राष्ट्र और पूंजी

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ध्‍यान देने की बात यह है कि ये पूंजीवादी धनिक उन्हीं चीज़ों में अपने रुपये लगाते हैं या दूसरों से लेकर लगाते हैं, जहां इनको जल्दी से जल्दी ज़्यादा से ज़्यादा मुना़फा नज़र आता है. देश के लिए क्या काम करना अच्छा है, इसमें इनकी तनिक भी आस्था नहीं.

मान लीजिए, समुद्रों में जहाज़ों को रास्ता दिखाने के लिए लाइट हाऊस की सख्त ज़रूरत है. आयात-निर्यात करने के लिए बंदरगाहों की अत्यंत आवश्यकता है. इसी तरह देश की उन्नति के लिए सैकड़ों ऐसी आवश्यक चीज़ें हैं. इन्हें बनाने में या तो जोखिम ज़्यादा है या इनसे उतनी आमदनी नहीं हो पाती, जितनी दूसरे ढंग के काऱखानों से होती है, तो ये पूंजीवादी लोग कभी भी इन चीज़ों को बनाने में रुपये ख़र्च नहीं करेंगे. ये सब आवश्यक काम राष्ट्र को, सरकार को ही करने पड़ते हैं. हां, यदि सिगरेट का एक काऱखाना लगाना हो तो फौरन पूंजीवादी लोग तैयार होते हैं. वे ज़्यादा से ज़्यादा सिगरेटें बनाकर बड़े-बड़े इश्तिहारों या विज्ञापनों से घोषणा करेंगे कि सिगरेट पीना स्वास्थ्य के लिए बहुत ही लाभप्रद है और उनके काऱखाने में बनी हुई स्पेशल क़िस्म की सिगरेट पीना तो एक प्रकार से धार्मिक पुण्य कार्य ही है. हालांकि यह सरासर झूठ है, पर ऐसी अनेक कंपनियां या फैक्ट्रियां खड़ी करने में, बनाने में इनको ज़रा भी संकोच नहीं होता.

अगर तार की दरें इतनी सस्ती हो जाएं तो स्वाभाविक है, तार भेजने वालों की संख्या बहुत ज़्यादा बढ़ जाएगी. मान लें, चार्ज 1 रुपया प्रति शब्द कर दिया जाए तो संख्या उसी अनुपात से घट जाएगी, तो भी तार विभाग को उतना ही ऩफा होने वाला है. क्योंकि चार्ज घटने-बढ़ने से तार भेजने वालों की संख्या अपने आप ज़्यादा या कम हो जाएगी. किसी भी वस्तु या सेवा की क़ीमत कम या ज़्यादा कर लीजिए, उससे ऩफे पर फर्क़ कदाचित ही पड़ता है.

दूसरी प्रधान बात यह है कि पूंजीवादी जल्दी से जल्दी ज़्यादा से ज़्यादा मुना़फा कमाने की कोशिश करता है. मान लीजिए राष्ट्र के डाकतार विभाग से आप तार भेजते हैं. 10 नए पैसे प्रति शब्द की दर से आपको चार्ज देना होता है. अगर इसे घटाकर 2 नए पैसे प्रति शब्द कर दिए जाएं तो देश को आर्थिक हानि होगी या नहीं? अगर तार की दरें इतनी सस्ती हो जाएं तो स्वाभाविक है, तार भेजने वालों की संख्या बहुत ज़्यादा बढ़ जाएगी. मान लें, चार्ज 1 रुपया प्रति शब्द कर दिया जाए तो संख्या उसी अनुपात से घट जाएगी, तो भी तार विभाग को उतना ही ऩफा होने वाला है. क्योंकि चार्ज घटने-बढ़ने से तार भेजने वालों की संख्या अपने आप ज़्यादा या कम हो जाएगी.

