पाकिस्तानी लोकतंत्र खतरे में

पाकिस्तान की लोकतांत्रिक तरीक़े से चुनी गई सरकार कमज़ोर पड़ गई है. वह चाहकर भी आतंकवादियों के खिला़फ कड़ी कार्रवाई नहीं कर पा रही है, क्योंकि पाकिस्तान में रह रहे चरमपंथियों को सेना का समर्थन प्राप्त है. सेना के कुछ अधिकारी उनके प्रति नरम हैं और कठोर कार्रवाई करने के पक्ष में नहीं हैं. दूसरी तऱफ सरकार को इस बात का भरोसा नहीं है कि अगर उसने आतंकवादियों को शह देने वाले सैन्य अधिकारियों खासकर सेनाध्यक्ष के कियानी के खिला़फ कोई क़दम उठाया तो उनका अस्तित्व बना रहेगा. इस बात की जानकारी एक गुप्त ज्ञापन से होती है, जिसे अमेरिका के तत्कालीन सेना प्रमुख माइकल मुलेन को सौंपा गया था. इसमें इस बात का ज़िक्र किया गया है कि ओसामा बिन लादेन की हत्या के बाद राष्ट्रपति आस़िफ अली ज़रदारी ने सेना की कमान बदलने और चरमपंथी संगठनों से नाता तोड़ने की बात कही थी. वह पाकिस्तान के खुफिया तंत्र में मौजूद उस धड़े को हटाना चाहते थे, जिस पर चरमपंथियों को शह देने तथा उसके प्रति नरम रु़ख अपनाने का आरोप है. लेकिन ज़रदारी को इसके लिए अमेरिकी ताक़त की ज़रूरत है, क्योंकि उन्हें इस बात का डर है कि सेना की कमान बदलने के चक्कर में कहीं उनकी गद्दी ही खतरे में न पड़ जाए, यानी सैन्य विद्रोह न हो जाए. हालांकि अमेरिका में पाकिस्तान के राजदूत हुसैन हक्कानी ने ऐसा कोई ज्ञापन सौंपे जाने की बात से इंकार किया है. मगर पूर्व अमेरिकी सैन्य प्रमुख माइक मुलेन ने कहा है कि उन्हें एक ज्ञापन तो सौंपा गया था, लेकिन उन्होंने इस पर कोई ध्यान नहीं दिया. माइक मुलेन ने ध्यान दिया या नहीं, यह तो वही बता सकते हैं, लेकिन पिछले दिनों उन्होंने पाकिस्तान की खु़फिया एजेंसी आईएसआई पर यह आरोप लगाया था कि अ़फग़ानिस्तान में अमेरिकी दूतावास तथा सैनिकों पर जिस हक्कानी नेटवर्क के आतंकवादियों का हमला हो रहा है, उसे आईएसआई का सहयोग प्राप्त है. हो सकता है कि मुलेन ने पाकिस्तानी राजदूत के इस गुप्त ज्ञापन के बाद यह समझ लिया हो कि इस आरोप से आईएसआई के कुछ अधिकारियों को हटाने में पाकिस्तानी सरकार को मदद मिलेगी. लेकिन उनका दांव सही नहीं पड़ा, क्योंकि पाकिस्तानी अवाम अमेरिका के इस हस्तक्षेप का विरोध करने लगी, जिसके बाद सरकार के सामने कोई विकल्प ही नहीं था कि वह कोई कार्रवाई कर सके.

गुप्त ज्ञापन संबंधी विवाद की शुरुआत उस समय हुई, जब पाकिस्तानी मूल के एक अमेरिकी व्यापारी मंसूर एयाज़ का एक लेख ब्रिटिश समाचार-पत्र फिनांशियल टाइम्स में छपा, जिसमें इस बात का ज़िक्र किया गया था कि पाकिस्तान सरकार के मुखिया सेना की कमान एवं आईएसआई के कुछ लोगों को जिनका आतंकवादियों के प्रति नरम रु़ख है, बदलना चाहते हैं, जिसके लिए उन्हें अमेरिकी ताक़त की ज़रूरत है.

