झारखंडः कोड़ा प्रकरण पर सियासत गरमाई

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झारखंड के बिरसा मुंडा केंद्रीय कारागार में राज्य के पूर्व मंत्री मधु को़डा के साथ हुए हादसे के बाद सूबे में राजनीतिक हलचल तेज़ हो गई है. कभी अपने विधायकों का समर्थन देकर को़डा को मुख्यमंत्री का ताज पहनाने वाली कांग्रेस का भी पुराना को़डा प्रेम जाग उठा. बस फिर क्या था, को़डा प्रकरण पर राज्य के कांग्रेसी नेता सत्तासीन सरकार की खिंचाई करते नज़र आए. को़डा की पिटाई की जानकारी मिलते ही केंद्रीय पर्यटन मंत्री सुबोधकांत सहाय भी भावुक हो गए. सहाय, राजेंद्र प्रसाद सिंह, वरिष्ठ कांग्रेसी नेता देवकांत धान व सिसई विधायक गीता उरांव ने रिम्स पहुंचकर घायल मधु को़डा का हाल-चाल पूछा. नेताओं ने घटना पर अ़फसोस जताते हुए सरकार की कुव्यवस्था पर चोट की. अगले ही दिन पर्यटन मंत्री के नेतृत्व में राज्य के विपक्षी दलों के गिने-चुने विधायकों ने राज्यपाल को ज्ञापन सौंपा. ज्ञापन का आशय मामले की निष्पक्ष जांच कराना व जेल की व्यवस्था को दुरुस्त कराना था. वहीं मधु कोड़ा ने भी राज्यपाल को अपनी पत्नी गीता को़डा के माध्यम से एक ज्ञापन दिया, जिसमें उन्होंने लिखा कि जेल में मेरी जान को खतरा है. मुझ पर व मेरे साथ जेल में बंद भूतपूर्व मंत्रियों पर हमला एक साज़िश थी. कुछ लोग चाहते हैं कि जनता के लिए जो आवाज़ मैं उठा रहा हूं, वह सदा के लिए शांत हो जाए.

मुंडा की सड़क यात्रा के समानांतर कोई कार्यक्रम शुरू कर कांग्रेस जनता में अपनी अलग छवि बना सकती थी, लेकिन कांग्रेस ने को़डा का हितैषी बनकर कुछ दूसरी ही तस्वीर पेश कर दी. देशव्यापी स्तर पर लोकपाल को लाने के प्रस्ताव के मुद्दे पर कांग्रेस ने अपने प्रति जनता के रु़ख को पहले ही देखा है. ऐसे में आम आदमी के दुख-दर्द को बांटने की जगह को़डा के दर्द में कराह कर झारखंड कांग्रेस किसका कल्याण करना चाहती है?

सूत्रों के हवाले से यह भी खबर आई कि एक हत्या के आरोप में जेल में बंद, खिजरी विधायक सावना लकड़ा (जो मधु को़डा के साथ अनशन में भी शामिल थे) ने डीआईजी के समक्ष यह बयान दिया कि अनशन के दौरान आम क़ैदियों के साथ हमलोगों की मुठभेड़ हो गई थी. गाली-गलौज के साथ हाथापाई शुरू हो गई. बाद में सैप के जवानों ने लाठी भांजते हुए, हम सभी वीआईपी क़ैदियों को वहां से सुरक्षित निकाल लिया. तभी मधु को़डा गिर गए और उन्हें चोट लग गई.

कांग्रेस ने मधु को़डा प्रकरण के विरोध में राजभवन के समक्ष धरना दिया. इस धरने में सुबोधकांत सहाय, गीताश्री उरांव, गीता को़डा व मेमन एक्का ने एक सुर में अर्जुन मुंडा सरकार को ब़र्खास्त करने की मांग की. झारखंड विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष राजेंद्र प्रसाद सिंह ने भी मधु को़डा मामले में मुख्यमंत्री अर्जुन मुंडा का इस्ती़फा मांगा. कांग्रेस कार्यकर्ताओं ने मधु को़डा पर हुए हमले के विरोध में रांची में जगह-जगह मुख्यमंत्री के पुतले फूंके. वहीं मुख्यमंत्री ने इस घटना की जांच रिटायर्ड जस्टिस से करवाने की बात कही है.

बहरहाल, यह पूरा प्रकरण कई सवालों को जन्म दे रहा है. को़डा 4000 करोड़ रुपये के घोटाले एवं 180 करोड़ की अवैध संपत्ति रखने के आरोपी हैं. उनके खिला़फ चल रही जांच में यह बात भी सामने आई कि 2009 में हुए आम चुनाव में उन्होंने वोट खरीदे थे. 10 लाख रुपये की तो केवल मोटरसाइकिलें, चुनाव-प्रचार में बंटने वाले पंपलेट की तरह को़डा ने बांटीं. संभव है कि उपरोक्त आरोपों में पूर्ण सत्यता न हो. लेकिन धुंआ तो वहीं से उठता है, जहां आग होती है. कई संगीन आरोपों से घिरने से झारखंड में को़डा को पंसद करने वाले लोगों की संख्या नगण्य हो गई है. जहां तक जनाधार की बात है, तो को़डा की पार्टी जयभारत समानता पार्टी के कार्यकर्ताओं ने उन पर हुए हमले के विरोध में पूरा कोल्हान क्षेत्र बंद रखने का ऐलान किया था. इस बंद का कोई असर इस क्षेत्र में देखने को नहीं मिला. जगन्नाथपुर विधानसभा क्षेत्र, जहां से मधु को़डा की पत्नी विधायक हैं, वहां भी बंद पूरी तरह निष्फल रहा. ऐसे में मधु को़डा के राजनीतिक भविष्य का अंदाज़ा आसानी से लग सकता है.

