सुप्रीम कोर्ट से सेवानिवृत हुए जस्टिस काटजू को प्रेस काउंसिल ऑफ इंडिया का अध्यक्ष नियुक्त किया गया. पहले से ही यह शिकायत थी कि प्रेस काउंसिल एकदम कमज़ोर संस्था है और इसके पास अधिकार इतने कम हैं कि इसका प्रेस पर कोई नियंत्रण नहीं है. जस्टिस काटजू ने दो सच बातें कह दीं तो लोग उछल प़डे. उन्होंने कहा कि आजकल के संवाददाता, पत्रकार और प्रेस में काम करने वाले लोगों का स्तर का़फी गिर गया है. वे उस बौद्धिक स्तर के नहीं हैं, जिसकी पत्रकारों से अपेक्षा की जाती है. अब इसमें ग़लत क्या है? चार पूंजीपति जो पब्लिशर हैं और उनके जो नुमांइदे हैं प्रेस काउंसिल में, वॉक आउट कर गए. दरअसल, जब काटजू अपने बयान को सही बताते हुए उस पर क़ायम रहे तब वे वॉक आउट कर गए. क्यों वॉक आउट कर गए? शायद शर्म के मारे वॉक आउट किया होगा. क्योंकि वे जानते हैं कि वे ऐसे लोगों के साथ अ़खबार चला रहे हैं, जो जर्नलिस्ट होने के क़ाबिल ही नहीं हैं. जर्नलिज्म के लिए मापदंड होना चाहिए. कोई भी स़िर्फ बीए या एमए होने से जर्नलिस्ट होने का अधिकारी नहीं हो जाता. इसके लिए उसके पास पत्रकारिता के लिए आवश्यक योग्यता भी होनी चाहिए. जस्टिस काटजू ने तो बहुत मामूली बातें कही हैं और ये लोग इसी पर नाराज़ हो गए. जस्टिस काटजू ने दूसरी बात यह कही कि जब प्रेस काउंसिल बना था, तब इलेक्ट्रॉनिक मीडिया था ही नहीं. उन्होंने कहा कि इलेक्ट्रॉनिक मीडिया को भी इसके दायरे में रखना चाहिए. वे लोग इसका भी विरोध कर रहे हैं. यह तो हास्यास्पद बात है. मैं प्रेस नियंत्रण के खिला़फ हूं. प्रिंट मीडिया रहेगी दायरे में, लेकिन इलेक्ट्रॉनिक मीडिया नहीं रहेगी. ऐसा क्यों? यह तो जनभावना को ज़्यादा प्रभावित करता है. यह कहना कि हर अ़खबार वाला, हर इलेक्ट्रॉनिक मीडिया वाला पाक-सा़फ है. उसका दामन सा़फ है. यह तो सही नहीं है. फ्रीडम ऑफ द प्रेस की बात तो संविधान में है ही नहीं. फ्रीडम ऑफ स्पीच है. लेकिन उस अधिकार को आपने एक्स्टेंड कर दिया. एक पूंजीपति अ़खबार वाला अपने मुलाज़िमों के माध्यम से एक लाख कॉपी छपवा कर किसी का चरित्र हनन कर देगा. उस आदमी के पास क्या बचाव है? कोर्ट में जाना. सब जानते हैं, इंडिया में डिफेमेशन लॉ कितना कमज़ोर है. 20 साल तक तो सुनवाई नहीं होगी उसकी यानी उसका चरित्र गया. यह अधिकार प्रेस को या इलेक्ट्रॉनिक मीडिया को नहीं होना चाहिए. इसलिए ज़रूरी है कि एक मज़बूत प्रेस कांउसिल हो. ज़रूरी नहीं कि आप जस्टिस काटजू के बयान से सहमत हों. यह उनकी निजी राय है. लेकिन प्रेस कांउसिल एक प्रभावशाली संस्था हो, इसमें क्या मतभेद हो सकता है. इलेक्ट्रॉनिक मीडिया उसके दायरे में आए, इसमें क्या मतभेद हो सकता है. मुझे लगता है कि अब समय आ गया है कि दो टूक बात की जानी चाहिए. जिसे दो टूक बात करनी चाहिए, उसकी दो टूक बात सुनने की आदत चली गई है. सब घुमा-फिराकर बात करते हैं और नतीजा कुछ नहीं होता है. ये 2जी और अन्य घोटाले, सब इसी के परिणाम हैं. इसलिए अभी भी देर नहीं हुई है. प्रधानमंत्री जी, अपनी चुप्पी तो़डें और इस मामले में हस्तक्षेप करें.
