कानून और व्यवस्थाजरुर पढेंराजनीतिविदेशविधि-न्यायसमाज

यह पाकिस्तान की संप्रभुता पर हमला है

Share Article

अमेरिका और पाकिस्तान के बीच फिर से तनाव पैदा हो गया है. हक्कानी नेटवर्क के साथ आईएसआई के रिश्तों को लेकर बनी खाई पूरी तरह पाटी भी नहीं जा सकी थी कि एक अन्य मुद्दे ने दोनों देशों के बीच तनाव बढ़ा दिया. नाटो ने हेलीकॉप्टरों ने पाकिस्तानी कबायली क्षेत्र मोहमंद की सलाला चौकी पर हमला किया, जिसमें दो अधिकारियों सहित 25 पाकिस्तानी सैनिक मारे गए. पाकिस्तान की यह चौकी अ़फग़ानिस्तान की सीमा से लगभग 2.5 किलोमीटर दूर है. नाटो की इस कार्रवाई से पाकिस्तान बुरी तरह आहत हुआ. वहां के सैन्य एवं राजनीतिक नेतृत्व ने इस पर कठोर प्रतिक्रिया जताई है. पाकिस्तानी प्रधानमंत्री यूसुफ रजा गिलानी ने कहा कि यह पाकिस्तान की एकता और आज़ादी पर हमला है. सेना की ओर से भी बयान जारी किया गया. सेनाध्यक्ष अशफाक परवेज कियानी ने कहा कि इस ग़ैर ज़िम्मेदाराना कार्रवाई का कारगर जवाब देने के लिए सभी आवश्यक क़दम उठाए जाएंगे. सेना के प्रवक्ता मेजर जनरल अतहर अब्बास ने कहा कि इस बार नाटो को इसका गंभीर परिणाम भुगतना पड़ेगा. उन्होंने कहा कि यह कोई पहली घटना नहीं है. पिछले तीन सालों में लगभग आठ हमले हुए, जिनमें अधिकारियों सहित 72 सैनिक मारे गए और 250 से ज़्यादा घायल हुए. हालांकि नाटो ने गहरी संवेदना व्यक्त करने के अलावा घटना की जांच का भी आदेश दिया है, लेकिन पाकिस्तानी सेना का गुस्सा कम नहीं हुआ है. सेना का कहना है कि ऐसा आश्वासन तो पहले भी दिया गया था, पर हुआ कुछ भी नहीं. पहले भी 2008, 09 और 2011 में हमले किए गए, जिनमें 14 सैनिक मारे गए और 13 घायल हुए. तब भी जांच की घोषणा की गई थी, लेकिन जांच अभी तक पूरी नहीं हुई. इस बार पाकिस्तान केवल बयानबाज़ी नहीं कर रहा, बल्कि उसने एक्शन भी लिया. इस मसले पर कैबिनेट की रक्षा समिति की आपात बैठक बुलाई गई, जिसके बाद कहा गया कि अमेरिका और नाटो के साथ राजनीतिक, सैन्य एवं ख़ुफिया सहयोग की समीक्षा की जाएगी. सरकार ने तत्काल कार्रवाई का आदेश दिया, जिसके बाद पाकिस्तान के रास्ते अ़फग़ानिस्तान में नाटो सेना के लिए खाद्य एवं तेल आपूर्ति रोक दी गई. साथ ही पाकिस्तान ने अमेरिका को 15 दिनों के भीतर शम्सी हवाई अड्डा खाली करने को कहा है. इसके अलावा उसने अ़फग़ानिस्तान के भविष्य पर चर्चा के लिए जर्मनी के बॉन शहर में होने वाली बैठक के बहिष्कार का फैसला भी लिया है.

सेना का कहना है कि ऐसा आश्वासन तो पहले भी दिया गया था, पर हुआ कुछ भी नहीं. पहले भी 2008, 09 और 2011 में हमले किए गए, जिनमें 14 सैनिक मारे गए और 13 घायल हुए. तब भी जांच की घोषणा की गई थी, लेकिन जांच अभी तक पूरी नहीं हुई. इस बार पाकिस्तान केवल बयानबाज़ी नहीं कर रहा, बल्कि उसने एक्शन भी लिया. इस मसले पर कैबिनेट की रक्षा समिति की आपात बैठक बुलाई गई, जिसके बाद कहा गया कि अमेरिका और नाटो के साथ राजनीतिक, सैन्य एवं ख़ुफिया सहयोग की समीक्षा की जाएगी.