गुप्त ज्ञापन संबंधी विवाद की शुरुआत उस समय हुई, जब पाकिस्तानी मूल के एक अमेरिकी व्यापारी मंसूर एयाज़ का एक लेख ब्रिटिश समाचार-पत्र फिनांशियल टाइम्स में छपा, जिसमें इस बात का ज़िक्र किया गया था कि पाकिस्तान सरकार के मुखिया सेना की कमान एवं आईएसआई के कुछ लोगों को जिनका आतंकवादियों के प्रति नरम रु़ख है, बदलना चाहते हैं, जिसके लिए उन्हें अमेरिकी ताक़त की ज़रूरत है. इसके बाद पाकिस्तान की राजनीति गर्म हो गई. विपक्षियों ने सरकार पर हमला शुरू कर दिया तथा संयुक्त अधिवेशन बुलाने की मांग की जाने लगी. चूंकि यह आरोप अमेरिका में पाकिस्तान के राजदूत हुसैन हक्कानी पर लगाया गया था, इसके कारण पाकिस्तानी सरकार ने हक्कानी को तलब किया तथा स्पष्टीकरण मांगा. साथ ही उसने संसद को आश्वासन दिया कि हक्कानी के स्पष्टीकरण के बाद ही मामला सा़फ होगा. मंसूर एयाज़ का कहना है कि उन्होंने हुसैन हक्कानी के कहने पर ही इस ज्ञापन को तैयार किया था. हक्कानी इसे अस्वीकार कर रहे हैं. उन्होंने इस्ती़फे की पेशकश करते हुए जांच में पूरा सहयोग देने की बात कही है. साथ ही जांच के लिए अपना ब्लैक बेरी मोबाइल भी सौंपने की बात कही है. रहमान मलिक ने भी कहा है कि सरकारी स्तर पर कोई ज्ञापन नहीं दिया गया है, लेकिन उन्होंने यह स्वीकार किया है कि हुसैन हक्कानी और मंसूर एयाज़ के बीच संदेश के मा़र्फत बातचीत हुई थी. ज्ञापन सौंपने की बात को एक अन्य अमेरिकी अधिकारी ने भी स्वीकार किया है. अमेरिका के पूर्व राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार जेम्स जोंस ने कहा है कि उन्होंने तत्कालीन सैन्य प्रमुख माइक मुलेन को विवादास्पद पत्र सौंपा था. उनका कहना है कि बीते मई माह में उन्होंने यह पत्र माइक मुलेन को सौंपा था, लेकिन उस समय वह अमेरिकी सरकार के अधिकारी पद पर नहीं थे.

अब प्रश्न यह उठता है कि इस रहस्योद्‌घाटन का निहितार्थ क्या है? इससे यह तो साबित हो गया कि ज़रदारी को इस बात का डर था कि कभी भी अश़फाक़ परवेज़ कियानी सत्ता पर क़ाबिज़ हो सकते हैं. पाकिस्तान का लोकतंत्र खतरे में हैं और सेना पर भरोसा नहीं किया जा सकता है. लेकिन अगर यह ज्ञापन सच है तो इसका पर्दा़फाश करने के पीछे की मंशा क्या है?  मंसूर एयाज़ एक व्यवसायी हैं. उन्होंने कहा है कि उनके पास 9 और 10 मर्ई का फोन रिकॉर्ड मौजूद है, जिससे यह बात सा़फ हो जाएगी कि उसे ज्ञापन तैयार करने और अमेरिकी अधिकारी को सौंपने के लिए कहा गया था. उस ज्ञापन पर किसी के हस्ताक्षर नहीं हैं. अगर यह घटना मई की है तो इसे पांच महीने बाद क्यों उठाया गया? कहीं यह अमेरिका के इशारे पर तो नहीं हो रहा है? दो अमेरिकी अधिकारियों ने भी इसे स्वीकार किया है. आ़खिर जब यह गुप्त ज्ञापन था तो इसे गुप्त ही रहने देना चाहिए. एक व्यवसायी की बात का उतना असर नहीं होता, जितना दोनों अमेरिकी अधिकारियों का हुआ है. उन्होंने तो साबित कर दिया कि ज्ञापन सौंपा गया था. इससे तो यही साबित होता है कि सब अमेरिका की शह पर किया जा रहा है. कहीं पाकिस्तान में घटती साख से अमेरिका घबरा तो नहीं गया है. वह चाहता है कि इस विवाद से सेना और सरकार में कटुता बढ़ जाए. इस कटुता के कारण कहीं सेना और आईएसआई ने सरकार के खिला़फ कोई क़दम उठाया तो उसे ज़रदारी के समर्थन से पाकिस्तान में हस्तक्षेप करने का मौक़ा मिल जाएगा. इसी कारण वहां से आधिकारिक तौर पर तो कोई बयान नहीं आया, लेकिन उसके दो अधिकारियों, जिसमें एक अब अधिकारी हैं भी नहीं, ने इस बात को स्वीकार कर लिया है. अगर ऐसा नहीं है तो अमेरिका को सा़फ तौर पर इंकार कर देना चाहिए था कि ऐसा कोई ज्ञापन पाकिस्तानी सरकार या ज़रदारी की ओर से आया है. हो तो कुछ भी सकता है, लेकिन अमेरिका की नीयत सही नहीं दिखाई दे रही है. अब देखना यह है कि पाकिस्तान इस विवाद का हल कैसे निकालता है.

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