नीतीश जी सुशासन कहां है

बिहार को आगे बढ़ाने और संवारने का सपना न केवल नीतीश सरकार ने देखा है, बल्कि यह सपना हर एक बिहारी के दिल में पिछले छह सालों से पल रहा है. न्याय की पटरी पर तेजी से विकास की दौड़ती गाड़ी देखना एक ऐसा ख्वाब है, जिसे हर बिहारी संजोए हुए है और चाहता है कि यह जितनी जल्दी हो, हक़ीक़त का लबादा पहन आम लोगों को दिखने लगे. लेकिन यह एक कड़वी सच्चाई है कि भ्रष्टाचार की जंजीरें विकास की गाड़ी का पहिया पूरे बिहार में रोक रही हैं. बिना परीक्षा के बहाल ज़्यादातर शिक्षक एप्पल की स्पेलिंग छात्रों को बताते हैं-ए, सट्टल सट्टल पी, एल और ई. दिमाग़ी बुखार से दौ सौ से अधिक बच्चे मुज़फ्फरपुर और गया में मर जाते हैं, पर सरकार संजीदा नहीं हो पाती. जब राजधानी पटना में लोगों को पीने का स्वच्छ पानी नहीं मिल पा रहा है तो पूरे सूबे की बात करना ही बेकार है. बिजली एवं उद्योग के मामले में राज्य सरकार केंद्र की ओर से भेदभाव का रोना रो रही है. निराश करने वाली बात तो यह है कि पहले कार्यकाल की दो उपलब्धियों, सड़कों एवं क़ानून व्यवस्था की चमक फीकी पड़ने लगी है. महिला सशक्तिकरण की बात तो की जा रही है, पर उनके अपहरण और हत्या के मामले काफी बढ़ गए हैं. नक्सलियों का दबदबा लगातार बढ़ रहा है और यह बात सामने आ गई है कि सूबे में विकास का पहिया नक्सलियों द्वारा हरी झंडी दिखाए बिना आगे बढ़ना नामुमकिन है.

सूचना के अधिकार के तहत शिव प्रकाश राय द्वारा मांगी गई सूचना में अपराध अनुसंधान विभाग ने बताया कि सूबे में महिलाओं के अपहरण व दहेज हत्या के मामले काफी बढ़ गए हैं. 2005 में महिलाओं के अपहरण के 854 व दहेज हत्या के 1044 मामले दर्ज किए गए. इसी तरह 2006 में अपहरण के 925 व दहेज हत्या के 1006, 2007 में अपहरण के 1184 व दहेज हत्या के 1091, 2008 में अपहरण के 1494 व दहेज हत्या के 1233, 2009 में अपहरण के 1997 व दहेज हत्या के 1188, 2010 में अपहरण के 2552 व दहेज हत्या के 1307 मामले और 2011 के अगस्त माह तक अपहरण के 1856 व दहेज हत्या के 953 मामले दर्ज हो चुके हैं. ये तो सरकारी आंकड़े हैं. सूबे के लोग अच्छी तरह जानते हैं कि यहां आधे से अधिक मामले दर्ज होते ही नहीं है. खासकर महिलाओं से जुड़े मामले तो और भी दर्ज नहीं हो पाते हैं.

