यूपीए का अवसान हो रहा है

भारत में शिशु मृत्यु दर के आंकड़े अच्छे नहीं हैं. हर साल बहुत सारे बच्चे पांच साल की आयु सीमा पार नहीं कर पाते हैं. यही स्थिति भारत सरकार की भी दिखाई पड़ती है. ऐसी कोई भी चुनी हुई सरकार, जिसके समय में आर्थिक विकास की काफी अच्छी संभावनाएं दिखाई दें, वह कम ही अपना कार्यकाल पूरा करने से वंचित रहती है. बाबरी मस्जिद विध्वंस की उन्नीसवीं वर्षगांठ के एक दिन बाद ही खुदरा बाज़ार में प्रत्यक्ष विदेशी निवेश के मुद्दे पर यूपीए-2 सरकार की किरकिरी हो गई. हमें इस मामले में आत्मनिरीक्षण करने की मांग करनी चाहिए. यह उम्मीद थी कि सरकार अपना पांच साल का कार्यकाल पूरा करेगी और कम से कम पांच साल और बनी रहेगी, लेकिन ऐसा नहीं होने जा रहा है.

यूपीए-2 सरकार यूं तो शुरू से ही लड़खड़ाती रही है, लेकिन पिछले एक साल से यह लगभग निष्प्रभावी दिखाई दे रही है. मुद्रास्फीति की दर कम होने का नाम नहीं ले रही है. साथ ही भ्रष्टाचार भी बढ़ता जा रहा है और हर तऱफ भ्रष्टाचार विरोधी प्रदर्शन हो रहे हैं. इन कारणों से ऐसा लगता है कि यूपीए-2 सरकार ने सत्ता में बने रहने का अपना सारा विश्वास खो दिया है. खुदरा बाज़ार में प्रत्यक्ष विदेशी निवेश को मंजूरी देकर वह अपनी स्थिति सुधार सकती थी, लेकिन उसने यह मौक़ा भी गंवा दिया. किसी भी बीमारी के समय दवा देकर उसे ठीक किया जाता है, लेकिन अगर दवा नहीं दी गई तो फिर बीमारी कैसे ठीक होगी. भारत में बच्चों के साथ प्राय: ऐसा ही होता है और सरकार के साथ भी यही हो रहा है. सरकार की सत्ता में बने रहने की ताक़त लगातार कमज़ोर होती जा रही है.

आख़िरकार यह हुआ कैसे, कैसे यूपीए सरकार या कांग्रेस एफडीआई के मुद्दे पर मात खा गई, एफडीआई उदारीकरण का मुद्दा संसद में देर से लाने का फैसला किसने लिया? शीतकालीन सत्र की शुरुआत में ऐसे कई मुद्दे हैं, जिन पर विपक्ष सरकार को घेरने का मन बना चुका है. इसे तो पहले ही ले आना चाहिए था. मॉनसून सत्र की समाप्ति के बाद से कोई भी महत्वपूर्ण काम नहीं किया गया. इसके बाद एकाएक इस तरह की घोषणा की गई, जो काफी महत्वपूर्ण होने के साथ-साथ विवादित भी है.

यूपीए-2 के तीसरे वर्ष में ही बीस साल पहले कांग्रेस द्वारा शुरू की गई आर्थिक विकास योजना (ईआपी) उपेक्षित दिखाई पड़ रही है. आर्थिक विकास के इस मॉडल पर कोई ध्यान नहीं दिया जा रहा है. यूपीए-2 सरकार अपने द्वारा किए गए अच्छे कामों का भी श्रेय नहीं ले पा रही है. यह भी निश्चित नहीं हो पा रहा है कि कब और कैसे इस आर्थिक सुधार की प्रक्रिया को फिर से शुरू किया जाए. सब कुछ अस्पष्ट सा दिख रहा है.

