उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव: बसपा का ब्राह्मण-दलित कार्ड

कभी बहुजन समाज पार्टी का नारा होता था-तिलक, तराज़ू और तलवार, इनको…बसपा दलितों को बताने से नहीं चूकती थी कि ब्राह्मणों के कारण आज भी दलित आर्थिक और सामाजिक रूप से हाशिये पर खड़े हैं. दलित मतदाता बसपा सुप्रीमो मायावती की बातों पर आंख मूंद कर विश्वास करते, यह वह दौर था जब मायावती दलितों के सहारे सत्ता की चाबी मज़बूती के साथ हासिल करने का सपना पाले हुए थीं. उन्होंने क़रीब 15 वर्षों तक शुद्ध रूप से दलित राजनीति की. वह कांशीराम के पदचिन्हों पर चल रही थीं. कांशीराम स़िर्फ और स़िर्फ दलितों की बात करते थे. एकमुश्त दलित वोट बैंक के सहारे माया तीन बार सत्ता की सीढ़ियां चढ़ने में सफल रहीं, लेकिन बैसाखियों के सहारे. तीनों ही बार उन्हें बनिया-ब्राह्मण की पार्टी कही जाने वाली भाजपा के समर्थन से मुख्यमंत्री की कुर्सी नसीब हुई.

इस चुनाव में सपा का एक भी मुस्लिम प्रत्याशी नहीं जीता. वैसे बसपा समय-समय पर कांग्रेस व भाजपा को निशाने पर लेती रही है, लेकिन भाजपा से कांग्रेस के गठजोड़ की चर्चा ने अगर असर दिखाया तो इसमें भाजपा का कम कांग्रेस का ज़्यादा नुक़सान होगा. बसपा सुप्रीमो ब्राह्मण कार्ड खेलते हुए ग़रीब ब्राह्मणों को आरक्षण देने की मांग को भी मज़बूती के साथ उठा रही हैं.

कांशीराम की बात की जाए तो इसके बाद भी बनिया-ब्राह्मण और क्षत्रियों से उनकी नाराज़गी कम नहीं हुई थी. ऐसा नहीं था कि बसपा में कोई ब्राह्मण चेहरा नहीं था. बसपा में ब्राह्मण नेता तो कई मौजूद थे, लेकिन अपवाद को छोड़कर किसी नेता की अपने समाज पर मज़बूत पकड़ नहीं थी. रामवीर उपाध्याय जैसे एक-दो नेता थे, जो ब्राह्मण समाज को बसपा के साथ खड़ा कर सकते थे, लेकिन उन्हें शोपीस बनकर ही पार्टी में रहना पड़ रहा था.

बहरहाल, 15-20 वर्षों की राजनीति में मायावती यह ज़रूर समझ गई थीं कि दलितों के सहारे बहुमत के साथ सत्ता पर नहीं आया जा सकता है. उनकी सोच बदलने का काम किया सतीश चंद्र मिश्र ने. सतीश मिश्र को उन्होंने अपने शासन काल में प्रदेश सरकार का महाधिवक्ता नियुक्त किया. इसके बाद सतीश मिश्र मायावती के क़ानूनी कार्य करने लगे. आय से अधिक संपत्ति का मामला हो या फिर अन्य कोई मुक़दमा सतीश चंद्र मिश्र बसपा सुप्रीमो के रक्षार्थ चट्टान की तरह खड़े रहते. क़ानूनविद् सतीश चंद्र मिश्र ने ही मायावती की सोच बदलने का काम किया. ब्राह्मणों के मन में उनके प्रति ऩफरत का जो ग़ुबार भरा हुआ था वह सतीश मिश्र ने का़फी कम कर दिया.