शुरुआत महिला सशक्तिकरण के बड़े-बड़े दावों से करते हैं. सरकार कहती है कि पंचायतों में आरक्षण देकर महिलाओं को आगे आने का मौक़ा दिया गया. इसके अलावा महिलाओं के कल्याणार्थ बहुत सारे कार्यक्रम चलाए गए हैं, लेकिन महिलाओं पर हुए अत्याचारों के सरकारी आंकड़ों पर ही नज़र डाली जाए तो सही तस्वीर सामने आ जाएगी. सूचना के अधिकार के तहत शिव प्रकाश राय द्वारा मांगी गई सूचना में अपराध अनुसंधान विभाग ने बताया कि सूबे में महिलाओं के अपहरण व दहेज हत्या के मामले काफी बढ़ गए हैं. 2005 में महिलाओं के अपहरण के 854 व दहेज हत्या के 1044 मामले दर्ज किए गए. इसी तरह 2006 में अपहरण के 925 व दहेज हत्या के 1006, 2007 में अपहरण के 1184 व दहेज हत्या के 1091, 2008 में अपहरण के 1494 व दहेज हत्या के 1233, 2009 में अपहरण के 1997 व दहेज हत्या के 1188, 2010 में अपहरण के 2552 व दहेज हत्या के 1307 मामले और 2011 के अगस्त माह तक अपहरण के 1856 व दहेज हत्या के 953 मामले दर्ज हो चुके हैं. ये तो सरकारी आंकड़े हैं. सूबे के लोग अच्छी तरह जानते हैं कि यहां आधे से अधिक मामले दर्ज होते ही नहीं है. खासकर महिलाओं से जुड़े मामले तो और भी दर्ज नहीं हो पाते हैं. नेशनल क्राइम रिकॉर्ड ब्यूरो की ताजा रिपोर्ट (भारत में अपराध-2010) के मुताबिक़ भी बिहार में अपहरण की वारदातें बढ़ी हैं. नक्सलियों का दबदबा इतना बढ़ गया है कि बिना लेवी दिए निर्माण कार्य शुरू करने की कल्पना भी नहीं की जा सकती. अभी हाल में ही जमुई ज़िले में 15 मज़दूरों को नक्सली इसलिए उठा ले गए कि उन्हें इस काम की लेवी नहीं मिली थी. मज़दूरों को छुड़ाने के सारे प्रशासनिक प्रयास धरे रह गए और लेवी पर समझौता हो जाने के बाद ही मज़दूरों को छोड़ा गया. बिहार के 20 से ज़्यादा ज़िले नक्सल प्रभावित हो गए हैं. नक्सलियों के बंद के दौरान कई ज़िलों में कर्फ्यू जैसी स्थिति पैदा हो जाती है. आम आदमी के लिए ज़रूरी सुविधाओं की बात करें तो सड़क, बिजली, पानी एवं स्वास्थ्य को लेकर स्थिति मुस्कराने वाली नहीं है. सरकार के लाख दावों के बावजूद जन कल्याण की कई योजनाओं में कई छेद हैं.

आंकड़े थोड़ा-बहुत ऊपर-नीचे होने से ज़्यादा महत्वपूर्ण यह है कि अब संगठित अपराध में कमी आई है. पहले राज्य में संगठित तरीके से फिरौती के लिए जो अपहरण होते थे, उनमें कमी आई है. अपहरण के पीछे निजी दुश्मनी भी एक बड़ा कारण है.

