जनलोकपाल : बहस की जगह भाषण विरोध और प्रदर्शन

याद कीजिए अप्रैल का महीना और जंतर-मंतर. जनलोकपाल के लिए अन्ना का आंदोलन. माहौल और मौसम की गरमाहट. लेकिन अप्रैल से दिसंबर तक आते-आते दिल्ली की यमुना में का़फी पानी बह चुका था. इस बार जंतर-मंतर पर तपती दुपहरी की जगह गुलाबी ठंड ने ले ली थी. जनता और खुद टीम अन्ना द्वारा दुत्कारे जा रहे नेताओं को लेकर तल़्खी भी कम थी. बेइज़्ज़ती का भय इन नेताओं को अन्ना के आंदोलन में जाने से रोकता था. लेकिन इस बार तो यहां पूरा विपक्ष ही अन्ना के साथ मंच पर डटा हुआ था. नेताओं ने पानी पी-पी कर सरकार को कोसा. कई मुद्दों पर जनता ने नेताओं को उनके भाषण के बीच में ही रोका और टोका. फिर भी जमकर भाषणबाज़ी हुई. जनता ने अपना विरोध भी दर्ज कराया. अन्ना हजारे ने कमज़ोर लोकपाल बिल के लिए एक बार फिर प्रधानमंत्री और राहुल गांधी को ज़िम्मेदार ठहराया.

डेमोक्रेसी बाई डिस्कशन. लेकिन कहां, संसद में या स़डक पर? जब संसद में अर्थहीन बहस या कहें बहस ही न हो, तब क्या? ज़ाहिर है, तब जनता स़डक पर बहस करेगी. ऐसा ही कुछ टीम अन्ना ने किया. उसने मज़बूत लोकपाल के लिए बीते 11 दिसंबर को जंतर-मंतर पर एक बहस की. अब तक तिरस्कृत होते रहे नेताओं को बुलाया गया. जनता आई. लोकपाल पर अलग-अलग राय रखने वाले लोग भी आए, लेकिन बहस के नाम पर यहां क्या हुआ?

लेकिन इस एक दिन के अनशन और बहस के बाद कुछ ऐसे सवाल सामने आते हैं, जिन पर विचार किया जाना ज़रूरी है. 7 महीने पहले जिस मज़बूत जनलोकपाल के लिए अन्ना ने ल़डाई शुरू की थी, वह अब भी जारी है. हर बार ऐसा लगता है कि यह ल़डाई शुरू से शुरू हो रही है, कुछ एक बदलाव को छोड कर. मसलन, सात महीने पहले अन्ना, उनके साथी और जनता इस आंदोलन में नेताओं को नहीं आने दे रहे थे. पहले अन्ना के निशाने पर सारी पार्टियां थीं. अब स़िर्फसरकार है. शायद अब टीम अन्ना को भी यह लग रहा है कि एक मज़बूत लोकपाल क़ानून लाने के लिए उन्हें समूचे विपक्ष का समर्थन चाहिए. लेकिन सवाल है कि क्या सचमुच सभी विपक्षी पार्टियां अन्ना के जनलोकपाल का समर्थन संसद में करेंगी? क्योंकिवामपंथी पार्टियों या समाजवादी पार्टी की राय या मंच पर बैठे सभी नेताओं का लगभग यह कहना कि वे लोकपाल से ज़ुडे सभी तकनीकी मुद्दों पर संसद में बहस के दौरान ही बोलेंगे, शक पैदा करता है. टीम अन्ना और नेताओं के भाषण से यही साबित हो रहा था कि जहां टीम अन्ना अपने पुराने रु़ख पर क़ायम है. राजनीतिक दल सब कुछ मानते एवं जानते हुए भी संसद की सर्वोच्चता की ही बात कर रहे थे, लेकिन जंतर-मंतर पर सिविल सोसायटी (टीम अन्ना) और नेताओं के एक साथ मंच पर आने से एक बात सा़फ हो गई कि इन दोनों को ही एक दूसरे की ज़रूरत महसूस हुई है. जहां टीम अन्ना भी यह समझ चुकी है कि बिना विपक्ष को साथ लिए मज़बूत लोकपाल ला पाना मुमकिन नहीं होगा, वहीं विपक्ष भी टीम अन्ना के साथ जु़डी जनता में अपना भविष्य देख रहे थे. खासकर बीजेपी तो इसे मानो खुद के लिए सत्ता में आने का सुनहरा मौक़ा मान रही है. हालांकि जनता फिर भी इन नेताओं को सुनने में ज़्यादा दिलचस्पी नहीं दिखा रही थी और थो़डी भी इधर-उधर की बात होने पर नेताओं के खिला़फ हो हल्ला शुरू हो जाता था.

