उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव : मायावती का मास्टर स्ट्रोक

हमारे संविधान में नए राज्य बनाने की एक प्रक्रिया है. संविधान के मुताबिक़, नए राज्य बनाने का अधिकार संसद के पास है. यदि किसी प्रदेश के क्षेत्र, सीमा या नाम बदलने का सुझाव है तो ऐसे बिल को राष्ट्रपति संसद में भेजने से पहले संबंधित राज्य की विधानसभा को भेजकर निश्चित समय सीमा के अंदर राय देने को कहेंगे और यदि उस समय सीमा के अंदर राय नहीं दी जाती है तो यह मान लिया जाएगा कि बिल के बारे में कोई विरोध नहीं है. राज्य के पुनर्गठन, विभाजन की कार्रवाई प्रारंभ करने के लिए संबंधित राज्य के विधानमंडल द्वारा प्रस्ताव पारित किया जाना आवश्यक नहीं है. मतलब यह है कि राज्य को बांटने का अधिकार और उसकी प्रक्रिया में राज्य सरकार के  पास कोई अधिकार नहीं है. मायावती ने राज्य के बंटवारे का जो फैसला लिया है वह स़िर्फ एक सुझाव मात्र है और यह एक ऐसा सुझाव है जिसकी राष्ट्रपति पर कोई बाध्यता भी नहीं है. उत्तर प्रदेश बांटा जाएगा या नहीं, यह फैसला दिल्ली में होगा. मायावती संविधान को समझती हैं, विपक्षी दलों की राजनीति को भी समझती हैं. मायावती से बेहतर यह कोई नहीं जानता है कि उत्तर प्रदेश के विभाजन की मांग को न कांग्रेस और न ही भारतीय जनता पार्टी समर्थन देगी.

उत्तर प्रदेश को चार हिस्सों में बांटने की मांग उठाकर मायावती ने एक मास्टर स्ट्रोक खेला है. सोची समझी रणनीति के तहत एक नई चाल चली है. उत्तर प्रदेश एक बड़ा राज्य है. इसके मुख्यमंत्री का साम्राज्य गाज़ियाबाद से लेकर गोरखपुर और आज़मग़ढ से बलिया तक होता है. मायावती इतने बड़े राज्य की मुख्यमंत्री हैं. तो सोचने वाली बात यह है कि ऐसा कौन मुख्यमंत्री चाहेगा कि अगला चुनाव जीतने के बाद वह एक छोटे से राज्य का मुख्यमंत्री बने. वह भी तब जब राज्य में ऐसा माहौल भी नहीं है, जिसमें यह कहा जा सके कि समाजवादी पार्टी या भारतीय जनता पार्टी मायावती को चुनाव में बुरी तरह से हराने वाली हैं. उत्तर प्रदेश में इन राज्यों की मांग को लेकर कोई बड़ा आंदोलन भी नहीं चल रहा है. इसके बावजूद अगर मायावती उत्तर प्रदेश को चार हिस्सों में बांटने का फैसला करती हैं तो ज़रूर कोई गहरा राज़ होगा, कोई बड़ी राजनीतिक चाल होगी.

वह इस बात को भी अच्छी तरह से जानती हैं कि यह ऐसी मांग है जो फिलहाल पूरी नहीं हो सकती है. साथ ही वह यह भी जानती हैं कि यह मुद्दा ऐसा है जिससे एक ही झटके में सभी विपक्षी पार्टियों के सारे चुनावी अंक गणित और बीज गणित को विफल कर सकती हैं. अब सवाल यह उठता है कि मायावती ने इन सब बातों को जानते हुए भी उत्तर प्रदेश के बंटवारे के मुद्दे को क्यों हवा दी.