            -अभयानंद, पुलिस महानिदेशक

वैश्वीकरण के दौर में आज बिहार का गया-बोधगया शहर विदेशियों के लिए एक महत्वपूर्ण धार्मिक पर्यटन केंद्र के रूप में जाना जाता है. चाहे वे हिंदू धर्मावलंबी हो या बौद्ध धर्मावलंबी. हिंदुओं के बीच गया पितरों (पूर्वजों) के मोक्ष धाम के रूप में प्रसिद्ध है. सनातन धर्म ग्रंथों के अनुसार, पूरी दुनिया में गया ही एकमात्र ऐसा स्थान है, जहां पितरों को मोक्ष की प्राप्ति श्राद्ध या पिंड दान करने से होता है. यही कारण है कि देश-विदेश के सनातन धर्मावलंबी वर्षपर्यंत गया आते हैं. इसी प्रकार पूरी दुनिया के बौद्ध धर्मावलंबी गौतम बुद्ध की तपोभूमि एवं ज्ञान भूमि होने के कारण बोधगया आते हैं. इन सबके बावजूद इन शहरों की स्थिति बहुत अच्छी नहीं है. नागरिक सुविधाओं के नाम पर स़िर्फ कुछ सड़कें ठीकठाक नज़र आती हैं. बहुत सारी सड़कें जर्जर हैं. शहर के सीवरेज सिस्टम और बिजली आपूर्ति की हालत बहुत दयनीय है. बताया जाता है कि गया शहर का ड्रेनेज सिस्टम जितना अच्छा था, उतना किसी शहर में नहीं था. अंग्रेज अभियंताओं ने  साहेबगंज के नाम से जब गया शहर बसाया था तो पूरी तैयारी के साथ शहर की विभिन्न योजनाओं का निर्माण कराया गया था. ड्रेनेज सिस्टम, पेयजल आपूर्ति व्यवस्था, सफाई व्यवस्था बहुत अच्छी थी. पूरे  शहर में ट्राम की तरह कूड़े-कचरे के लिए गाड़ियां चला करती थीं, लोग उनमें ही कूड़ा-कचरा फेंका करते थे और शहर सुंदर और साफ नज़र आता था, लेकिन आज गया में नगर निगम होने के बाद भी सारे सिस्टम फेल हो गए हैं. बिना योजना के रोज बन रहे मकानों- कॉलोनियों में ड्रेनेज सिस्टम के अभाव, सार्वजनिक पेयजल आपूर्ति व्यवस्था में कमी एवं बिजली आपूर्ति न होने के चलते पूरा शहर अस्त-व्यस्त नज़र आता है. गया नगर निगम के सक्रिय रहने के बावजूद शहर के सभी 53 वार्डों के अधिकांश छोटे-बड़े नाले जाम रहते हैं, जिससे कई मुहल्लों में नाले का पानी सड़कों-गलियों में पसरा रहता है. मगध के अन्य शहरों औरंगाबाद, जहानाबाद, नवादा, शेरघाटी, टिकारी, दाऊद नगर, अरवल आदि शहरों में नगर परिषद या नगर पंचायत होने के बावजूद स्थिति नारकीय है. पेयजल आपूर्ति व्यवस्था आज़ादी के बाद भी ठीक नहीं हो पाई. जो थोड़ा-बहुत काम हुआ, वह ज़रूरत के हिसाब से ऊंट के मुंह में जीरे के समान है. बिजली आपूर्ति व्यवस्था में भी कोई खास सुधार नहीं हुआ. विभिन्न योजनाओं के तहत खंभे गाड़े गए, तार खींचे गए, लेकिन हालत जस की तस है. शहरों में हर खंभे पर विद्युत तारों का जाल फैल गया है, जिसे बदलने या सुधारने का कोई प्रयास आज तक नहीं किया गया. बिजली आपूर्ति की स्थिति बहुत ख़राब है. गया शहर को प्रतिदिन 50 मेगावाट बिजली की ज़रूरत है, लेकिन इस पर्यटन सीजन में भी मात्र 25 मेगावाट बिजली की आपूर्ति हो रही है. गया-बोधगया में बिजली मिल भी रही है, मगध प्रमंडल के अन्य शहरों की हालत तो कहने लायक़ नहीं है. बिजली घंटे-दो घंटे ठहर जाए तो लोग बिजली विभाग नहीं, भगवान को धन्यवाद देते नज़र आते हैं. कथित सुशासन में मगध प्रमंडल के लोगों को नागरिक सुविधाओं का लाभ नहीं मिल पा रहा है. सरकारी महकमे और अधिकारी चाहे जितनी लंबी-चौड़ी बातें कर लें, लेकिन धरातल पर कुछ ठोस नज़र नहीं आता. शेखपुरा ज़िले की कई प्रमुख सड़कें जर्जर हैं और कई बनने के साथ ही टूट गईं. प्रधानमंत्री सड़क योजना के तहत बनने वाले सड़कों का हाल और भी ख़राब है. शेखपुरा-मेहूस मार्ग का निर्माण कार्य पिछले चार सालों से अधूरा पड़ा है, यहां स़िर्फ पत्थर बिछाकर छोड़ दिया गया. ज़िले की पहचान सामस विष्णु धाम होते हुए नालंदा को जोड़ने वाले नेमदारगंज-कोन मार्ग का भी यही हाल है. पिछले चार सालों में इस मार्ग पर महज गिट्टी बिछाने का काम हुआ है. मुख्यमंत्री को बेलाब गांव में सेवा यात्रा के तहत भोजन करना था. बभनबीघा-खलीलचक मार्ग बेहद जर्जर होने की वजह से उन्हें सामस होते हुए दस किलोमीटर घूमकर वहां जाना पड़ा. वहीं नालंदा से शेखपुरा होते हुए पटना ज़िले के मोकामा तक जाने वाला एनएच-82 भी पिछले पांच सालों से निर्माणाधीन है. सीमांचल की हालत इससे ज़्यादा ख़राब है. अररिया, कटिहार और किशनगंज में स़िर्फ छह से आठ घंटे बिजली मिल रही है.

