारा सभी प्रोडक्ट्स देखने के बाद ही उन्हें रिलीज किया गया.
- इस बात पर सहमति हुई कि ख़रीददार (भारतीय) कंसाइनमेंट के समय एडवांस जमा कर दें. चीनी साझेदार को इस मामले में अग्रिम भुगतान में देरी हुई. उन्होंने बकाया रकम के भुगतान में हो रही देरी, लागत ख़र्च और आपूर्ति में परेशानी के लिए धमकी भी दी.
- चीनी कंपनियां सौदे को अंतिम रूप देने से पहले भारतीय कंपनियों को नियमानुसार हिस्सा देती हैं. इस समझौते के तहत कुल लागत के लिए एक नोटराइजेशन भी तैयार किया गया. वापस लौटने पर भारतीयों ने इसके लिए अतिरिक्त भुगतान देने की बात कही.
- समझौते से पहले भारतीयों को निर्देश दिया गया कि वे अग्रिम भुगतान या पूर्ण भुगतान बैंक खातों के ज़रिए अलग-अलग चीनी कंपनियों को दें, लेकिन उन्होंने धनराशि पाने के बाद कोई जवाब नहीं दिया. जब धनराशि मिलने के बावजूद जवाब न देने के बारे में पूछा गया तो चीन का कहना था कि कंपनियों के खाते में कोई धनराशि जमा नहीं हुई. बाद में वहां काम करने वाले लोगों ने नौकरी छोड़ दी.
उल्लेखनीय है कि हर साल कई देशों में जाने-अनजाने सैकड़ों भारतीयों को सजा भोगनी पड़ती है. गिरफ्तार किए गए लोगों की सुनवाई कई महीनों तक नहीं होती. रिहाई के इंतज़ार में कई कैदी जेल में दम तोड़ देते हैं. निश्चित तौर पर यह मामला मानवाधिकारों के हनन से जुड़ा है. चीन की जेल में बंद भारतीय कारोबारियों पर लगे आरोपों की निष्पक्ष जांच होनी चाहिए. भारत सरकार इस मामले में राजनयिक स्तर पर प्रयास करे और सुनवाई के लिए चीन सरकार पर दबाव बनाए.
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