पाक-अमेरिकी संबंधों का बिगड़ना भारत के हित में नहीं है

अमेरिका और पाकिस्तान के बीच संबंध लगातार बिगड़ते जा रहे हैं. अमेरिकी राष्ट्रपति बराक ओबामा ने हालांकि नाटो हमले में मारे गए पाकिस्तानी सैनिकों के प्रति संवेदना व्यक्त की तथा पाकिस्तानी राष्ट्रपति आस़िफ अली ज़रदारी से फोन पर बात भी की, लेकिन उन्होंने इसके लिए मा़फी मांगने से सा़फ तौर पर इंकार कर दिया तथा इसे नाटो की भूल बताया, जिसके बारे में जांच की जा रही है. इसके कारण पाकिस्तानी सरकार ने न केवल अ़फग़ानिस्तान में पाकिस्तान के रास्ते होने वाली सप्लाई पर रोक लगाई, बल्कि अमेरिका से शम्सी हवाई अड्डा खाली भी करवा लिया. दोनों देशों के बीच तनाव लगातार बढ़ता दिखाई दे रहा है. हालांकि अभी तक ऐसी किसी कार्रवाई की घोषणा अमेरिका की ओर से नहीं की गई है, जिससे निश्चित तौर पर यह कहा जाए कि दोनों देशों के बीच संबंध सुधर ही  नहीं सकते हैं. अमेरिका की तऱफ से कहा जा रहा है कि आतंकवाद के खिला़फ जंग में उसे पाकिस्तान की अत्यधिक आवश्यकता है. लेकिन इस आवश्कता के बावजूद अमेरिका कुछ ऐसे क़दम उठा देता है, जिसकी अनदेखी कर पाना पाकिस्तान के लिए नामुमकिन हो जाता है. ओसामा बिन लादेन की हत्या के समय पाकिस्तान सरकार को सूचित नहीं करना या उसे अपने विश्वास में नहीं लेना, समय-समय पर उसके क्षेत्रों पर हमला कर उसके सैनिकों को नुक़सान पहुंचाना, ऐसी ही कुछ कार्रवाइयां हैं. पाकिस्तानी प्रधानमंत्री यूसु़फ रज़ा गिलानी ने कहा है कि अमेरिका पाकिस्तान के साथ काम तो कर रहा है, लेकिन उसे पाकिस्तान पर भरोसा नहीं है. पाकिस्तान ने नाटो की सप्लाई रोक रखी है. साथ ही पाकिस्तान के केंद्रीय दूरसंचार मंत्री अरबाब आलमगीर खान ने कहा है कि अ़फग़ानिस्तान में नाटो सेना के लिए सामान की आपूर्ति के लिए पाकिस्तान की सड़कों के इस्तेमाल से अतिरिक्त बोझ पड़ा है, जिससे मुल्क को क़रीब एक अरब डॉलर का नुक़सान हुआ है. खान का कहना है कि पाकिस्तानी विदेश मंत्रालय ने इसके लिए नाटो से मुआवज़े की मांग भी की है. अमेरिका भी संबंध सुधारने के लिए कोई विशेष प्रयास नहीं कर रहा है. ऐसे में अभी लग रहा है कि दोनों के  बीच फिलहाल तनाव बना रहेगा, लेकिन यह तनाव कहीं संबंध ही न बिगाड़ दे, इस बात की संभावना बन रही है.

आतंकवादियों ने उन पर हमला किया, जिससे बीस से अधिक ट्रकों में आग लग गई. पाकिस्तान सरकार तालिबान के साथ बातचीत कर रही है, लेकिन यह बातचीत केवल शांति बनाए रखने या युद्ध विराम के लिए होगी. ऐसा समझौता हो भी गया तो क्या फायदा होगा. इसका लाभ तो पाकिस्तानी तालिबान को ही होगा और वह अपनी ताक़त बढ़ाने के लिए इस समझौते का उपयोग करेगा. पहले भी ऐसा ही होता आया है. अगर पाकिस्तान में चरमपंथी ताक़तें मज़बूत होती हैं, तो इसका प्रभाव निश्चित तौर पर भारत पर पड़ेगा और यहां आतंकवादियों की गतिविधियां त़ेज होंगी.