दलित हितों की बात करने वाली बसपा सोशल इंजीनियरिंग की लाइन पर चल पड़ी और सर्वजन हिताय, सर्वजन सुखाय के साथ ब्राह्मण शंख बजाएगा, हाथी बढ़ता जाएगा, का नया नारा बसपा के मंच से गूंजने लगा. सतीश चंद्र मिश्र ने ब्राह्मणों और दलितों को एक मंच पर लाकर खड़ा कर दिया. परिणाम सबके सामने था. मायावती चौथी बार मुख्यमंत्री बनीं, लेकिन इस बार वह अपने दम पर सत्ता में आई थीं. बस यहीं से उनका सोशल इंजीनियरिंग का फार्मूला चल निकला. इसी को मायावती 2012 के विधानसभा चुनाव में फिर आज़माने जा रही हैं. इस बात का प्रमाण बन रहे हैं ब्राह्मण भाईचारा कमेटी के सम्मेलन. ऐसा ही एक सम्मेलन पिछले दिनों लखनऊ में हुआ, जिसने का़फी सुर्खियां बटोरीं. सतीश चंद्र मिश्र, बृजेश पाठक और रामवीर उपाध्याय जैसे नेताओं ने इसे सफल बनाने का काम किया तो मायावती ने एक घंटे से अधिक का समय देकर ब्राह्मणों को यह संदेश देने की कोशिश की कि बसपा के लिए ब्राह्मण कितने महत्वपूर्ण हैं.

2007 में ब्राह्मण-दलित गठजोड़ से अपनी जीत की ज़मीन तैयार करने वाली बसपा 2012 में एक बार फिर विरोधी दलों को इसी खास दांव से चित करने के मूड में है. सम्मेलन में वह ठाकुरों और ब्राह्मणों के बीच के फासले को भी दर्शाना नहीं भूली. मायावती ने भाजपा-कांग्रेस पर अंदऱखाने समझौते की बात कहकर इन दोनों पार्टियों के लिए मुश्किलें बढ़ाने का भरसक प्रयास किया. बसपा के इसी तरह के एक दांव से पिछले विधानसभा चुनाव में भाजपा-सपा विधानसभा चुनाव में नुक़सान उठाना पड़ा था. तब बसपा ने सपा-भाजपा की अंदरूनी मिलीभगत की बात उछाली थी. इससे जहां भाजपा के कमज़ोर पार्टी होने का संदेश वोटरों में गया, वहीं मुस्लिमों में भी सपा को लेकर संदेह गहराया, जिस कारण सवर्ण वोटर भाजपा से छिटका और मुसलमानों का एक बड़ा हिस्सा बसपा के साथ खड़ा हो गया.

बसपा ने इसका फायदा ब्राह्मण-दलित गठजोड़ को मज़बूत बनाकर उठाया, जिसके सहारे वह बहुमत के साथ प्रदेश की सत्ता पर क़ाबिज़ हो गई. अगले साल होने वाले विधानसभा चुनाव के लिए मायावती ने दिग्विजय सिंह व राजनाथ सिंह का नाम लेकर इशारों-इशारों में यह संदेश देने की कोशिश की है कि भाजपा व कांग्रेस जैसी पार्टियों को ब्राह्मणों की चिंता नहीं है. वैसे भी सवर्ण बिरादरी में राजनीतिक रूप से ब्राह्मणों के मुक़ाबले क्षत्रिय वर्ग को अधिक ताक़तवर माना जाता है. मायावती के इस शिगू़फे से ब्राह्मण समाज में तमाम आशंकाएं घर कर सकती हैं.