किसी भी वस्तु या सेवा की क़ीमत कम या ज़्यादा कर लीजिए, उससे ऩफे पर फर्क़ कदाचित ही पड़ता है. वहीं तार विभाग यदि पूंजीवादियों की निजी संपत्ति होता तो यक़ीनन वे प्रति शब्द 1 रुपया ही चार्ज करते और जो उससे मुना़फा होता, वह उन लोगों की जेबों में ही जाता. राष्ट्र जिन-जिन उद्योगों को चलाता है उसके चार्ज स्वाभाविक तौर पर नीचे या सस्ते होते ही हैं, क्योंकि उनमें ऩफा करने की मंशा नहीं रहती. अगर ऩफा होता भी है तो वह फिर राष्ट्र के हर व्यक्ति के उपयोग के लिए ख़र्च होता है.भारत में अभी तक जिन-जिन संस्थाओं का राष्ट्रीकरण हुआ है, वहां भी मनोवृत्ति अभी तक पूंजीवादी ही रही है. इसीलिए जनता को उसका पूरा लाभ हो नहीं पाया है. ऐसा हर जगह, जहां परिवर्तन होता है, वहां होता ही है. लोग काम करने की जिस परिपाटी के अभ्यस्त हो जाते हैं उनकी आदतें बदलते-बदलते ही बदलती हैं. आज का राष्ट्रीकरण दुर्भाग्य से स़िर्फ पूंजीवादी सम्राट का बदलना मात्र हुआ है. जहां वे धनिक लोग, जिनकी निजी संपत्ति थी, मनमानी करते थे, उसके बदले में नए बने हुए ओहदेदार सरकारी नौकर या ऑफिसर उतनी ही, बल्कि उससे भी ज़्यादा मनमानी या अत्याचार कर रहे हैं. संतोष इतना ही है कि जहां वे अपने बल पर सतारूढ़ रह सकते हैं. प्रजामत खिला़फ होते ही बड़े से बड़े ओहदे का ऑफिसर भी कुछ ही क्षणों में या दिनों में धराशायी होता दिखाई देता है.

उदाहरण के रूप में बड़ी-बड़ी बिजली की कंपनियों की योजनाएं हैं, जो पूंजीवादी उद्योगपतियों के अधीन हैं, वहां मान लीजिए 10 नए पैसे की यूनिट चार्ज लगता है. बहुत सी जगह राष्ट्रीय बिजली कंपनियां भी हैं या राज्य विद्युत बोर्ड हैं, जहां बिजली पैदा करने का कुल ख़र्च मुश्किल से 2 या 3 नए पैसे प्रति यूनिट आता है तो भी वे ऑफिसर या ओहरेदार अपनी शान समझते हैं कि हम भी 10 नए पैसे या 12 नए पैसे की दर से बिजली बेचकर ज़्यादा मुना़फा कमाकर दिखाएं कि निजी उद्योगपतियों की तरह हम भी व्यापार करना जानते हैं.

दुख है, वे राष्ट्रीकरण के मूल पहलू को जानते ही नहीं. जहां उन पुराने उद्योगपतियों के बिजली के काऱखाने 1 करोड़ की लागत में बने थे, आज उसी प्रकार या साइज का नया काऱखाना लगाने में सरकार को 10 गुना से भी अधिक ख़र्च करना पड़ता है, तो फिर आप उनसे प्रतियोगिता कैसे और क्यों करें? इसका प्रयत्न भी नहीं होना चाहिए. राष्ट्र को तो उत्पादन ख़र्च पर या कहीं-कहीं उससे भी सस्ती दरों में बिजली देनी ही चाहिए या उस श्रेणी के समस्त उद्योग का यानी सारी बिजली कंपनियों का राष्ट्रीकरण हो जाना चाहिए. भारत सरकार की आज की नीति जो करना भी चाहती है और नहीं भी करना चाहती, राष्ट्र को किंकर्तव्यविमूढ़ बना देती है और यह निश्चय ही अवांछनीय है.

जिन-जिन संस्थाओं का राष्ट्रीकऱण हुआ है, उसकी व्यवस्था में जो पूंजीवादी मुना़फा वृत्ति घुसी हुई है, उसका आमूल खंडन होना ही चाहिए. राष्ट्र की संपत्ति, राष्ट्र के हित के लिए, सर्वसाधारण की चीज़ है, उसे कोई भी ऑफिसर या ओहदेदार अपनी बपौती क्यों समझे? सरकारी अ़फसरों के भी आदर्श पूंजीवादी ढंग के ही हैं. उन्होंने भी अपने कारनामों द्वारा देश का शोषण करके करोड़ों रुपये इकट्ठे कर लिए हैं. आज वे भी यही समझते हैं कि मौक़ा हाथ आ गया, क्यों न हम भी करोड़पति बन जाएं? निश्चित ही है कि अवैध मार्गों का अनुसरण किए बिना नौकरशाही के लोग कभी करोड़पति बन नहीं सकते. परिणामस्वरूप भयंकर भ्रष्टाचार फैलता है. पूंजीवादियों या धनिकों की तरह पांचों अंगुली घी में वाली कहावत यहां भी चरितार्थ होती है.

महावीर प्रसाद आर मोरारका का जन्म 12 अगस्त, 1919 को नवलगढ़ (झुंझनू) राजस्थान में हुआ था. उद्योगपति, स्वप्नदृष्टा और लेखक से कहीं अधिक वह उदात्त मानवीय मूल्यों के संवाहक थे. उनकी गणना भारत के प्रमुख उद्योगपतियों में की जाती है.

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