मायावती के पांच साल के कार्यकाल में ऐसा कुछ नहीं हुआ जिसे एक उपलब्धि कहा जा सके. देश में जो माहौल है वह भ्रष्टाचार के खिला़फ है. बिहार के चुनाव ने सभी राजनीतिक दलों को डरा दिया है, खासकर उन पार्टियों को जिनका भ्रष्टाचार और अच्छी सरकार देने का रिकॉर्ड खराब है. बिहार के चुनाव में पहली बार लोगों ने जाति धर्म और समुदाय की दीवार को तोड़ कर वोट दिया. रामदेव और अन्ना हजारे ने इस माहौल को आगे बढ़ाया. यही वजह है कि हरियाणा के हिसार में कांग्रेस पार्टी की ज़मानत ज़ब्त हो गई, जबकि वहां कांग्रेस के तीन-तीन मुख्यमंत्रियों ने प्रचार किया. राजनीति इशारे देती है. जो राजनीतिक दल इन इशारों को समझते हैं, वे फायदे में रहते हैं. मायावती इस खतरे को जानती हैं कि पांच साल सरकार में रहने के बाद लोगों का रु़ख उनके खिला़फ है. समाजवादी पार्टी और भारतीय जनता पार्टी के पास सरकार के खिला़फ कई मुद्दे हैं. भ्रष्टाचार और घोटालों की पूरी फेहरिस्त है. वह इस बात से भी वाक़ि़फ हैं कि अगर विपक्षी दलों को चुनाव का एजेंडा तय करने के लिए छोड़ दिया गया तो भ्रष्टाचार और सुशासन मुद्दा बन जाएगा. अगर ऐसा हो गया तो भारी ऩुकसान होगा, जिसकी भारपाई नहीं की जा सकती है. मायावती को कोई ऐसा मुद्दा चाहिए था, जो लोगों की आकांक्षाओं और भावनाओं से जु़डा हो और जो भ्रष्टाचार जैसे मुद्दे पर भारी पड़े.

1955 में भीम राव आंबेडकर ने राज्य पुनर्गठन क़ानून की समीक्षा की थी, जिसमें उन्होंने उत्तर प्रदेश को तीन हिस्सों में बांटने का सुझाव दिया था. उनके मुताबिक़, उत्तर प्रदेश के पूर्वी, मध्य और पश्चिमी इला़के को अलग राज्य घोषित कर देना चाहिए. उन्होंने यह भी सुझाव दिया था कि पूर्वी इलाक़े की इलाहाबाद, मध्य उत्तर प्रदेश की कानपुर और पश्चिम उत्तर प्रदेश की राजधानी मेरठ होनी चाहिए. उनकी दलील यह थी कि राष्ट्रीय राजनीति पर कहीं कोई बड़ा राज्य हावी न हो जाए, इसके लिए ज़रूरी है कि देश में बड़े राज्य न हों. वह यह चाहते थे कि उत्तर प्रदेश के साथ-साथ बिहार और मध्य प्रदेश को भी विभाजित किया जाना चाहिए. लेकिन कांग्रेस की वर्किंग कमेटी ने उनके  सुझावों को दरकिनार कर दिया. उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश और बिहार का विभाजन किए बिना यह क़ानून 1956 में लागू कर दिया गया. उत्तर प्रदेश को बांटने की बात यहीं खत्म नहीं हुई. 1972 में 14 विधायकों ने उत्तर प्रदेश विधानसभा में एक प्रस्ताव रखा. इस प्रस्ताव में राज्य को तीन, ब्रज प्रदेश, अवध प्रदेश और पूर्वी प्रदेश में बांटने की मांग थी. यह प्रस्ताव पास नहीं हो सका. उत्तर प्रदेश का बंटवारा तो ज़रूर हुआ, लेकिन आंदोलन की वजह से उत्तराखंड बन गया. बिहार से झारखंड और मध्य प्रदेश से छत्तीसगढ़ बनाया गया. इन दोनों राज्यों में बाबा साहेब की बात सही साबित तो हुई, लेकिन दलील अलग थी. दोनों राज्यों में विषमता की वजह से आंदोलन हुए जिसके कारण इन राज्यों का बंटवारा हुआ. उत्तर प्रदेश में हरित प्रदेश, बुंदेलखंड और पूर्वांचल को अलग राज्य बनाने की मांग को लेकर आंदोलन चल रहा है. आंदोलन मुखर तो नहीं है, लेकिन इस इला़के  के लोग मानसिक तौर पर इसका समर्थन ज़रूर करते हैं.