सरकार पैसा निकालकर दे या फिर बैंकों को कहे उनको लोन दें, लेकिन वेतन देने में अगर एक दिन का भी विलंब होता है तो यह साज़िश मानी जाएगी कि सरकार चाहती है कि सरकारी काऱखाने बंद हो जाएं और उन्हीं पैसों से प्राइवेट काऱखानों को बचाया जाए. यह उदारीकरण की नीति 1991 से शुरू हुई है. यह 20 सालों में किस हद तक चली गई, प्रधानमंत्री को इस पर ग़ौर करना चाहिए. इसके साथ ही उनको सबसे पहले एयर इंडिया के कर्मचारियों का तीन-चार महीने का बक़ाया वेतन चुका देना चाहिए. साथ ही कर्मचारियों को हर महीने 30 तारी़ख को वेतन देने की व्यवस्था करनी चाहिए. सुप्रीम कोर्ट के अनुसार किसी को भी अपना उद्यम या उद्योग बंद करने का अधिकार है, लेकिन चालू रखकर वेतन न देने का अधिकार नहीं है.
दूसरी तऱफ इस बात की चर्चा है कि किंगफिशर एयरलाइंस बहुत घाटे में है, उसको बचाने की कोशिशें जारी हैं और सरकार अपने बैंकों द्वारा कुछ न कुछ रियायत देना चाहती है. लेकिन प्रसिद्ध उद्योगपति राहुल बजाज का कहना है कि प्राइवेट सेक्टर को बचाने के लिए टैक्स पेयर का पैसा लगाना ग़लत है. जो प्राइवेट सेक्टर नहीं चल पा रहे हैं, उन्हें बंद कर देना चाहिए. यह बात तो अपनी जगह है. लेकिन इससे ज़्यादा आश्चर्य की बात यह है कि एयर इंडिया जो शत-प्रतिशत सरकार की संस्था है, चार महीने से अपने कर्मचारियों को वेतन नहीं दे पा रही है. स़िर्फ पायलट ही नहीं अन्य कर्मचारियों को भी वेतन नहीं मिल पा रहा है. यह तो बहुत निंदनीय है. प्राइवेट सेक्टर को ऐसा अधिकार नहीं है. अगर निजी क्षेत्र के कर्मचारियों को वेतन समय पर नहीं मिलता है तो वे लेबर कमिश्नर के पास जा सकते हैं. निजी क्षेत्र को धन की समस्या हो सकती है, लेकिन सरकार के साथ तो ऐसी समस्या नहीं है. सरकार पैसा निकालकर दे या फिर बैंकों को कहे उनको लोन दें, लेकिन वेतन देने में अगर एक दिन का भी विलंब होता है तो यह साज़िश मानी जाएगी कि सरकार चाहती है कि सरकारी काऱखाने बंद हो जाएं और उन्हीं पैसों से प्राइवेट काऱखानों को बचाया जाए. यह उदारीकरण की नीति 1991 से शुरू हुई है. यह 20 सालों में किस हद तक चली गई, प्रधानमंत्री को इस पर ग़ौर करना चाहिए. इसके साथ ही उनको सबसे पहले एयर इंडिया के कर्मचारियों का तीन-चार महीने का बक़ाया वेतन चुका देना चाहिए. साथ ही कर्मचारियों को हर महीने 30 तारी़ख को वेतन देने की व्यवस्था करनी चाहिए. सुप्रीम कोर्ट के अनुसार किसी को भी अपना उद्यम या उद्योग बंद करने का अधिकार है, लेकिन चालू रखकर वेतन न देने का अधिकार नहीं है. एयर इंडिया को बंद करना है तो सरकार हिम्मत कर के तय करे. एयर इंडिया चालू भी रखेंगे, पायलटों और इंजीनियरों आदि से काम भी लेंगे, लेकिन उनको तनख्वाह नहीं देंगे. यह बिलकुल क्षमा करने लायक़ अपराध नहीं है.
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आदरणीय ,
अनपढ़ वही नहीं होता जिसे अक्षर ज्ञान न हो, बल्कि वह भी जो विषय का ज्ञाता न होकर प्रवचन करे. समाचर जगत ऐसे ही विद्वानों से भरा पडा
है. केवल सिनेमा,क्रिकेट, अपराध( राजनीती सहित) में दखल देने वाले सभी विषयों के बारे में अनाप सनाप बोलते रहते हैं. चेहरा सुंदर व संपर्क ही काफी हैं ऐसे ज्ञानियों के लिए. जितनी धनवान चेनल होगी उतनी ही धमक के साथ यह विषय एक्सपर्ट होंगे. इन धमक दारों के टेप अपने निरा राडिया
के साथ सुने होंगे, ये दलाल खबर मोड़ कर बेचते हें और खबर छुपा कर भी (ब्लैक मेल) कर भी कमाते हैं.
सुरेश बडोला