सुशासन बाबू की कहानी

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नीतीश कुमार की सरकार ने बिहार में अपने सुशासन के छह साल पूरे कर लिए. सूबे की जनता ने नीतीश के कामों को देखते हुए प्रचंड बहुमत से उन्हें दूसरी बार सूबे की सत्ता सौंप दी थी. नीतीश कुमार देश में एक ऐसे नेता के तौर पर उभरे, जो बिहार के विकास को लेकर न स़िर्फ गंभीर दिखाई दिया, बल्कि गंभीरता से काम भी करता दिखा. नीतीश के शासन करने के तरीक़ों की तारी़फ भी हुई. नीतीश इस मामले में भाग्यशाली रहे कि उन्हें विरासत में पंद्रह सालों तक चले लालू-राबड़ी राज का बिहार मिला. एक ऐसा बिहार, जिसे लेकर पूरे देश में एक तरह का उपहास था, बिहारी होना एक तरह से गाली का पर्याय बन चुका था. जिस धरती से लोकतंत्र की शुरुआत हुई, जहां गौतम बुद्ध को ज्ञान मिला, जहां विश्वस्तरीय नालंदा विश्वविद्यालय था, जहां से जयप्रकाश नारायण ने इमरजेंसी के ख़िला़फ बिगुल फूंका, उस बिहार की पहचान लालू का भदेसपन और मसखरापन हो गया था, लेकिन नीतीश के कामों ने एक बार फिर से बिहार को उसकी पुरानी पहचान दिलाने की ओर अग्रसर कर दिया है. बिहार का ग्रोथ रेट देश के  विकसित राज्यों के बराबर पहुंच गया है.

इस किताब में अरुण सिन्हा ने विस्तार से नीतीश के राजनीति में आने और उनकी असफलताओं की कहानी को भी पेश किया है. किस तरह से नीतीश को शुरुआती चुनावों में हार मिली, लेकिन राजनीति से नीतीश ने हार नहीं मानी. किस तरह से लोहिया के साथ सक्रिय होने के बाद नीतीश जयप्रकाश आंदोलन में भी सक्रिय रहे. दरअसल अगर हम देखें तो इस किताब में जयप्रकाश आंदोलन के बाद की घटनाएं दर्ज हैं.

नीतीश कुमार ने किस तरह से बिहार के बिगड़ते और बदहाल हालात को संभाला, उन हालात और स्थितियों पर उनके कॉलेज के मित्र एवं वरिष्ठ पत्रकार अरुण सिन्हा की किताब आई है-नीतीश कुमार एंड द राइज ऑफ बिहार. तक़रीबन चार सौ पन्नों की इस किताब को हम नीतीश कुमार की जीवनी तो नहीं कह सकते हैं, लेकिन उसमें नीतीश के बचपन, उनके कॉलेज के दिनों की कहानियां, उनके घर-परिवार, उनकी शादी, उनके शुरुआती संघर्ष और उनके राजनीतिक पड़ावों की दास्तां है. इस पुस्तक की शुरुआत होती है चौबीस नवंबर 2010 से, जिस दिन बिहार विधानसभा चुनाव के वोटों की गिनती शुरू हो रही थी. अरुण सिन्हा नीतीश कुमार के बेहद अच्छे मित्र हैं. दोनों ने कॉलेज में साथ पढ़ाई की थी, बल्कि इस किताब में तो इस बात का भी जिक्र है कि नीतीश, अरुण सिन्हा, नरेंद्र सिंह और कौशल किशोर चार लोगों की जोड़ी इंजीनियरिंग कॉलेज के जमाने में बनी थी. इस बात का जिक्र नहीं है कि यह जोड़ी अभी बरक़रार है, लेकिन किताब को पढ़ने के बाद यह एहसास हो जाता है कि जो दोस्ती पटना इंजीनियरिंग कॉलेज में हुई थी, वह बाद के दिनों में और प्रगाढ़ हो गई.

इस किताब में नीतीश कुमार के बारे में कई अनछुए और दिलचस्प प्रसंग भी उजागर हुए हैं. 1972 की सर्दियों में जब नीतीश के पिता ने उनकी शादी मंजू कुमारी से तय कर दी, तब भी नीतीश की हिम्मत नहीं हुई कि वह जाकर मंजू कुमारी से मिलें. जबकि मंजू पटना विश्वविद्यालय के मगध महिला कॉलेज में ही पढ़ रही थीं, जो नीतीश के  इंजीनियरिंग कॉलेज से कुछ ही दूर था. कौशल, नरेंद्र और अरुण सिन्हा हमेशा नीतीश की इस बात को लेकर खिंचाई करते थे. एक दिन नीतीश के तीनों दोस्तों ने तय किया कि वे मगध महिला कॉलेज जाकर मंजू से मिलेंगे. तीनों मिशन मंजू पर निकले और फोटो के आधार पर उन्होंने नीतीश कुमार की होने वाली पत्नी की पहचान की, उनसे मिले और विजयी भाव से हॉस्टल लौट आए. वहां आकर नीतीश से कौशल ने कहा, तुमसे पहले हमने तुम्हारी पत्नी को देख लिया है, वह बेहद ख़ूबसूरत और प्यारी हैं और उनकी हंसी उनकी सुंदरता में चार चांद लगा देती है. कौशल की इस बात पर नीतीश ने जोरदार ठहाका लगाया और कहा कि अब तो उनके पास तीन तिलंगों का दिया एक्सेलेंस सर्टिफिकेट है. इससे नीतीश कुमार जैसे धीर-गंभीर छवि वाले राजनेता के व्यक्तित्व के दूसरे पहलू से भी रूबरू होने का मौक़ा मिलता है. नीतीश के पिता ने शादी में बाइस हजार रुपये दहेज लेना तय किया था, जो नीतीश के विरोध के कारण संभव नहीं हो सका और पटना के लाजपत राय हॉल में बेहद सादगी से शादी संपन्न हुई. इस तरह के कई और दिलचस्प प्रसंग इस किताब में हैं, जो कि लेखक के एक दोस्त होने के नाते प्रामाणिक भी प्रतीत होते हैं.