राज्य को चार हिस्सों में विभाजित करने का मुद्दा एक लोकप्रिय मुद्दा है. इस मुद्दे से मायावती ने एक तीर से कई शिकार कर दिए. बुंदलेखंड, हरित प्रदेश और पूर्वी प्रदेश की मांग पुरानी है. कई सालों से यहां अलग राज्य की मांग हो रही है. यहां आंदोलन चल रहा है. कई संगठन सक्रिय हैं. इन सबसे ज़्यादा महत्वपूर्ण अलग राज्य की मांग रखने वाले नेताओं और आंदोलनों को जनता का समर्थन प्राप्त है. राज्य के विभाजन पर समाजवादी पार्टी और भारतीय जनता पार्टी की कोई सा़फ नीति नहीं है. मायावती ने यह फैसला लेकर इन आंदोलनों को अपने समर्थन में खड़ा कर दिया. वह इन आंदोलनों का चेहरा बन गई हैं. उन्होंने विपक्षी दलों को कठघरे में कर दिया. इन पार्टियों को अब समझ में नहीं आ रहा है कि वे क्या करें. मतलब यह कि मायावती ने इस मुद्दे को उठाकर न स़िर्फ अपना समर्थन बढ़ाया, बल्कि विपक्षी दलों को मुसीबत में डाला और साथ ही अपने और सरकार के खिला़फ लगने वाले भ्रष्टाचार के आरोप, हत्याएं, मंत्रियों पर लगे आरोपों और खराब क़ानून व्यवस्था को मुद्दा बनने से रोक दिया.

अलग राज्य की मांग को लेकर सबसे ज़्यादा मुखर बुंदलखंड के लोग हैं. आज़ादी के कुछ दिनों बाद से ही यहां के स्थानीय नेता और कई संगठन इसे अलग राज्य बनाने की मांग उठा रहे हैं. बुंदेलखंड भारत के बीचो-बीच उत्तर प्रदेश और मध्य प्रदेश का इलाक़ा है. बुंदेलखंड क्षेत्र में उत्तर प्रदेश के ललितपुर, झांसी, महोबा, बांदा, जालौन, हमीरपुर, ़फतेहपुर और चित्रकूट ज़िले हैं, जबकि मध्य प्रदेश के छतरपुर, सागर, पन्ना, टीकमगढ़, दमोह, दतिया, भिंड, सतना आदि ज़िले शामिल हैं. दो राज्यों में बंटे होने के बावजूद यह इलाक़ा भौगोलिक और सांस्कृतिक तौर पर एक-दूसरे से अभिन्न रूप से जुड़ा हुआ है. इस इला़के में खनिज पदार्थ हैं. यह आर्थिक संसाधनों से परिपूर्ण भी है, लेकिन यह भारत के सबसे पिछड़े इलाक़ों में से एक है. उनकी दलील वही है, जो दलील झारखंड, छत्तीसगढ़, तेलंगाना और विदर्भ की रही है. राजनीतिक तौर पर मज़बूत न होने की वजह से इन इलाक़ों का विकास नहीं हो पाया है. न तो केंद्र सरकार और न ही राज्य सरकार के पास इस इला़के  के  विकास के लिए कोई रोड मैप है. वर्तमान में बुंदेलखंड क्षेत्र की स्थिति बहुत ही गंभीर है. यहां के लोगों को लगता है कि अगर बुंदेलखंड अलग राज्य बन जाता है, तो यह इलाक़ा विकसित हो जाएगा. इसकी संभावित राजधानी झांसी है.

बुंदेलखंड की मांग विषमता की मार झेल रहे लोगों की है, तो दूसरी ओर पश्चिमी प्रदेश अमीर और विकसित होने के बावजूद अलग राज्य की मांग कर रहा है. इसकी वजह यह है कि उत्तर प्रदेश की राजनीति में यादव प्रभावशाली हैं. यादव उत्तर प्रदेश के हर इला़के में फैले हैं. पश्चिम उत्तर प्रदेश जाट बहुल इलाक़ा है. हरियाणा और पंजाब की तरह यहां के जाट भी अमीर हैं, लेकिन राजनीतिक तौर पर प्रभावशाली नहीं हैं. यहां के लोगों का मानना है कि उत्तर प्रदेश की आमदनी का 72 फीसदी पैसा पश्चिमी उत्तर प्रदेश से आता है, लेकिन इसके विकास पर बजट का महज़ 18 फीसदी पैसा खर्च होता है. अजीत सिंह हरित प्रदेश की मांग करते आए हैं. अजीत सिंह कांग्रेस के साथ मिलकर चुनाव लड़ने वाले हैं, कांग्रेस हरित प्रदेश का खुला समर्थन नहीं कर रही है. यही वजह है, नए राज्य के मुद्दे पर मायावती ने उन्हें पीछे छोड़ दिया है.