सवाल न संसद की अवहेलना का है और न ही राजनीति का. टीम अन्ना पहले भी कह चुकी है कि वह जनलोकपाल की राजनीति कर रही है. जब संसद में बहस की गुंजाइश खत्म हो जाए या निरर्थक बहस हो तो जनता स़डक पर बहस करेगी ही. लेकिन इस सबके बीच, अन्ना और उनके साथियों को भी एक सवाल का जवाब देना चाहिए. मसलन, जनता के इस आंदोलन, जो आज पूरे विश्व के लिए नज़ीर बन गया हैं, में नेताओं को बुलाने का क्या मक़सद था? जबकि देश के करो़डों लोग इस आंदोलन के साथ हैं, वहां चंद नेताओं की क्या बिसात? वह भी तब, जब सारा देश यह मान रहा है कि संसद और संविधान से ज़्यादा सर्वोच्च इस देश की जनता है.

सीपीआई महासचिव एबी बर्धन ने कहा कि टीम अन्ना यह न सोचे कि उनके जनलोकपाल की हर एक बात को मान लिया जाएगा. सपा के राम गोपाल यादव ने भी यही बात कही कि यह ज़रूरी नहीं है कि संसद में टीम अन्ना की हर मांग मान ली जाए. एनसीपीआरआई के निखिल डे ने जब अपनी बात रखी और भ्रष्टाचार से ल़डने के लिए एक लोकपाल की जगह कई संस्थाएं बनाने का सुझाव दिया, तब भी लोगों ने उनका विरोध किया. बहरहाल, बहस के नाम पर हुई भाषणबाज़ी का कुल लब्बोलुआब यही था कि विपक्ष अपनी राजनीति चमकाने के लिए जहां अन्ना के साथ मंच साझा कर रहा था, वहीं पिछले सात महीने की ल़डाई के बाद शायद टीम अन्ना की मजबूरी थी कि वह राजनीतिक दलों को अपने मंच पर आमंत्रित करे. हालांकि इस एक दिन के अनशन से टीम अन्ना को अपने आगे के आंदोलन के लिए थो़डी और ऊर्जा ज़रूर मिल गई है. वहीं जनता में नया जोश भरने का मौक़ा मिला. लेकिन सरकार को टीम अन्ना पर राजनीति करने का आरोप लगाने का मौक़ा भी मिल गया. कांग्रेस ने अन्ना पर आरोप भी लगाया कि वह संसद की अवहेलना कर रहे हैं. कांग्रेस नेता राशिद अल्वी ने तो यहां तक कह दिया कि विरोध-प्रदर्शन करना अन्ना जी का संवैधानिक अधिकार है, लेकिन सोनिया गांधी और राहुल गांधी पर सीधे तौर से प्रहार करने का अर्थ है कि अन्ना लोकपाल के मुद्दे पर राजनीति कर रहे हैं. पर सवाल न तो संसद की अवहेलना का है और न ही राजनीति का. टीम अन्ना पहले भी कह चुकी है कि वह जनलोकपाल की राजनीति कर रही है. जब संसद में बहस की गुंजाइश खत्म हो जाए या निरर्थक बहस हो तो जनता स़डक पर बहस करेगी ही. लेकिन इस सबके बीच, अन्ना और उनके साथियों को भी एक सवाल का जवाब देना चाहिए. मसलन, जनता के इस आंदोलन, जो आज पूरे विश्व के लिए नज़ीर बन गया हैं, में नेताओं को बुलाने का क्या मक़सद था? जबकि देश के करो़डों लोग इस आंदोलन के साथ हैं, वहां चंद नेताओं की क्या बिसात? वह भी तब, जब सारा देश यह मान रहा है कि संसद और संविधान से ज़्यादा सर्वोच्च इस देश की जनता है.

विचार बनाम विचार

इस बॉक्स में जूता दिखाते व्यक्ति की इस तस्वीर को देख कर अंदाज़ा लगा सकते हैं कि जनता में हर उस विचार के खिला़फ कितना रोष है, जो जनलोकपाल से इतर है. दरअसल, नेताओं और सिविल सोसायटी के कुछ सदस्यों को टीम अन्ना से अलग विचार रखने के एवज में जनता का यही विरोध झेलना प़डा. यह एक तस्वीर इस बात को साबित करती है कि उस दिन जंतर-मंतर पर बहस की कोई गुंजाइश नहीं थी, सिवाय टीम अन्ना के लोकपाल के विचार का समर्थन करने के. जनता का सबसे ज़्यादा विरोध जहां एनसीपीआरआई के निखिल डे को झेलना प़डा, वहीं डी राजा, रामगोपाल यादव और एबी बर्धन को भी जनता ने नकार दिया. निखिल डे को तो लोगों ने मंच से उतरने तक को कहा. निखिल डे ने कहा था कि ग्रुप सी के कर्मचारियों के भ्रष्टाचार की जांच लोकपाल के बदले पुलिस या अन्य एजेंसी से करवाने की व्यवस्था करवानी चाहिए और उसके ऊपर लोकपाल की निगरानी होनी चाहिए. जनता के विरोध के बावजूद निखिल अपनी बात कहते रहे और साथ ही यह भी कहा कि अगर लोकपाल पर आपके कुछ विचार हैं तो हमारे भी विचार हैं. डी राजा को लोगों ने हिंदी में बोलने के लिए कहा. एबी बर्धन ने जब यह कहा कि जन लोकपाल का हर शब्द म़ंजूर करवाने का रवैया ग़लत है. इसमें लचीलापन होना चाहिए और इस देश में बहुत से बुद्धिजीवी हैं न कि स़िर्फवे लोग, जिन्होंने जनलोकपाल ड्राफ्ट किया है. इस बात पर भी जनता ने बर्धन का विरोध किया. रामगोपाल यादव के यह कहने पर कि आपको ज़िद नहीं करनी चाहिए कि आपका कहा सब मान लिया जाए. इस पर जनता की तऱफ से विरोध शुरू हो गया.