स्वास्थ्य विभाग तो लगता है अपनी मर्जी से चल रहा है. पूर्णिया के सिविल सर्जन पर तमाम आरोप हैं, पर वह ठाठ से नौकरी कर रहे हैं. किशनगंज एवं अररिया के ज़िला अस्पतालों में सभी ज़रूरी दवाएं उपलब्ध नहीं हैं. जो उपलब्ध हैं, उन्हें हासिल करने के लिए लोगों को सोलह जतन करने पड़ते हैं. सहरसा इस बरसात में भी टापू बना, क्योंकि पुल एवं सड़कें टूट जाने के कारण वह पटना से केवल रेल मार्ग से ही कई दिनों तक जुड़ा रहा. मुंगेर एवं भागलपुर की बात करें तो बिजली और पानी को लेकर यहां बवाल ज़्यादा है. मांग की तुलना में कम आपूर्ति ने यहां लोगों को परेशान कर रखा है. जनता ने कई बार सड़कों पर उतर कर विरोध जताया. सरकार के लाख दावों के बावजूद यहां पीने का साफ पानी उपलब्ध नहीं है. जमालपुर में कई नई सड़कों की हालत ख़राब है. सारण प्रमंडल में नक्सलियों के बढ़ते क़दमों ने नई मुसीबत पैदा कर दी है. सरकार दावा करती है कि सूबा न्याय के साथ विकास कर रहा है. सभी चाहते हैं कि ऐसा हो, पर केवल कहने से काम चलने वाला नहीं है.

कांटी बिजली घर का भविष्य अधर में

बिजली को चुनावी मुद्दा बनाने के बावजूद सरकार बिजली उत्पादन को लेकर बहुत संजीदा नहीं दिखती. कभी वह संसाधनों के अभाव का रोना रोती है तो कभी केंद्र की उपेक्षा का. कांटी एवं बरौनी थर्मल को फिर से चालू कराने के सारे प्रयास अभी तक केवल काग़ज़ों में दिखते हैं. मुज़फ्फरपुर के कांटी में नया बिजली घर बनाने की योजना पिछले 20 वर्षों से पूरी नहीं हो पाई. इस परियोजना को केंद्र सरकार की हरी झंडी 1990 में ही मिल गई थी और अगले एक वर्ष के अंदर स्वीकृति की तमाम औपचारिकताएं भी पूरी कर ली गईं. बावजूद इसके दो दशक बीत गए, परियोजना धरातल पर नहीं आ पाई, पर, कसरत जारी है. परियोजना कब तक ज़मीन पर दिखेगी, कोई नहीं जानता. बिहार बिजली बोर्ड के तत्वावधान में कांटी में पहले चरण के तहत 250 मेगावाट का बिजलीघर बनना था और दूसरे चरण के तहत विस्तार करते हुए उसकी क्षमता 500 मेगावाट किया जाना था. इसके लिए 152 करोड़ रुपये की योजना स्वीकृत की गई और 10वीं से 11वीं पंचवर्षीय योजना में इसे तैयार कर लेना था. राज्य सरकार से आधिकारिक स्वीकृति के बाद 500 मेगावाट क्षमता के इस बिजलीघर को वर्ष 1990 में पर्यावरण स्वीकृति और 1991 में नेशनल एयरपोर्ट अथॉरिटी क्लीयरेंस मिल गया. इसी साल एसपीसीबी से एनओसी मिल गया. ज़मीन और पानी की भी व्यवस्था हो चुकी थी. सेंट्रल इलेक्ट्रिसिटी अथॉरिटी से मई 1993 में टेक्नो इकोनॉमिक क्लीयरेंस मिलने के बाद 1995 में योजना आयोग ने भी परियोजना को हरी झंडी दे दी. इतना सब कुछ होने के बावजूद बिजलीघर बनाने की तमाम कोशिशें काग़ज़ से बाहर नहीं आ पाईं. नियमित मॉनिटरिंग और धन के अभाव के कारण परियोजना वहीं अटकी रही. इस विलंब के कारण राज्य बिजली संकट से जूझता रहा, वहीं अब अचानक उसे 110 मेगावाट का झटका लग गया है. एयरपोर्ट अथॉरिटी की आपत्ति के बाद कांटी बिजलीघर की क्षमता में 110 मेगावाट की कटौती हो गई है. एयरपोर्ट अथॉरिटी ने 18 वर्षों के बाद 16 जुलाई, 2008 को इसकी चिमनी की ऊंचाई को लेकर आपत्ति की और उसे कम करने के लिए कहा. लिहाज़ा सुरक्षा की दृष्टि से चिमनी की ऊंचाई घटाई गई, जिससे बिजलीघर की क्षमता भी घटानी पड़ी और इसमें 55-55 मेगावाट की कमी हो गई. अब वहां 195-195 मेगावाट की दो यूनिटों का निर्माण होगा. हालांकि नीतीश सरकार ने वहां इतनी ही क्षमता की तीसरी यूनिट भी बनाने की योजना बनाई है. इस बिजलीघर का बजट तीन करोड़ रुपये तक पहुंच गया है.