उत्तर प्रदेश का पूर्वी इलाक़ा राज्य के दूसरे क्षेत्रों से आर्थिक, सामाजिक और सांस्कृतिक लिहाज़ से अलग है. यही विषमता पूर्वांचल राज्य या पूर्वी प्रदेश की मांग का आधार है. उत्तर प्रदेश का पूर्वी इलाक़ा जो बिहार और नेपाल से सटा है, उसे पूर्वांचल कहा जाता है. यह उत्तर प्रदेश के सबसे पिछड़े क्षेत्रों में से एक है. अगर इसकी पश्चिमी उत्तर प्रदेश से तुलना करें तो यह इलाक़ा बहुत ही पीछे छूट गया है. यहां की आबादी ज़्यादा है, लेकिन बुनियादी सुविधाएं नहीं हैं. यह क्षेत्र अशिक्षा, बेरोज़गारी, खराब क़ानून व्यवस्था और ग़रीबी के  लिए जाना जाता है. यहां के लोगों को लगता है कि सरकार की उपेक्षा की वजह से यह क्षेत्र पिछड़ रहा है. इसके अलावा जो क्षेत्र बच जाता है, वह अवध प्रदेश कहलाता है. मायावाती इन्हीं चार राज्यों का गठन करना चाहती हैं.

राज्य को बांटने का अधिकार और उसकी प्रक्रिया में राज्य सरकार के पास कोई अधिकार नहीं है. मायावती ने राज्य के बंटवारे का जो फैसला लिया है वह स़िर्फ एक सुझाव मात्र है और यह एक ऐसा सुझाव है जिसकी राष्ट्रपति पर कोई बाध्यता भी नहीं है. यह ऐसी मांग है जो फिलहाल पूरी नहीं हो सकती है. अब सवाल यह उठता है कि मायावती ने इन सब बातों को जानते हुए भी उत्तर प्रदेश के बंटवारे के मुद्दे को क्यों हवा दी.

मायावती की सरकार की सबसे बड़ी चुनौती मुलायम सिंह की समाजवादी पार्टी से है. मुलायम सिंह के बेटे अखिलेश यादव पिछले कई महीनों से उत्तर प्रदेश में पार्टी का प्रचार-प्रसार कर रहे हैं. उनकी रैलियों और यात्राओं को जनसमर्थन मिल रहा है. अखिलेश यादव मीडिया की नज़रों से दूर ज़रूर हैं, लेकिन ज़मीनी स्तर पर उनका काम चुनाव को ज़रूर प्रभावित करेगा. मायावती के लिए अगर कहीं से खतरा है तो वह समाजवादी पार्टी से है. अखिलेश यादव की नज़र मुस्लिम मतदाताओं पर है. समाजवादी पार्टी यादवों और मुसलमानों के समर्थन से चुनाव जीतती है. समाजवादी पार्टी विभाजन के खिला़फ है. उत्तर प्रदेश के बंटवारे से मुसलमानों के सामने भी एक सवाल खड़ा होता है. हरित प्रदेश यानी पश्चिमी उत्तर प्रदेश के 10 ज़िले ऐसे हैं, जहां मुस्लिम आबादी 20 से 49 फीसदी है. मतलब यह कि इला़के की सीटों का फैसला मुस्लिम मतदाता करेंगे. राजनीतिक तौर पर वे महज़ एक वोट बैंक से राजनीतिक शक्ति बन जाएंगे. मायावती ने अगर इस मुद्दे को उठाकर चुनाव में प्रचार किया तो समाजवादी पार्टी के लिए मुश्किल खड़ी हो सकती है. लेकिन इससे एक खतरा पैदा होता है कि उत्तर प्रदेश में धर्म के आधार पर ध्रुवीकरण हो जाएगा. भारतीय जनता पार्टी इस मौके का फायदा उठा सकती है. वैसे भी उत्तर प्रदेश इस मामले में संवेदनशील है.