यह बात स्मरणीय है कि दो वर्ष पूर्व जब को़डा के घर पर प्रवर्तन निदेशालय व निगरानी का छापा पड़ा था, तो हज़ारों करोड़ रुपये के घोटाले का मामला सार्वजनिक हुआ. इस खुलासे के बाद पूरे देश में सनसनी मच गई थी कि क्या मुख्यमंत्री इतना बड़ा घोटाला कर सकता है? इसी दरम्यान कांग्रेस पर भी चौतऱफा वार होने लगे कि उसकी सरपरस्ती में ही कौड़ा ने इतने बड़े घोटाले को अंजाम दिया. लेकिन कांग्रेस ने इससे पल्ला झाड़ते हुए कहा कि को़डा सरकार के गठन में उनकी कोई भूमिका ही नहीं थी. उन्होंने को़डा को मुख्यमंत्री नहीं बनाया. को़डा जब मुख्यमंत्री थे, तब राज्य में भ्रष्टाचार चरम पर था. झारखंड लोक सेवा आयोग ने रेवड़ियों की तरह नौकरियां बांटीं. मेधावी छात्रों की जगह रसूख व पैसे वाले छात्र बीडीओ व सीओ के पद को सुशोभित करने में सफल हुए. यह बात निगरानी जांच में सामने आ चुकी है. सरकार के कई मंत्रियों ने भी भ्रष्टाचार की बहती गंगा में जमकर डुबकियां लगाईं. यही कारण है कि को़डा की सरकार के आधा दर्जन मंत्री किसी न किसी घोटाले में, अभी उनके साथ ही जेल में दिन काट रहे हैं. को़डा के कथित दलाल विनोद सिन्हा भी उन्हीं के साथ जेल में हैं. को़डा के पैसों को विदेश में निवेश करने वाला हवाला कारोबारी संजय चौधरी भी दुबई में इंटरपोल के हत्थे चढ़ गया है. ऐसे में कांग्रेस का को़डा की मदद के लिए आगे आना क्या साबित करता है. यह बात सर्वमान्य है कि राज्य के पूर्व मुख्यमंत्री का जेल में घायल होना कोई मामूली बात नहीं है. यह घटना जेल व्यवस्था पर प्रश्नचिन्ह लगाती है. लेकिन सरकार ने इस मामले की उच्च स्तरीय जांच कराने का फैसला लिया है. केंद्र सरकार ने भी मामले की पूरी जानकारी राज्य सरकार से तलब की है. राज्य सरकार दोषियों को दंडित करने के लिए प्रतिबद्ध है, ऐसा मुख्यमंत्री ने कहा है. इसके बाद भी सरकार को ब़र्खास्त करने की मांग हैरान करने वाली है. सवाल यह भी उठता है कि को़डा प्रकरण के अलावा क्या विपक्ष के पास, सरकार पर हल्ला बोलने के लिए कोई दूसरा मुद्दा नहीं था. झारखंड में मुद्दों की कमी नहीं है. 15 नवंबर, 2011 को झारखंड के गठन को 11 वर्ष हो गए, लेकिन आज भी राज्य के 56 प्रतिशत गांवों में सड़कें नहीं है. बिजली के अभाव में 68 प्रतिशत गांववासी अंधकार में रहने को विवश हैं. शिक्षा का हाल यह है कि सूबे के 24 ज़िलों में से 12 ज़िलों में साक्षरता दर 50 प्रतिशत से भी कम है. इसके अतिरिक्त झारखंड की ग़रीबी लगातार बढ़ रही है, वहीं माननीयों के वेतन में निरंतर बढ़ोत्तरी हो रही है. इस बारे में आवाज़ उठाने वाला कोई नहीं है. राज्य में नक्सलवाद बेलगाम होता जा रहा है. ऐसा कोई भी माह नहीं होता, जिसमें नक्सलियों द्वारा पुलिसकर्मियों व निरीह नागरिकों की हत्या के मामले सामने न आते हों. इन आतंकवादियों के आगे सरकार बेबस नज़र आती है. तब सरकार को ब़र्खास्त करने की मांग क्यों नहीं की जाती है? सवाल, सरकार को हटाने की मांग करने या नहीं करने का नहीं है. प्रश्न यह है कि कोड़ा के दर्द से परेशान होने वाले नेताओं को क्या झारखंड की अवाम का दर्द महसूस नहीं होता है. वीआईपी को़डा के लिए तो नेतागण धरना-प्रदर्शन व अनशन करते हैं. झारखंड की जनता के लिए ऐसा क्यों नहीं हो पाता है. राजनीतिक मामलों के विशेषज्ञ कहते हैं कि जिस समय को़डा का मुद्दा उछला, उसी समय मुख्यमंत्री झारखंड की बदहाल सड़कों का जायज़ा लेने के लिए सड़क-यात्रा पर निकलने वाले थे. इस यात्रा की महत्ता कम करने के लिए ही विपक्ष (कांग्रेस) ने को़डा मुद्दे पर सरकार को घेरने की कोशिश की है.

मुंडा की सड़क यात्रा के समानांतर कोई कार्यक्रम शुरू कर कांग्रेस जनता में अपनी अलग छवि बना सकती थी, लेकिन कांग्रेस ने को़डा का हितैषी बनकर कुछ दूसरी ही तस्वीर पेश कर दी. देशव्यापी स्तर पर लोकपाल को लाने के प्रस्ताव के मुद्दे पर कांग्रेस ने अपने प्रति जनता के रु़ख को पहले ही देखा है. ऐसे में आम आदमी के दुख-दर्द को बांटने की जगह को़डा के दर्द में कराह कर झारखंड कांग्रेस किसका कल्याण करना चाहती है?

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