बसपा जानती है कि उसे सरकार बनाने के लिए भाजपा व कांग्रेस के मुक़ाबले समाजवादी पार्टी ही असली चुनौती दे सकती है, लेकिन सवर्ण बिरादरी का वोट भाजपा-कांगे्रस की ओर जाने से रोकने के लिए बसपा ने यह दांव चला है. बसपा इस बात से उत्साहित ज़रूर है कि चुनाव में दोनों इस मुद्दे पर बचाव की मुद्रा में होंगे. बसपा ने वर्ष 2007 के विधानसभा चुनाव में उस घटना को सपा-भाजपा की मिलीभगत का सबूत बताया था, जिसमें भाजपा के तत्कालीन प्रदेश अध्यक्ष केसरीनाथ त्रिपाठी व अन्य नेता अपने विधायक पर पुलिसिया उत्पीड़न की शिकायत करने मुख्यमंत्री मुलायम सिंह के आवास पर गए थे और वहां मुलायम सिंह यादव ने भाजपा नेताओं की न केवल गंभीरता से बात सुनी, बल्कि उन्हें चाय-नाश्ता भी कराया था. जबकि भाजपा नेताओं की दलील थी कि यह सब औपचारिकतावश किया गया था. भाजपा पूरी तरह सपा के विरोध में थी, लेकिन बात बनी नहीं. यही नहीं कई अन्य मौक़ों पर भी मुलायम सरकार की भाजपा के प्रति नरमी चर्चा का विषय रही थी. इससे चुनाव में भाजपा की छवि को गहरा आघात लगा. जब लोकसभा चुनाव आया तो बसपा ने कल्याण सिंह व सपा की नज़दीकियों को मुद्दा बनाया. इससे अल्पसंख्यक सपा से दूर होकर कांग्रेस के साथ हो लिए.

इस चुनाव में सपा का एक भी मुस्लिम प्रत्याशी नहीं जीता. वैसे बसपा समय-समय पर कांग्रेस व भाजपा को निशाने पर लेती रही है, लेकिन भाजपा से कांग्रेस के गठजोड़ की चर्चा ने अगर असर दिखाया तो इसमें भाजपा का कम कांग्रेस का ज़्यादा नुक़सान होगा. बसपा सुप्रीमो ब्राह्मण कार्ड खेलते हुए ग़रीब ब्राह्मणों को आरक्षण देने की मांग को भी मज़बूती के साथ उठा रही हैं. मायावती ने कहा कि देश की सत्ता लंबे वक़्त तक सवर्ण समाज के हाथों रही, लेकिन इस समाज के मुट्ठी भर लोगों को छोड़कर ज़्यादातर लोग आर्थिक व अन्य क्षेत्रों में का़फी पिछड़े रहे. बसपा महासचिव सतीश चंद्र मिश्र ने आंकड़ों के माध्यम से ब्राह्मणों को लुभाने की कोशिश की. सतीश चंद्र मिश्र ने कहा कि ब्राह्मणों को सबसे तवज्जो इसी सरकार में मिली है. वर्ष 2002 के विधानसभा चुनाव में बसपा 85 सीटों में 19 जीतीं तो अगले चुनाव में उसने 62 आरक्षित सीटें जीतीं. इसी तरह ब्राह्मण विधायकों की तादाद भी चार से बढ़कर 45 हो गई. बसपा के सात सांसद ब्राह्मण हैं. एक दर्जन को मंत्री बनाया गया, तो दर्जनों ब्राह्मणों को विभिन्न निगमों, आयोग में अध्यक्ष व उपाध्यक्ष बनाया गया है.

ब्राह्मण समाज भाईचारा कार्यकर्ता सम्मेलनों की पूरी धुरी सतीश चंद्र मिश्र के इर्द-गिर्द घूमती रहती थी, लेकिन अबकी बार सत्ता संतुलन के कई और केंद्र भी बसपा में देखने को मिले. बसपा के मंत्री रामवीर उपाध्याय और सांसद बृजेश पाठक भी मुख्य भूमिका में नज़र आए. मंच पर इलाहाबाद के नेता अशोक वाजपेयी की मौजूदगी ने कौतुहल पैदा किया. नारे बसपा के सम्मेलनों में नया जोश पैदा करते हैं. इस सम्मेलन में भी कुछ नए तो कई पुराने नारे हवा में उछले. बहन जी के सम्मान में, ब्राह्मण समाज मैदान में, पर खूब तालियां बजीं. बसपा के महासचिव सतीश चंद्र मिश्र ने मायावती को गणेश की प्रतिमा से युक्त स्मृति चिन्ह भेंटकर हाथी नहीं गणेश है, ब्रह्मा,विष्णु,महेश है, के नारे को चरितार्थ किया.

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