कुछ राजनीतिक विश्लेषक और कई अ़खबार यह लिख रहे हैं कि मायावती ने यह फैसला राहुल गांधी के खतरे से निपटने के लिए किया है. इस तर्क में कोई दम नहीं है. उत्तर प्रदेश में कांग्रेस, संगठन के तौर पर बहुत कमज़ोर है. वह विधानसभा में चौथे नंबर की पार्टी है. भ्रष्टाचार, घोटाले और महंगाई की मार से त्रस्त जनता का ग़ुस्सा कांग्रेस के प्रति है. कांग्रेस के नेता भले ही यह ऐलान कर दें कि इस बार वे 200 सीटें जीतेंगे, ज़मीनी हक़ीक़त यही है कि कांग्रेस अगर अपनी सीटों को बचा ले जाए तो यह एक कीर्तिमान माना जाएगा. अपनी ही पार्टी की समस्याओं से उलझी कांग्रेस को मायावती ने विभाजन के मुद्दे पर उलझा दिया है. केंद्र में कांग्रेस को ही इस मुद्दे पर फैसला लेना है और विभाजन का समर्थन करना कांग्रेस पार्टी के लिए मुश्किल होगा. इसका सीधा असर यह होगा कि पश्चिमी उत्तर प्रदेश के जाट मतदाता कांग्रेस गठबंधन से दूर चले जाएंगे. पश्चिमी उत्तर प्रदेश में अजीत सिंह के सहारे सीटें बटोरने की कांग्रेस की चाल को मायावती ने पटरी से उतार दिया. इस इला़के की डेमोग्राफी ऐसी है कि इससे मुसलमानों का वोट कांग्रेस के  हाथ से जाता रहेगा. वहीं पूर्वी उत्तर प्रदेश में कांग्रेस के लिए यह एक बड़ा झटका होगा.

राजनीति इशारे देती है. जो राजनीतिक दल इन इशारों को समझते हैं, वे फायदे में रहते हैं. मायावती इस खतरे को जानती हैं. समाजवादी पार्टी और भारतीय जनता पार्टी के पास भ्रष्टाचार और घोटालों की पूरी फेहरिस्त है. अगर विपक्षी दलों को चुनाव का एजेंडा तय करने के लिए छोड़ दिया गया तो भ्रष्टाचार और सुशासन मुद्दा बन जाएगा. मायावती को कोई ऐसा मुद्दा चाहिए था, जो लोगों की आकांक्षाओं और भावनाओं से जु़डा हो और जो भ्रष्टाचार जैसे मुद्दे पर भारी पड़े.

मायावती ने उत्तर प्रदेश के विभाजन का जो मुद्दा उठाया है, वह एक चुनावी मुद्दा है. चुनाव से पहले इस मुद्दे को उठाकर मायावती ने चुनाव में लीड ले ली है. उन्होंने अपने हिसाब से चुनाव का मुद्दा तय किया है. दूसरे दलों को अब सोचना प़डेगा कि इस मुद्दे के  जवाब में कौन-सा मुद्दा उठाया जाए. अगर यह मुद्दा चुनाव का मुख्य मुद्दा बन गया तो मायावती को हराना मुश्किल हो जाएगा. समाजवादी पार्टी को इसका जवाब तलाशना होगा. भारतीय जनता पार्टी को अपनी नीति सा़फ रखनी होगी. भारतीय जनता पार्टी देश में अलग राज्य बनाने वाले आंदोलनों को समर्थन देती रही है. अगर वह उत्तर प्रदेश के विभाजन के विरोध में है तो उसे यह बताना होगा कि विरोध का कारण क्या है. इसके अलावा मायावती को चुनौती देने वाली पार्टियों को जनता से जुड़े मुद्दों पर लौटना पड़ेगा.

डा. मनीष कुमार

डॉ. मनीष कुमार राजनीतिक-सामजिक मसलों पर मौलिक विचार और उसके धारदार विश्लेषण के माहिर हैं. अपनी नेतृत्व क्षमताके साथ चौथी दुनिया में संपादक (समन्वय) का दायित्व संभाल रहे हैं. विजुअल मिडिया का उनका लंबा अनुभव प्रिंट मीडिया में भी अपनी शिनाख्त दर्ज कर रहा है.
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डा. मनीष कुमार

डॉ. मनीष कुमार राजनीतिक-सामजिक मसलों पर मौलिक विचार और उसके धारदार विश्लेषण के माहिर हैं. अपनी नेतृत्व क्षमता के साथ चौथी दुनिया में संपादक (समन्वय) का दायित्व संभाल रहे हैं. विजुअल मिडिया का उनका लंबा अनुभव प्रिंट मीडिया में भी अपनी शिनाख्त दर्ज कर रहा है. ‎