औरत की बोली

पिछले कई सालों से हिंदी में साहित्येतर विधाओं की किताबों के प्रकाशन में का़फी तेज़ी आई है. प्रकाशकों के अलावा लेखकों ने भी इस ओर गंभीरता से ध्यान दिया है. कई लेखकों ने कहानी, कविता, उपन्यास से इतर समाज के उन विषयों को छुआ है, परखा है, जो अब तक हिंदी समाज की नज़रों से ओझल थे. पिछले कुछ वर्षों में लेखकों की जो नई पीढ़ी आई है, उसने उन विषयों पर ध्यान दिया और जीवनानुभव और भोगे गए यथार्थ के नाम पर काल्पनिक कथाओं से खुद को मुक्त करते हुए बिंदास अंदाज़ में अपनी लेखनी से हिंदी की जड़ होती ज़मीन तोड़ी. हिंदी में शोध के आधार पर साहित्येतर लेखन भी कम ही हुआ है और जो भी हुआ है, उसमें डिटेलिंग की ज़रूरत ही महसूस नहीं की गई. हिंदी साहित्य में किसी विषय विशेष पर पूरी डिटेलिंग के साथ लेखन मेरी नज़र से नहीं गुज़रा है. लेकिन जो नई पीढ़ी आई है, उसने इस दिशा में कई काम किए हैं. नई पीढ़ी की उन्हीं चुनिंदा लेखकों में एक अहम नाम है गीताश्री का. कुछ दिन पहले एक के  बाद एक बेहतरीन कहानियां लिखकर शोहरत हासिल कर चुकी पत्रकार गीताश्री ने अपने अनुभवों और शोध के आधार पर मानव सभ्यता के सबसे पुराने कारोबारों में से एक- वेश्यावृत्ति पर एक गंभीर किताब लिखी है, नाम है औरत की बोली. गीताश्री ने इस किताब में स्वयं देखी-सुनी एक ऐसी दास्तान पेश की है, जिसे पढ़कर पाठकों के हृदय के तार झंकृत हो उठते हैं. दुनियाभर के देशों में स्त्री देह के कारोबार को लेकर जो रिपोर्ताज इस किताब में संग्रहित हैं, उसमें तथ्यों और अनुभवों को बेहद ही कलात्मक और प्रभावोत्पादक ढंग से प्रस्तुत किया गया है. औरत की बोली में लिखे लेखों को स़िर्फ रिपोर्ताज या तथ्यों का लेखा-जोखा मात्र नहीं कहा जा सकता है, बल्कि गीताश्री ने स्त्री देह के  व्यापार को वैश्विक परिप्रेक्ष्य में सामाजिक और ऐतिहासिक आधार पर परखने की कोशिश भी की है.

गीताश्री के मुताबिक़, चीन में किसी क्षेत्र का सकल सालाना कारोबार एक अरब का आंकड़ा पार करता है तो उसे उद्योग का दर्जा प्राप्त हो जाता है, लेकिन सेक्स सेवा को अब तक वहां उद्योग का दर्जा नहीं मिल पाया है. हेयर सैलून और मसाज पार्लर की आड़ में हो रहे देह व्यापार के धंधे की समस्याओं की तऱफ से चीन की सरकार आंख मूंदकर बैठी है.

अपनी इस किताब की भूमिका में गीताश्री ने अपने बचपन के अनुभव का ज़िक्र किया है, जिसमें उन्होंने बताया है कि किस तरह उनके गांव में शादी के दौरान मह़िफल में बाईजी का नाच होता था. उस बाईजी के नाच ने लेखिका के बाल मन पर गहरा प्रभाव डाला था, जिसका असर का़फी बाद तक उसके मन पर रहा. उस व़क्त बालमन में कई प्रश्न भी उठ खड़े हुए थे, जिनके जवाब बाद में पत्रकारिता के दौरान उनको मिले. बाल मन में उठ रहे सवालों को लेकर लेखिका जब कॉलेज की प़ढाई के लिए बिहार के अपने शहर मुज़फ्फरपुर आती हैं तो वहां पहली बार कोठे और कोठेवालियों से सामना होता है. हिंदी के वरिष्ठ कवि जानकी वल्लभ शास्त्री मुज़फ्फरपुर के उसी बदनाम मोहल्ले चतुर्भुज स्थान की गली के आ़खिर में बने एक मकान में रहा करते थे. साहित्य की विद्यार्थी थी, लिहाज़ा जानकी वल्लभ शास्त्री के घर आना जाना शुरू हुआ. साहित्य प्रेम की आड़ में गीताश्री ने मुज़फ्फरपुर की उस बदनाम गली चतुर्भुज स्थान के कई चक्कर लगाए. कोठे और कोठेवालियों के तिलिस्म को समझने की लगातार कोशिश में देश-विदेश के रेड लाइट एरिया में चक्कर लगाती रही. किताब की भूमिका में स्वीकार भी किया है कि बचपन में जगी उत्सुकता धीरे-धीरे उनके प्रति सद्‌भाव में बदलती चली गई. फिर दुनिया देखने का मौका मिला. देश के कुछ चुनिंदा ठिकाने देखने के बाद दुनिया की खिड़की से झांकने का मन था. यह मौक़ा भी खूब मिला. कई विकसित और विकासशील देशों की ऐसी लड़कियों की दुनिया को क़रीब से महसूस करने का मौक़ा मिला. लगभग कई रातें गुज़ारी, उन गलियों की तलाश में, अपने लोकल गाइड और दोस्तों की सहायता भी ली. इस तरह बिहार के गांव की मह़िफल से जो उत्सुकता पैदा हुई, वह गीताश्री को जर्मनी, चीन, हंगरी, ईरान से लेकर खाड़ी देशों में वेश्याओं की स्थिति को जानने के लिए खींच ले गई. साथ ही वह अपने देश के मशहूर वेश्यावृत्ति के अड्डों तक भी पहुंचती हैं.

