मिर्जापुर : अवैध नियुक्तियों के जरिये करोड़ों की चपत

उत्तर प्रदेश में दो मुख्य चिकित्साधिकारियों की हत्या ने पूरे देश का ध्यान स्वास्थ्य विभाग में हो रही लूट की ओर खींचा है. इस विभाग में घोटालों की संस्कृति इतनी व्यापक है कि अन्य विभागों के प्रभावशाली लोगों ने भी बहती गंगा में हाथ धो लिए. कुछ माह पहले पुलिस ने अवैध नियुक्तियों में संलिप्त दो कर्मचारियों को जेल भेजा, किंतु जांच में विभाग का समुचित सहयोग न मिलने के कारण दोनों कर्मचारी न स़िर्फ आसानी से जमानत पा गए, बल्कि निलंबन के बावजूद कार्यालय में काम भी कर रहे हैं और आशंका है कि वे सबूतों के साथ छेड़छाड़ कर सकते हैं. मामले की जांच कर रहे पुलिस उपाधीक्षक डॉ. एस पी सिंह ने बताया कि बार-बार पत्र लिखने के बावजूद विभागीय अधिकारी सहयोग नहीं कर रहे हैं. अभी तक यह अनुमान लगाना कठिन है कि कितने कर्मचारी अवैध रूप से नियुक्त हैं, कितने जनपद में तैनात हैं और कितने जनपद से बाहर. विभाग से क़रीब एक सौ से अधिक कर्मचारियों का विवरण मांगा गया है, जिनके बारे में कहा जा रहा है कि वे अवैध रूप से नियुक्त हैं, किंतु अभी तक किसी स्तर से उत्तर नहीं आया. सिंह बताते हैं कि मौखिक रूप से विभागीय लोगों का रटा-रटाया जवाब होता है कि पत्रावली ग़ायब है.

एक कर्मचारी की आलीशान कोठी बैंक ने अपना बकाया वसूलने के लिए नीलाम कर दी. आश्चर्य का विषय यह है कि बैंक ने इस तृतीय श्रेणी के कर्मचारी को इतनी बड़ी राशि का ऋण दे कैसे दिया. जानकार कहते हैं कि विभाग में ईमानदार अधिकारियों-कर्मचारियों का कोई महत्व नहीं है. वहीं अवैध रूप से नियुक्त कर्मचारी मजे कर रहे हैं.

जांच अधिकारी डॉ. सिंह कहते हैं कि इस घोटाले के लिए कोषागार विभाग और स्वास्थ्य विभाग का मुख्यालय भी ज़िम्मेदार है, क्योंकि इन अवैध नियुक्तियों से जब करोड़ों के अतिरिक्त बजट का बोझ सरकारी खजाने पर पड़ रहा है तो ये विभाग इस गड़बड़झाले से कैसे अनजान रह सकते हैं. विभागीय संलिप्तता का इससे बड़ा प्रमाण भला क्या हो सकता है कि जब पूर्व में इस घोटाले की जांच हुई तो लगभग एक सौ फर्जी नियुक्तियों के बारे में तत्कालीन मुख्य चिकित्साधिकारी ने शासन को लिखित में अवगत कराया कि उक्त कथित नियुक्तियों में उनके फर्जी हस्ताक्षर का इस्तेमाल किया गया, किंतु शासन ने इस फर्जीवाड़े को संज्ञान में नहीं लिया. परिणाम यह हुआ कि अब यह संख्या एक अनुमान के अनुसार ढाई सौ से ज़्यादा हो गई है. यदि शुरुआत में ही कोषागार विभाग और स्वास्थ्य विभाग ने सतर्कता बरती होती तो इतना बड़ा घोटाला न होता. फर्जी कर्मचारी जब विभाग में खप गए तो उन्होंने मात्र वेतन से संतोष नहीं किया, बल्कि जिसे जहां मौक़ा मिला, उसने वहीं खजाने को चूना लगाया. अपनी करतूतों के चलते कई कर्मचारी तो आज भी जेल में हैं.