अगर लोकपाल पर आपके कुछ विचार हैं तो हमारे भी विचार हैं.

-निखिल डे, एनसीपीआरआई.

 जन लोकपाल का हर शब्द मंजूर करवाने का रवैया ग़लत, इसमें लचीलापन होना चाहिए.

-ए बी बर्धन, महासचिव, सीपीआई

आपको जिद नहीं करनी चाहिए कि आपका कहा सब मान लिया जाए.

-रामगोपाल यादव, समाजवादी पार्टी

नेता जी आ गए

चौथी दुनिया शुरू से यह कहता रहा है कि अगर टीम अन्ना ने ज्वाइंट ड्राफ्ट कमेटी में अपनी ओर से या सरकार की ओर से विपक्ष के किसी नेता को शामिल करवाया होता तो शायद दिसंबर में जंतर-मंतर पर नेताओं को बुलाने या मज़बूत लोकपाल के लिए संसद का मुंह ताकने की ज़रूरत नहीं होती और न ही शायद बार-बार अन्ना को अनशन की धमकी देनी प़डती. जिस विपक्ष की राय जानने के लिए आज टीम अन्ना उन्हें आमंत्रित कर रही है, वह 7 महीने पहले ही पता चल गई होती. लेकिन तब ऐसा नहीं हुआ. किसी भी सूरत में लोकपाल को संसद के रास्ते ही बाहर निकलना है. टीम अन्ना को भी यह सच मालूम था और है. फिर भी न अप्रैल के अनशन और न ही ज्वाइंट ड्राफ्ट कमेटी में नेताओं को आने दिया गया. जिस किसी नेता ने आने की कोशिश की, उसे ब़डे बेआबरू होकर वहां से जाना प़डा. अप्रैल के अनशन के दौरान ओमप्रकाश चौटाला या उमा भारती के साथ जो कुछ भी हुआ, उसके लिए खुद अन्ना ने भी स़फाई दी थी. तब चौथी दुनिया के इस सवाल पर कि आ़खिर क्यों इन नेताओं को आने नहीं दिया जा रहा है, अन्ना ने सा़फ-सा़फ कहा था कि उन्हें डर है कि ये लोग उनके आंदोलन को ह़डप लेंगे. लेकिन शायद तब अन्ना को यह नहीं मालूम था कि 30 जनवरी को जब इंडिया अगेंस्ट करप्शन की पहली रैली रामलीला मैदान में हुई थी, तब उसके बाद से ही इंडिया अगेंस्ट करप्शन के लोगों ने विभिन्न राजनीतिक दलों (कांग्रेस सहित) से मिलना-जुलना और समर्थन मांगना शुरू कर दिया था. इंडिया अगेंस्ट करप्शन की ओर से इंडिया इस्लामिक सेंटर में सभी राजनीतिक दलों के नेताओं को आमंत्रित किया गया था. इसमें कांग्रेस को छोड़ कर लगभग सभी दलों के लोगों ने शिरकत की थी और मीडिया के बीच अपना समर्थन इस आंदोलन को देने की बात भी कही थी. तब तक तो अन्ना ने जनलोकपाल के मसले पर अनशन की घोषणा भी नहीं की थी और न ही इस देश की जनता को यह मालूम था कि अन्ना इस आंदोलन से ज़ुडे हुए हैं. फिर अचानक अप्रैल के अनशन के दौरान न जाने क्या हुआ कि खुद अन्ना हजारे और टीम अन्ना को राजनीतिक दलों से रातों-रात ऩफरत हो गई. हालांकि चौथी दुनिया ने तब भी सवाल उठाया था कि जब राजघाट पर अन्ना के एक दिन के अनशन में सीपीआई (माले) की एक महिला नेता को ज़बरदस्ती मंच से उतारा गया, लेकिन दूसरी ओर, कम्युनिस्ट पार्टी की ही इकाई आइसा के सदस्यों को मंच पर बुलाकर उनसे गाना गवाया गया या बुंदेलखंड कांग्रेस के राजा बुंदेला को मंच पर आने दिया गया. बहरहाल, सात महीने बाद, अब जब कई राजनीतिक दल अन्ना के साथ मंच साझा कर रहे हैं, तो इसमें कहीं न कहीं दोनों पक्ष अपना-अपना फायदा ही देख रहे हैं. लेकिन इस सब से मज़बूत लोकपाल पाने की दिशा में कितना फायदा होगा, इसका इंतज़ार देश के करो़डों लोगों को ज़रूर रहेगा.