अपराध

पटना अपराध के लिहाज़ से अव्वल रहा. ज़िले में हत्या की 304, अपहरण की 283 और दुष्कर्म की 50 घटनाएं दर्ज की गईं. दुष्कर्म की सबसे ज़्यादा घटनाएं कटिहार में दर्ज हुईं तो अपहरण के लिहाज़ से पटना और मुज़फ्फरपुर अव्वल रहे.

श्रेणी

2010

2009

2004

संज्ञेय अपराध

1,27,453

1,22,931

1,08060

हत्या

3,362

3,152

3,948

हत्या का प्रयास

2,915

3,068

2,995

दुष्कर्म

795

929

1,390

अपहरण

3,674

3,222

3,413

डकैती

644

654

1,319

दंगा-फसाद

8,809

8,554

9,733

(स्रोत-नेशनल क्राइम रिकॉर्ड ब्यूरो)

टॉप टेन ज़िले (हत्या के दर्ज मामले)

पटना (304), मोतिहारी (169), मुजफ्फरपुर (148), गया (139),  रोहतास (132), वैशाली (128), बेगूसराय (126), समस्तीपुर (119), नालंदा (117) और सारण (112).

हत्या की वजह (2010)

संपत्ति विवाद                916
निजी दुशमनी                441
लाभ के लिए                 352
सेक्स संबंधी                 187
दहेज                         168
राजनीतिक                    24
उग्रवादी हिंसा                 22

बंद चीनी मिलों का ताला कब खुलेगा

चीनी उद्योग के मोर्चे चीपर राज्य सरकार अब तक कुछ खास नहीं कर पाई. बंद चीनी मिलों को दोबारा चालू करने के लिए निजी कंपनियों के 32 प्रस्ताव आए हैं, जिन पर विचार किया जा रहा है. ये मिलें पिछले 15 सालों से बंद पड़ी हैं. इस दिशा में सरकार के तीन प्रयास बेनतीजा रहे हैं. उद्योग विभाग के प्रधान सचिव सी के मिश्रा ने बताया कि चौथी बिडिंग में क़रीब 32 कंपनियों के प्रस्ताव आए हैं. जिन बंद मिलों के लिए निविदाएं मांगी गई थीं, उनमें बनमनखी, फतुहा, वारसलिगंज गुरारू, गोरौल, सीवान, न्यू सावन, समस्तीपुर एवं लोहट आदि शामिल हैं. राज्य चीनी मिल निगम की ये मिलें 1994-95 से बंद पड़ी हैं. नीतीश सरकार ने सत्ता संभालने के बाद इन मिलों को दोबारा चालू करने की दिशा में पहल करते हुए इन्हें निजी हाथों को सौंपने का निर्णय लिया. तीन राउंड की निविदा के बाद मात्र छह मिलों के लिए निजी कंपनियां सामने आई, जिनमें लौरिया, सुगौली, मोतीपुर, रैयाम, बिहटा एवं सकरी चीनी मिलें शामिल हैं. एचपीसीएल, इंडिया पोटाश लिमिटेड, तिरहुत इंडस्ट्रीज एवं प्रिस्टान नामक कंपनियों को उक्त मिलें लीज के आधार पर सौंपी गई हैं. शेष नौ मिलों के लिए तीन राउंड की बिडिंग में कामयाबी न मिलने के बाद गन्ना उद्योग विभाग ने हाल में चौथे राउंड की निविदा आमंत्रित की. इस बार स्थिति बदली हुई नज़र आई. निजी कंपनियों ने काफी दिलचस्पी दिखाई और उनके 32 प्रस्ताव आए. देखना है कि बंद चीनी मिलों का ताला खुल पाता है या नहीं.