एक विभागीय कर्मचारी की आलीशान कोठी बैंक ने अपना बकाया वसूलने के लिए नीलाम कर दी. आश्चर्य का विषय यह कि बैंक ने इस तृतीय श्रेणी के कर्मचारी को इतनी बड़ी राशि का ऋण दे कैसे दिया. जानकार कहते हैं कि विभाग में ईमानदार अधिकारियों-कर्मचारियों का कोई महत्व नहीं है. वहीं अवैध रूप से नियुक्त कर्मचारी मजे कर रहे हैं. सूत्र बताते हैं कि जब अवैध नियुक्तियों की बाढ़ आई तो कुछ स्वास्थ्य केंद्रों के अधिकारियों-कर्मचारियों ने फर्जी नियुक्ति पत्र बनाए, उन्हें अपने यहां अभिलेखों में दर्ज किया और वेतन निकालना शुरू कर दिया. यह भी जानने की जहमत नहीं उठाई कि आख़िर ग़ैर स्वीकृत पदों पर बड़ी संख्या में नियुक्तियां कैसे हो गईं और न किसी वरिष्ठ अधिकारी ने अपने निरीक्षण के दौरान इस ओर ध्यान दिया. एक सेवानिवृत्त कर्मचारी ने अपने मानसिक रूप से विकलांग बेटे को भी फर्जी नियुक्ति पत्र थमा दिया और विभाग की कृपा से वह आज भी सेवारत है. कौन सी नियुक्ति फर्जी है और कौन असली, यह पूरे विभाग को पता है.

1994 से हो रहीं इन फर्जी नियुक्तियों के संबंध में 1997 में विधान परिषद सदस्य एवं शिक्षक नेता ओम प्रकाश शर्मा ने तारांकित प्रश्न द्वारा असलियत जाननी चाही थी, किंतु सरकार की ओर से जो उत्तर दिया गया, वह अभिलेखों से मेल नहीं खाता था. सत्तारूढ़ दल के एक विधायक, जिन्हें राज्य मंत्री का दर्जा प्राप्त था, ने भी मुख्यमंत्री से 2006 में शिकायत की थी और बाकायदा कुछ नामों की सूची भी दी थी, किंतु उनकी शिकायत को ठंडे बस्ते में डाल दिया गया. लगातार हो रही शिकायतों की जांच के क्रम में विभाग ने कार्यवाही के नाम पर कुछ पत्राचार अवश्य किया, किंतु फर्जी तरीक़े से नियुक्त लोगों के तार इतने मज़बूत जुड़े हैं कि सब कुछ व्यर्थ रहा. जांच अधिकारी सिंह ने कहा कि पहले तो वह प्रयास कर रहे हैं कि विभाग उन्हें पूरी जानकारी दे. यदि ऐसा न हुआ तो वह सीधे उन कर्मचारियों से उनका पक्ष जानेंगे, जो फर्जी नियुक्ति पाने के आरोपी हैं. यदि कोई संतोषजनक उत्तर न मिला तो उनके साथ उन सभी के विरुद्ध कार्रवाई की सिफारिश करेंगे, जो जांच में सहयोग नहीं कर रहे हैं. डॉ. सिंह ने स्पष्ट किया कि यदि आवश्यक हुआ तो और भी गिरफ्तारियां हो सकती हैं. उन्होंने स्वीकार किया कि तमाम आरोप प्रथमदृष्टया सही लगते हैं, फिर भी वह इस संबंध में पर्याप्त साक्ष्य जुटाने के लिए प्रयासरत हैं.

घोटाले तो लगभग हर स्तर पर हैं, जैसे कि दवा ख़रीद में घोटाला, कमाऊ पदों पर तैनाती में घोटाला, जेनरेटर घोटाला, मरीजों को सुविधाएं उपलब्ध कराने में दलालों के माध्यम से घोटाला. सबसे चर्चित घोटाला सामने आया चुनार स्वास्थ्य केंद्र के कर्मचारियों का वेतन ग़ायब हो जाना. यह वेतन मुख्य चिकित्साधिकारी के कार्यालय से निकाला गया, जिसका चेक बना, स्टेट बैंक ऑफ इंडिया से कैश भी हुआ, किंतु कर्मचारियों को नहीं मिला. आश्चर्य की बात यह कि इतनी बड़ी धनराशि ग़ायब हो गई, किंतु अभी तक किसी के विरुद्ध जांच तक नहीं हुई. जीपीएफ घोटाला भी खासा चर्चित रहा. घोटाले के शिकार लोगों ने कोई आवेदन नहीं किया और लाखों की धनराशि उनके खातों से निकल गई. इस कड़ी में एक घोटाला ऐसा रहा, जो प्रशासन की सक्रियता से पकड़ में आ गया. इसमें फर्जी चेकों के जरिये फर्जी फर्मों को भुगतान किया गया था, लेकिन प्रशासन की सक्रियता के चलते न केवल दोषी पकड़े गए, बल्कि 30 लाख रुपये की धनराशि भी सरकारी खजाने में वापस आ गई.

loading...