अब प्रश्न यह उठता है कि क्या पाकिस्तान सचमुच अपने फैसले पर अडिग रह पाएगा या पहले की तरह कुछ दिनों की तनातनी के बाद दोनों के रिश्ते सामान्य हो जाएंगे. देखा जाए तो दोनों को एक-दूसरे की ज़रूरत है. अमेरिका ने भी कहा है कि आतंकवाद के ख़िला़फ लड़ाई में उसे पाकिस्तान की आवश्यकता है. अमेरिका ने संबंध सामान्य करने की कोशिश तेज भी कर दी है. अमेरिकी विदेश मंत्री, रक्षामंत्री एवं व्हाइट हाउस की तऱफ से इस घटना पर गहरी संवेदना व्यक्त की जा चुकी है. हालांकि पाकिस्तान नाटो से माफी मांगने की बात कह रहा है. उम्मीद यही है कि नाटो इस घटना के लिए माफी मांग लेगा और सब ठीकठाक हो जाएगा. सितंबर 2010 में जब नाटो सेना के हेलीकॉप्टरों ने कुर्रम एजेंसी में दो पाकिस्तानी सैनिकों को मार दिया था तो उस समय भी पाकिस्तान ने 11 दिनों तक नाटो सेना को सामान की आपूर्ति रोक दी थी, लेकिन बाद में आपूर्ति बहाल हो गई. पाकिस्तान को अमेरिकी सहायता की आवश्यकता है. वह 2002 से अभी तक 18 बिलियन डॉलर की सहायता अमेरिका से ले चुका है. उसकी आर्थिक स्थिति अच्छी नहीं है. भले ही पाकिस्तान यह कहता रहे कि वह अमेरिकी सहायता के बिना रह सकता है, लेकिन वास्तविकता कुछ और है. पाकिस्तान के साथ मजबूरी यह है कि उसे अपने देश के अंदर नाटो के विरुद्ध हो रहे प्रदर्शनों और जनाक्रोश का जवाब देना पड़ता है. इसी कारण ऐसे हमलों के बाद कुछ दिनों तक सरकार को यह दिखाना होता है कि वह इन मामलों पर कितनी गंभीर है. अगर पाकिस्तान को इसका जवाब देना था तो उसे हमला करने वाले हेलीकॉप्टर को ही मार गिराना चाहिए था या बाद में जवाबी कार्रवाई करनी चाहिए थी, लेकिन ऐसा नहीं किया गया, केवल आपूर्ति बंद करने वाला क़दम उठाया गया, जिससे नाटो को परेशानी तो होती है, पर कोई स्थायी नुक़सान नहीं होता. दोनों देशों के बीच यह तनाव कितनी जल्दी समाप्त होगा, यह इस बात पर निर्भर करता है कि वे कौन सा रास्ता अपनाते हैं. अभी संकट जितना गहरा दिख रहा है, वास्तविक तौर पर उतना है नहीं. जैसे ही पाकिस्तान में जनता का गुस्सा समाप्त होना शुरू हो जाएगा, वैसे ही इनका तनाव भी ठंडा पड़ने लगेगा. अमेरिका इस बात को जानता है. इसी कारण वह अभी पाकिस्तान के किसी फैसले पर कड़ी प्रतिक्रिया नहीं जता रहा और उसके गुस्सा कम होने का इंतज़ार कर रहा है. उधर चीन की तऱफ से जैसी प्रतिक्रिया आ रही है, उससे भी अमेरिका की मजबूरी बढ़ जाती है कि वह किसी भी तरह पाकिस्तान को अपने खेमे में रखे. यह संकट ज़्यादा दिनों तक रहेगा, ऐसी उम्मीद नहीं है.

राजीव कुमार Contributor|User role
Sorry! The Author has not filled his profile.
×
राजीव कुमार Contributor|User role
Sorry! The Author has not filled his profile.

You May also Like

Share Article

Comment here