अब सबसे महत्वपूर्ण प्रश्न हमारे सामने यह है कि इन दोनों देशों के बीच संबंध खराब होने का भारत पर क्या प्रभाव पड़ेगा. अगर वास्तविकता की बात करें तो दोनों के बीच के संबंधों में दरार आने से भारत पर प्रतिकूल प्रभाव ही पड़ेगा. पाकिस्तान में आतंकवाद पर नियंत्रण के लिए अमेरिका का हस्तक्षेप ज़रूरी है. पाकिस्तान के चरमपंथी संगठन कभी नहीं चाहते कि अमेरिका के पाकिस्तान के साथ रिश्ते अच्छे हों, क्योंकि इससे उन्हें ही ऩुकसान उठाना पड़ता है. अमेरिका स्वयं भी इन संगठनों के विरुद्ध कार्रवाई करता है तथा पाकिस्तान के ऊपर भी इसके लिए दबाव डालता है. चूंकि अमेरिका से पाकिस्तान को आर्थिक तथा सामरिक सहायता मिलती है, जिसके कारण पाकिस्तान को उसकी बात माननी पड़ती है. अभी तक ऐसा ही होता आया है. लेकिन अगर अमेरिका और पाकिस्तान के बीच संबंध टूटते हैं तो आतंकी संगठन इसका फायदा उठाएंगे. अभी हाल की घटनाओं से इसका अनुमान लगाया जा सकता है. जब पाकिस्तान ने नाटो की सप्लाई बंद कर दी तो उसकी कई गाड़ियां सीमा पर खड़ी थीं, जिसे आतंकवादियों ने निशाना बनाया.

आतंकवादियों ने उन पर हमला किया, जिससे बीस से अधिक ट्रकों में आग लग गई. पाकिस्तान सरकार तालिबान के साथ बातचीत कर रही है, लेकिन यह बातचीत केवल शांति बनाए रखने या युद्ध विराम के लिए होगी. ऐसा समझौता हो भी गया तो क्या फायदा होगा. इसका लाभ तो पाकिस्तानी तालिबान को ही होगा और वह अपनी ताक़त बढ़ाने के लिए इस समझौते का उपयोग करेगा. पहले भी ऐसा ही होता आया है. अगर पाकिस्तान में चरमपंथी ताक़तें मज़बूत होती हैं, तो इसका प्रभाव निश्चित तौर पर भारत पर पड़ेगा और यहां आतंकवादियों की गतिविधियां त़ेज होंगी. इसके अलावा पाकिस्तान को मिलने वाली अमेरिकी सहायता खत्म होने से पाकिस्तानी की आर्थिक स्थिति प्रभावित होगी. ग़ौरतलब है कि अमेरिका 2001 से अभी तक 18 बिलियन डॉलर की सहायता दे चुका है. अगर आगे पाकिस्तान पर यूरोप एवं अमेरिका द्वारा आर्थिक प्रतिबंध लगाया जाता है, तो वहां बेरोज़गारी, महंगाई बढ़ेगी जिसका फायदा वहां के आतंकवादी संगठन उठाएंगे तथा मज़बूत होंगे. इसका खामियाज़ा भारत को भी उठाना पड़ेगा. केवल आंतरिक ही नहीं, बल्कि विदेशी संबंध के लिहाज़ से भी अमेरिका और पाकिस्तान के बीच संबंध का तनावपूर्ण होना भारत के लिए अहितकर है. चीन तो इंतज़ार ही कर रहा है कि कब पाकिस्तान की तऱफ से हरी झंडी मिले. हालांकि पाकिस्तान तथा चीन के बीच संबंध अच्छे हैं, लेकिन पाकिस्तान के अमेरिका के नज़दीक होने के कारण चीन उसका भारत के विरुद्ध उस स्तर पर इस्तेमाल नहीं कर पाता. अगर एक बार अमेरिका दोनों के बीच से हट गया तो फिर चीन का रास्ता सा़फ हो जाएगा. यह भारत के हित में नहीं है. चीन और पाकिस्तान का गठबंधन भारत के लिए खतरनाक होगा. बहरहाल पाक-अमेरिकी संबंध के तनाव को कम करने के लिए अगर भारत कुछ कर सकता है तो उसे करना चाहिए. पाकिस्तान और अमेरिका के बीच अच्छे संबंध भारत के अनुकूल हैं और पाकिस्तान को भी सही मायने में अपने यहां के आतंकवाद पर क़ाबू रखना है, तो उसे अमेरिका के साथ समझौता कर लेना चाहिए. पाकिस्तान अपनी संप्रभुता के साथ समझौता न करे, लेकिन बीच का रास्ता तो उसे निकालना ही पड़ेगा. इसलिए इस समय प्रश्न अमेरिका और पाकिस्तान का नहीं है, बल्कि इस बात का है कि दोनों के बीच का गठबंधन टूटने का कितना असर वैश्विक शांति पर पड़ेगा. कहीं इन दोनों के बीच का तनाव का लाभ आतंकवादी संगठन अपने हित साधने के लिए न उठा लें. अमेरिका को भी पाकिस्तान की भावनाओं की क़द्र करनी चाहिए. ऐसा न हो कि बहुत देर हो जाए और फिर चाहकर भी कुछ किया नहीं जा सके.