अमेरिका-ईरान : तकनीकी श्रेष्ठता दिखाने की कोशिश

अमेरिका और ईरान के बीच का विवाद गहराता जा रहा है. कुछ समय पूर्व अमेरिका का एक ड्रोन (आरक्यू-170 सेंटीनेल) ईरान की सीमा में घुस गया था. ईरान ने अमेरिका के इस मानवरहित विमान को अपने क़ब्ज़े में ले लिया. इसके बाद दोनों देशों ने इस घटना की व्याख्या अपने-अपने स्तर पर करनी शुरू कर दी. अमेरिका का कहना है कि उसके इस विमान ने अपना नियंत्रण खो दिया, जिसके कारण वह ईरान की सीमा में प्रवेश कर गया, जबकि ईरान उसके इस तर्क को मानने के लिए तैयार नहीं है. यही नहीं अमेरिका ने यह भी कहा है कि तकनीकी खराबी की वजह से यह मानवरहित विमान ईरान के हाथ लगा है, जबकि ईरान का कहना है कि कोई तकनीकी खराबी की वजह से यह विमान उसके हाथ नहीं लगा है, बल्कि उसने इसे अपनी तकनीकी कुशलता से इस विमान को अपने क़ब्ज़े में लिया है. ग़ौरतलब है कि यह ड्रोन उच्च तकनीक से युक्त है. इसके ऊपर ऐसे पेंट किए गए हैं, जो राडार की पहुंच से इसकी सुरक्षा करता है. अमेरिका ओसामा बिन लादेन के  बारे में जानकारी प्राप्त करने के लिए पाकिस्तान में इसी तरह के ड्रोन का इस्तेमाल करता रहा था, लेकिन पाकिस्तान को इसकी खबर नहीं मिल पाती थी, क्योंकि यह उसके राडार के दायरे से बाहर होता था. हालांकि अमेरिका ने ईरान से यह विमान लौटाने को कहा है, लेकिन उसे इस बात की उम्मीद कम है कि ईरान इस विमान को वापस करेगा. ईरान ने भी स्विट्‌ज़रलैंड के राजदूत को बुलाकर अपनी वायु सीमा में अमेरिकी टोही विमान की उपस्थिति पर ऐतराज़ जताया था. चूंकि अमेरिका का ईरान के साथ कोई कूटनीतिक संबंध नहीं है, जिसके कारण ईरान में अमेरिका से जुड़े मसले तेहरान स्थित स्विट्‌ज़रलैंड के दूतावास के ज़रिये ही हल किए जाते हैं.

बहरहाल दोनों देश अपनी तकनीकी श्रेष्ठता दिखाने की कोशिश में जुटे हुए हैं. लेकिन इस घटना ने यह तो बता ही दिया है कि सचमुच ईरान न तो इराक़ है और न ही अ़फग़ानिस्तान. वह तो ईरान है, जो अमेरिका के आगे सीना तान कर खड़ा है मुक़ाबला करने के लिए. अमेरिका उस पर सैनिक हमला करने से पहले सोच ले, नहीं तो कहीं हमला करने के बाद उसे पछताना न प़डे.