आख़िरकार यह हुआ कैसे, कैसे यूपीए सरकार या कांग्रेस एफडीआई के मुद्दे पर मात खा गई, एफडीआई उदारीकरण का मुद्दा संसद में देर से लाने का फैसला किसने लिया? शीतकालीन सत्र की शुरुआत में ऐसे कई मुद्दे हैं, जिन पर विपक्ष सरकार को घेरने का मन बना चुका है. इसे तो पहले ही ले आना चाहिए था. मॉनसून सत्र की समाप्ति के बाद से कोई भी महत्वपूर्ण काम नहीं किया गया. इसके बाद एकाएक इस तरह की घोषणा की गई, जो काफी महत्वपूर्ण होने के साथ-साथ विवादित भी है. अगर यह कांग्रेस की योजना थी तो फिर क्यों उसने सत्र की शुरुआत में ही भाजपा को नाराज़ कर दिया, जिसका आर्थिक सुधार का इतिहास अच्छा रहा है. बेशक कांग्रेस के कुछ लोग भाजपा के साथ अच्छे संबंध बनाने के विरुद्ध हैं, लेकिन कम से कम कांग्रेस के केंद्रीय मंत्री को भाजपा के साथ विश्वास बहाली के लिए कुछ समय देना ही चाहिए था, लेकिन ऐसा नहीं हुआ, जिसके चलते पिछले आठ सालों का सबसे बड़ा मुद्दा भाजपा के हाथ लग गया. देखा जाए तो भाजपा आर्थिक सुधारों को आगे बढ़ाने की दिशा में एक अच्छी सहयोगी साबित हो सकती थी. दूसरी ओर तृणमूल कांग्रेस ने भी इस मुद्दे पर कांग्रेस का साथ छोड़ दिया, क्योंकि उसे पश्चिम बंगाल में सत्ता मिल गई है.

यह अच्छी तरह विदित है कि कांग्रेस में प्रधानमंत्री के केवल एक साथी हैं. इसके अलावा कांग्रेस के अन्य नेता प्रधानमंत्री को अपमानित होते देखकर ख़ुश होते हैं. प्रधानमंत्री के रूप में उनका उपयोगी जीवन कम किया जा रहा है. इसकी वजह उनके उत्तराधिकारी को सत्ता सौंपने की जल्दबाज़ी हो सकती है. यह काफी अफसोस की बात है कि नेहरू के बाद जिस प्रधानमंत्री ने विदेशों में भारत को वास्तविक सम्मान दिलाया, उसे अपने ही दल द्वारा नीचा दिखाया जा रहा है. ऑक्सफोर्ड में प्रधानमंत्री के प्रोफेसर रह चुके इयान लिट्ल ने कहा था कि भारत में आर्थिक सुधार पांच साल से ज़्यादा नहीं चल पाएगा. महालनोबिस योजना कुछ सालों के भीतर ही समाप्त हो गई. इंदिरा गांधी भी पांच साल का कार्यकाल पूरा करने से पहले ही सुधार की बात भूल गईं. राजीव गांधी को तो बोफोर्स ने बचा लिया, जिसके कारण उन्हें सुधार से मुंह मोड़ने का मौक़ा नहीं मिला. ऐसा ही भाजपा के साथ हुआ और वह तहलका विवाद में फंस गई. इस समय भी वही हो रहा है. आर्थिक सुधार का गला घोंट दिया गया है. यह अनुमान लगाना किसी के लिए काफी कठिन है कि भारत अपनी विकास दर कैसे बरक़रार रख पाएगा. अगर कुछ समय बाद आर्थिक सुधार लाए भी जाते हैं तो उस समय हमें हिंदू विकास दर के साथ ही रहना पड़ेगा. इस बीच हमारे देश की आर्थिक विकास दर में वृद्धि काफी मुश्किल दिखाई पड़ रही है.

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  • Due to dubious mind of congress’s leaders and dishonesty ,congress is loosing her confidence in puplic.