इस किताब में अरुण सिन्हा ने विस्तार से नीतीश के राजनीति में आने और उनकी असफलताओं की कहानी को भी पेश किया है. किस तरह से नीतीश को शुरुआती चुनावों में हार मिली, लेकिन राजनीति से नीतीश ने हार नहीं मानी. किस तरह से लोहिया के साथ सक्रिय होने के बाद नीतीश जयप्रकाश आंदोलन में भी सक्रिय रहे. दरअसल अगर हम देखें तो इस किताब में जयप्रकाश आंदोलन के बाद की घटनाएं दर्ज हैं. दर्ज तो उससे पहले की भी हैं, लेकिन चूंकि इस किताब के केंद्र में नीतीश कुमार हैं, इस वजह से जयप्रकाश के पूर्व ज़्यादातर घटनाएं नीतीश के इर्द-गिर्द हैं, लेकिन बाद के दिनों में लेखक ने श्रमपूर्वक हर तरह की घटनाओं को एक क्रम देते हुए बेहद सावधानी से उसे बिहार की राजनीति का ऐतिहासिक दस्तावेज़ बना दिया है.

नीतीश कुमार और अस्सी के दशक के बिहार की बात हो तो यह संभव नहीं है कि लालू प्रसाद यादव उसमें छूट जाएं. नीतीश कुमार एंड द राइज ऑफ बिहार में भी लालू की शुरुआती राजनीति और बाद में मंडलवादी राजनीति पर भी लेखक ने लगातार टिप्पणी की है. कई बातें पहले से ज्ञात हैं, लेकिन कई बातें सामने नहीं आई थीं. लाल-नीतीश के संबंधों के बनने से लेकर बिगड़ने तक की प्रामाणिक दास्तान इस किताब में है. लेकिन जैसा कि मैंने पहले कहा कि इस किताब में कुछ रोचक और दिलचस्प कहानियां हैं. इसी तरह की एक कहानी है लालू यादव से जुड़ी. नीतीश कुमार जब पहली बार मुख्यमंत्री बने तो राबड़ी देवी को पटना का 1, अणे मार्ग का बंगला खाली करना था. हालांकि यह बंगला मुख्यमंत्री के बंगले के तौर पर चिन्हित नहीं था, लेकिन फिर भी नीतीश उसके प्रतीकात्मक महत्व को लेकर उस बंगले में ही रहना चाहते थे. प्रतीकात्मक महत्व यह कि पिछले पंद्रह सालों से सत्ता का केंद्र रहे उस बंगले में अब सूबे का नया निजाम रहेगा. लेकिन लालू ने तमाम तिकड़बाज़ी करके चार महीने तक बंगला खाली नहीं किया. दिलचस्प यह है कि जब बंगला खाली किया तो उसके लॉन से एक फीट मिट्टी खुदवा कर अपने नए घर के लॉन में डलवाई. ऐसा इस अंधविश्वास की वजह से किया गया कि धरती मां के आशीर्वाद से फिर से उनका भाग्य चमक जाएगा. इसके अलावा लालू के घर खाली करने के बाद जब अफसरों ने जब 1, अणे मार्ग को अपने क़ब्ज़े में लिया तो कमरों की दीवारों पर सिंदूर के निशान, हथेलियों की छाप के अलावा परिसर में कई जगह रंगे हुए पत्थर गड़े हुए पाए गए. माना गया कि ये सब अनुष्ठान नीतीश राज के जल्द ख़त्म हो जाने के लिए किए गए थे. लालू यादव ग़रीबों के मसीहा के तौर पर उभरे थे, लेकिन चारा घोटाले में फंसने के  बाद ज्योतिष और पूजा-पाठ पर उनका विश्वास बढ़ गया था. चारा घोटाले की जांच जैसे-जैसे आगे बढ़ रही थी, लालू के हाथों की उंगलियों में रत्नों की संख्या बढ़ने लगी थी. इसके अलावा अरुण सिन्हा ने इस किताब में नीतीश कुमार के कामों को भी परखा है. सूबे के विकास से संबंधित नीतीश की योजनाओं से लेकर अपराध पर लगाम लगाने के लिए हाईकोर्ट की मदद जैसे क़दमों की भी चर्चा इस किताब में है. कुल मिलाकर यह एक पत्रकार मित्र की अपने राजनेता मित्र पर लिखी किताब है, जिसमें लेखक अपने मित्र मोह को त्याग नहीं पाता है. मित्र मोह की वजह से यह किताब कमजोर नहीं होती है, हां इतना अवश्य होता है कि सुशासन की तस्वीर तो दिखती है, लेकिन स्वास्थ्य एवं शिक्षा के क्षेत्र में सुशासन को जरा कम परखा गया है.

(लेखक IBN7 से जुड़े हैं)

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