अमेरिकी ड्रोन को ईरान द्वारा क़ब्ज़े में लेने की घटना ने एक साथ कई प्रश्नों को जन्म दिया है. सबसे पहला प्रश्न तो यही है कि आ़खिरकार किसी भी संप्रभु देश की वायु सीमा के अंदर जासूसी विमान भेजने का अधिकार नाटो को किसने दिया है. अगर अमेरिका कहता है कि उसके विमान के ऑपरेटरों का इस पर से नियंत्रण समाप्त हो जाने के कारण भटक गया, जिसकी छानबीन की जा रही थी तो उसे अपने बचाव के एक बहाने के अलावा और क्या कहा जा सकता है. उसे ऐसा लगता है कि उसकी तकनीक इतनी बेहतर है कि वह जासूसी करेगा भी तो पकड़ा नहीं जाएगा, जिसके कारण उसने अपना ड्रोन ईरान की सीमा में भेज दिया. लेकिन इस बार उसका अनुमान ग़लत साबित हुआ. अमेरिका तो वही कर रहा था, जिसे पाकिस्तान में ओसामा के बारे में जानकारी इकट्ठी करने के लिए आज़मा चुका था. अमेरिका को अपने इस कृत्य के लिए ईरान से मांफी मांगनी चाहिए, चाहे इसी बात के लिए क्यों न हो कि उसका विमान तकनीकी खराबी की वजह से सीमा का उल्लंघन कर गया है. दूसरा सवाल है कि आ़खिर अमेरिका यह क्यों साबित करना चाहता है कि ईरान ने जिस ड्रोन को अपने क़ब्ज़े में लिया है, वह तकनीकी गड़बड़ी के कारण खुद ही गिर गया था न कि ईरान ने उसे गिराया था. कारण स्पष्ट है कि अमेरिका नहीं चाहता कि दुनिया को यह पता चले कि ईरान के पास इतनी विकसित तकनीक है कि वह अमेरिका के उस ड्रोन को अपने क़ब्ज़े में ले सकता है, जिसे अमेरिका ने महज़ दो साल पहले बनाया है तथा उस पर ऐसा पेंट किया है जो राडार के दायरे में आने से उसे बचाता है. ऐसे भी ईरान कहता आया है कि अमेरिका उसे इराक़ या अ़फग़ानिस्तान समझने की भूल न करे. ईरान उसके किसी भी हमले का जवाब दे सकता है. अगर अमेरिका यह स्वीकार कर लेता है कि ईरान ने अपनी तकनीक का इस्तेमाल करके इस विमान को अपने क़ब्ज़े में लिया है तो ऐसी स्थिति में ईरान का दावा सही साबित हो जाएगा, जो अमेरिका के लिए क़तई अच्छा नहीं है. इससे ईरान को लाभ होगा तथा इस्लामी दुनिया में उसके सहयोगियों की संख्या में भी बढ़ोतरी होगी. उधर, ईरान भी इस मौक़े को हाथ से जाने देना नहीं चाहता है. उसने सा़फ तौर पर कहा है कि ड्रोन पर क़ब्ज़ा उसने अपनी तकनीकी कुशलता के माध्यम से किया है. ईरान ने तो इस ड्रोन विमान का वीडियो भी ईरानी टेलीविजन पर दिखाया है. यह विमान अच्छी स्थिति में है, जिससे ईरान का दावा ही सही मालूम पड़ता है. इस घटना से अमेरिका को एक और डर सता रहा है. उसे डर है कि कहीं ईरान उसके इस विमान की तकनीक को चुरा न ले. अगर ऐसा हुआ तो अमेरिका के हमलों का जवाब उसी के हथियार से दे सकता है. इसी कारण अमेरिका ने ईरान से यह विमान वापस मांगा है. लेकिन इसकी उम्मीद कम ही है कि ईरान इसे लौटाए. अमेरिका की विदेश मंत्री ने भी ऐसी ही उम्मीद जताई है.

बहरहाल दोनों देश अपनी तकनीकी श्रेष्ठता दिखाने की कोशिश में जुटे हुए हैं. लेकिन इस घटना ने यह तो बता ही दिया है कि सचमुच ईरान न तो इराक़ है और न ही अ़फग़ानिस्तान. वह तो ईरान है, जो अमेरिका के आगे सीना तान कर खड़ा है मुक़ाबला करने के लिए. अमेरिका उस पर सैनिक हमला करने से पहले सोच ले, नहीं तो कहीं हमला करने के बाद उसे पछताना न प़डे. अभी चीन ईरान के साथ खड़ा दिखाई दे रहा है, जिसका भी ध्यान अमेरिका को रखना है. उधर, पाकिस्तान भी अमेरिका को किनारे करने की कोशिश में लगा है. ऐसे में जबकि ईरान अपनी सामरिक तैयारी से अमेरिका को अवगत करा रहा है, तो अमेरिका के लिए सतर्क होने की ज़रूरत तो है ही.