इस किताब की जो केंद्रीय थीम है, वह यह है कि सारी दुनिया में वेश्यावृत्ति के पीछे के कारण कमोबेश एक ही हैं. गीताश्री जब इसको परखती हैं तो वह उन देशों के उदाहरण और तथ्यों को भी पेश करती चलती हैं, जिस वजह से किताब की उपयोगिता और विश्वसनीयता दोनों बढ़ जाती है. चीन के बारे में लेखिका ने कई चौंकाने वाले तथ्यों का खुलासा किया है. गीताश्री ने बताया है कि चीन में सेक्स सेवाओं का सालाना कारोबार तक़रीबन 3.6 अरब डॉलर को पार कर गया है. गीताश्री के मुताबिक़, चीन में किसी क्षेत्र का सकल सालाना कारोबार एक अरब का आंकड़ा पार करता है तो उसे उद्योग का दर्जा प्राप्त हो जाता है, लेकिन सेक्स सेवा को अब तक वहां उद्योग का दर्जा नहीं मिल पाया है. हेयर सैलून और मसाज पार्लर की आड़ में हो रहे देह व्यापार के धंधे की समस्याओं की तऱफ से चीन की सरकार आंख मूंदकर बैठी है. लेकिन हेयर सैलून का विस्तृत अध्ययन करने वाले गे जेजू के हवाले से लिखा गया है कि बहुत देर तक इस समस्या को नज़रअंदाज़ करना नामुमकिन है. चीन पर लिखे लेख में गीताश्री ने वहां चल रहे देह व्यापार को भी डिमांड और सप्लाई के सिद्धांत के आधार पर परखा है. चीन के अलावा गीताश्री पाठकों को एम्सटर्डम भी ले जाती हैं. चीन के बिल्कुल उलट, वहां वेश्यावृत्ति को क़ानूनी मान्यता प्राप्त है. वहां किस तरह से स्त्रियां अपनी देह की नुमाइश करती हैं, और किस तरह से पूरा कारोबार फैला हुआ है, उसका भी आंखों देखा वर्णन लेखिका ने किया है. एक पत्रकार की आंख में जब साहित्यकार की संवेदना शामिल हो जाती है, तो जो भाषा पैदा होती है उसकी चमक को भी गीताश्री की इस किताब में महसूस किया जा सकता है.

धर्म के नाम पर जिस तरह से सदियों से स्त्रियों के शरीर का उपभोग पुरुष करता है, उसकी पड़ताल भी गीताश्री ने इस किताब में की है. चाहे कोई भी धर्म हो, उसमें स्त्रियों को दोयम दर्जे का ही अधिकार प्राप्त है. हम चाहे जितना भी नारा लगा लें कि स्त्रियां पूजनीय हैं, लेकिन अंतत: वे उपभोग की ही वस्तु रही हैं. स्त्री देह के शोषण और उसके  उपयोग को लेकर धर्मों में कमोबेश मतांतर नहीं है. कुल मिलाकर अगर हम देखें तो गीताश्री की यह किताब औरत की बोली वेश्यावृति के इस कारोबार का समाज शास्त्रीय अध्ययन भी है. इस किताब के कई चैप्टर छोटे हैं, लेकिन उसमें बड़े सवाल उठाकर गीताश्री उससे टकराने की चुनौती भी समाज को देती हैं. गीताश्री अपनी यात्राओं के  मध्य समय-समय पर मिलने वाले लोगों के अनुभव से अपने लेखों को समृद्ध करती चलती हैं. गीताश्री की इस किताब की छोटी सी भूमिका राजेंद्र यादव ने लिखी है, आशीर्वाद की शक्ल में.

(लेखक IBN7 से जुड़े हैं)

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