सर्वोदय अर्थव्यवस्था

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राष्ट्र पिता महात्मा गांधी ने अपनी अर्थव्यवस्था का जो स्वरूप बतलाया था, उसे सर्वोदय अर्थव्यवस्था की संज्ञा मिली है. शायद यह व्यवस्था भारत की दयनीय दशा को देखते हुए इस देश के लिए उपयुक्त और आदर्श मान भी ली जाए. पर भारत को अपनी स्वतंत्रता की रक्षा करते हुए विश्व के दूसरे देशों के साथ इज़्ज़त से जीना है या क़ायम रहना है तो सर्वोदय अर्थव्यवस्था, जिसकी मूल भित्ति त्याग है, कैसे संभव होगी? हज़ारों वर्ष पहले भारत की जनसंख्या एक करोड़ की थी, तब कुटीर उद्योगों से बने, हाथ से कते हुए, हाथ से बने हुए कपड़े पहनने के लिए पर्याप्त रहे होंगे. पर आज भारत की 40 करोड़ प्रजा के लिए बिना मशीनों की सहायता के कपड़ा कैसे मिल सकता है?

मान लीजिए, तन ढका भी जा सके तो क्या यह स्थिति सुंदर होगी, जबकि विश्व के दूसरे देश, यहां तक कि आपके पड़ोसी राज्य (जो कल तक आपके ही अंग थे) अच्छे बढ़िया मलमल और खिनखाफ के कपड़ों से अपने अंगों को सजाएंगे और यहां के निवासी मोटी खादी या रेजी के कुर्ते और धोती लादे फिरेंगे? यहां के लोगों का हृदय निश्चय ही हीनभावना से भर जाएगा और उन तमाम वस्तुओं को प्राप्त करने की लालसा जाग्रत हुए बिना रहेगी नहीं. परिणाम वही होगा, जो आज से 200 वर्षों पहले भारत में अंग्रेजी राज्य की स्थापना के समय हुआ था.

गोबर के उपले इस देश में ईंधन के काम आते हैं. अगर यों कहें कि अब तक की भारतीय अर्थव्यवस्था गोबर व्यवस्था ही रही है, तो भी अत्युक्ति नहीं होगी. सर्वोदय उस स्थिति से देश को बाहर निकालने की प्रेरणा नहीं देता. अहिंसा का पाठ घोल-घोलकर पिलाया जा रहा है. जहां अहिंसा का अर्थ स़िर्फ कायरता ही रह जाता है. आपके घर पर कोई हमला कर दे और आप चुपचाप उसे बर्दाश्त कर लें अथवा उस पर तर्कावरण चढ़ाकर भागते फिरें तो यह अहिंसा नहीं, यह कायरता ही मानी जाएगी. मगर इस भेद को समझने की शक्ति भी कहां है? अहिंसा का नारा हिमालय की चोटी पर खड़े होकर लगाया जा रहा है. जहां पंचशील का नियमित पारायण किया जाता हो, वहां कब और किन परिस्थितियों में कहें कि अब अहिंसा की आवश्यकता नहीं रही. अहिंसा के इस छद्म आवरण में देश की शक्ति क्षीण हो रही है. उसका मानसिक धरातल गिर रहा है, इसे कैसे समझाया जाए?

देश की स्वतंत्रता की रक्षा करने के लिए सबसे बड़ी आवश्यकता है, साधन-सामग्री की बहुलता. साधन-सामग्री कुटीर उद्योगों में या हथकरघों से नहीं बन पाएगी. इन साधनों को पैदा करने के लिए आधुनिक विशाल यंत्रों की ही आवश्यकता होगी. बड़े-बड़े कारखाने बनाने होंगे. बड़ी-बड़ी फैक्टरियां लगानी होंगी. योजना कमीशन इस क्षेत्र में कार्य कर रहा है. उद्योगीकरण करने पर पर्याप्त जोर भी है. राष्ट्रीय और पूंजीवादी दोनों स्तरों पर उद्योगों का विकास समुचित ढंग पर हुआ भी है. पर जब तक निश्चित मार्ग और नीति का अवलंबन न हो, तब तक पूर्ण सफलता मिलना संभव नहीं दिखाई देता. अच्छे-अच्छे समझदार सचिव या मंत्री भी अभी तक उसी सर्वोदय अर्थव्यवस्था अथवा गोबर सभ्यता या कुटीर उद्योग का समर्थन जोरों से कर रहे हैं. फिर कैसे विश्व के दूसरे देशों के मुक़ाबले में खड़े रहना संभव होगा? यही प्रश्न चिंत्य है. महाभारत युग में भी भगवान व्यास ने उपदेश देते वक्त यही कहा था कि अगर आपके पास साधन-सामग्री नहीं है तो रण में विजय आपको नहीं मिल सकती, प्रकर्ष मूलाय रणे जयश्री (किरातार्जुनीय काव्य).

ये साधन, इन तमाम सामग्रियों को जुटाने के लिए आवश्यक है कि ज़्यादा से ज़्यादा तादाद में बड़े-बड़े कारखाने, फैक्ट्रियां स्थापित हों और हर वस्तु का अधिकतम उत्पादन हो. जीवन की आवश्यक वस्तुओं की तो कमी जरा भी रहे नहीं. साथ ही अन्य वस्तुएं भी पर्याप्त मात्रा में उपलब्ध हों. यह तब ही संभव है, जब राष्ट्र उद्योगशील बनकर आगे प्रगति करे और 500 वर्ष पहले की त्याग गरिमामयी अर्थव्यवस्था को अलग ताक पर रख दे. राष्ट्रीयकरण में जो खास आपत्ति बताई जाती है, वह यह है कि इससे विदेशी पूंजी पर्याप्त मात्रा में प्राप्त नहीं हो सकती. अगर भारत का उद्योगीकरण करना अपेक्षित है तो यह देश अपने बल पर या अपने धन से तो बड़े बड़े उद्योगों को स्थापित करने में समर्थ है नहीं, विदेशों से सहायता अनिवार्य रूप से लेनी ही पड़ेगी.

महावीर प्रसाद आर मोरारका का जन्म 12 अगस्त, 1919 को नवलगढ़ (झुंझनू) राजस्थान में हुआ था. उद्योगपति, स्वप्नदृष्टा और लेखक से कहीं अधिक वह उदात्त मानवीय मूल्यों के संवाहक थे. उनकी गणना भारत के प्रमुख उद्योगपतियों में की जाती है.

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