क्या बड़े खुदरा व्यापारी भारत के लिए फायदेमंद साबित होंगे?

घरेलू खुदरा बाज़ार के क्षेत्र में अचानक बड़े विदेशी खिलाड़ियों को आमंत्रित करने के सरकारी फैसले से विवाद का पिटारा खुल गया है. इन बड़े-बड़े खुदरा व्यापारियों (विदेशी रिटेलर्स) के नफे-नुक़सान पर एक विस्तृत चर्चा होनी चाहिए. हो सकता है कि अभी पश्चिम के जिन देशों में ये व्यापार कर रहे हैं, वहां की अर्थव्यवस्था के लिए अच्छे हों, लेकिन क्या ये बड़े-बड़े विदेशी मार्ट भारत जैसे देश के लिए भी उपयुक्त हैं? अभी स्थानीय किराना दुकानदार, भाजी वाले एवं दूध वाले ही लोगों तक सामान पहुंचाते हैं और इस काम को वे पूरी सक्षमता से कर भी रहे हैं. क्या ये बड़े स्टोर्स इन स्थानीय किराना दुकानों और भाजी वालों को बाज़ार से हटा देंगे? अगर ऐसा होता है तो इससे लाखों की संख्या में लोग बेरोज़गार हो जाएंगे. ऐसे लोग भी बेरोज़गार होंगे, जो अभी तक स्व-रोज़गार से जुड़े हैं.

क्या ये बड़े स्टोर्स इन स्थानीय किराना दुकानों और भाजी वालों को बाज़ार से हटा देंगे? अगर ऐसा होता है तो इससे लाखों की संख्या में लोग बेरोज़गार हो जाएंगे. ऐसे लोग भी बेरोज़गार होंगे, जो अभी तक स्व-रोज़गार से जुड़े हैं. एक बात यह कही जा रही है कि इससे स्थानीय किराना दुकानें ख़त्म नहीं होंगी. इसका अर्थ यह हुआ कि पूरी चेन में ये बड़े रिटेल स्टोर्स महज़ एक और कड़ी के रूप में जुड़ जाएंगे. फिर एक उपभोक्ता को सस्ता सामान कैसे मिलेगा?

एक बात यह कही जा रही है कि इससे स्थानीय किराना दुकानें ख़त्म नहीं होंगी. इसका अर्थ यह हुआ कि पूरी चेन में ये बड़े रिटेल स्टोर्स महज़ एक और कड़ी के रूप में जुड़ जाएंगे. फिर एक उपभोक्ता को सस्ता सामान कैसे मिलेगा? कुछ समय बाद क्या होगा, यह मैं अभी नहीं जानता, लेकिन इस फैसले का तत्काल और नकारात्मक प्रभाव स्व-रोज़गार कर रहे उन लाखों लोगों पर पड़ेगा, जो अभी अपना सामान हमें बेचकर ईमानदारी से जीवनयापन कर रहे हैं. यह सरकार, जो हमेशा आम आदमी की बात करती है, उसे सोचना चाहिए कि उसका यह फैसला आम आदमी पर एक हमले की शक्ल में देखा जाएगा, जिसमें छोटे दुकानदार और उपभोक्ता, दोनों शामिल हैं. इसलिए सरकार के लिए अच्छा यही होगा कि वह फिलहाल इस फैसले को वापस ले ले. इस बीच सरकार को चाहिए कि वह यह पता करने की कोशिश करे कि पिछले पांच-सात सालों में भारत के बड़े खुदरा व्यापारियों का कामकाज कैसा रहा. बड़े-बड़े नाम इस क्षेत्र में हैं. क्या वे जनता की सेवा ठीक से कर रहे हैं, क्या वे सही सामान बेच रहे हैं, वह भी कम दामों पर? अगर बड़ी भारतीय कंपनियां खुदरा बाज़ार में सफल नहीं हो सकती हैं तो भला विदेशी कंपनियां कम दामों पर सामान बेचने में कैसे सफल होंगी? मैं कोई अर्थशास्त्री नहीं हूं, जो यह कह सकूं कि देश की तरक्की के लिए कब इस तरह का फैसला सही होगा, लेकिन इतना ज़रूर कह सकता हूं कि इस फैसले के लिए यह समय उपयुक्त नहीं है. देश में पहले से ही बहुत सी समस्याएं हैं. हमें उन लोगों को, जो ईमानदारी से काम करके अपना जीवनयापन कर रहे हैं, विस्थापित करके एक और समस्या पैदा नहीं करनी चाहिए.

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