इंजीनियरिंग कॉलेज: टीचर कम, लैब नहीं, हॉस्टल नदारद

इंजीनियरिंग कॉलेजों में बुनियादी सुविधाएं बहाल करने की कोशिश की जा रही है. आने वाले दिनों में इसका सकारात्मक परिणाम दिखेगा.

अरुण कुमार, प्रधान सचिव,

विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी विभाग

छात्रों को तकनीकी शिक्षा बिहार में ही मिल सके, इसके लिए वित्तीय वर्ष 2009-10 में चार नए शहरों में इंजीनियरिंग कॉलेज खोले गए. वर्तमान में छह इंजीनियरिंग कॉलेज हैं, लेकिन उनमें बुनियादी सुविधाओं का घोर अभाव है. सरकार का दावा है कि इंजीनियरिंग कॉलेजों में बुनियादी सुविधाएं बहाल करने के प्रयास किए जा रहे हैं. मुज़फ्फरपुर, भागलपुर, नालंदा, मोतिहारी, गया एवं दरभंगा में राज्य सरकार के इंजीनियरिंग कॉलेज हैं. सभी को मिलाकर एक सत्र में 1,390 छात्रों का नामांकन विभिन्न संकायों (ट्रेड) में होता है. चार वर्षीय पाठ्यक्रम के अंतर्गत लगभग पांच हज़ार विद्यार्थी इन इंजीनियरिंग कॉलेजों में पढ़ाई कर रहे हैं. छात्रों की शिकायत है कि न पर्याप्त संख्या में शिक्षक हैं और न लैब. हॉस्टल न होने के कारण छात्रों को कॉलेज आने-जाने में परेशानी होती है. सूत्रों की मानें तो जिस समय कॉलेज खोले गए, उस समय भवन निर्माण भी शुरू नहीं हुआ था. वैकल्पिक व्यवस्था के तहत चल रहे इन कॉलेजों में पढ़ाई कर रहे छात्रों की हालत अच्छी नहीं है. छात्रों का प्रतिनिधिमंडल मुख्यमंत्री, शिक्षा मंत्री और विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी मंत्री से मिलकर गुहार लगा चुका है, पर कोई ध्यान नहीं दिया गया. विभागीय अधिकारी स्वीकार करते हैं कि कॉलेजों में नियमित शिक्षकों की संख्या 60 से भी कम है, लेकिन ठेके पर 300 से अधिक शिक्षकों की बहाली की गई है. विजिटिंग प्रोफेसर भी समय-समय पर बुलाए जाते हैं. पढ़ाई के स्तर को लेकर भी छात्रों को शिकायत है. विभागीय अधिकारी स्वीकार करते हैं कि 15 हज़ार रुपये मानदेय के कारण बेहतर शिक्षकों को खोजने में परेशानी हो रही है. मानदेय 25 हज़ार रुपये करने का प्रस्ताव कैबिनेट को भेजा गया है. विजिटिंग प्रोफेसर को 400 रुपये प्रति क्लास दिए जाते हैं, जिसे बढ़ाकर 600 रुपये करने का प्रस्ताव कैबिनेट को भेजा गया है. विजिटिंग प्रोफेसरों को कॉलेज आने-जाने का किराया देने का भी प्रस्ताव है. उन्हें 25 क्लास लेने की अनुमति रहेगी.

इंजीनियरिंग कॉलेज

सीट

मुजफ्फरपुर इंस्टीट्यूट ऑफ टेक्नोलॉजी

290

भागलपुर कॉलेज ऑफ इंजीनियरिंग

200

नालंदा कॉलेज ऑफ इंजीनियरिंग

240

मोतिहारी कॉलेज ऑफ इंजीनियरिंग

180

गया कॉलेज ऑफ इंजीनियरिंग

240

दरभंगा कॉलेज ऑफ इंजीनियरिंग

240

One thought on “नीतीश जी सुशासन कहां है

  • December 23, 2011 at 5:00 PM
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    Chief minister of Bihar is not having magic stick to solve all problems at a time because these problems are created five thousand years back by Manuwadi due to caste system in the country , Henace it will take time to solve it but he is trying best.

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