2011: उल्लेखनीय कृति का रहा इंतज़ार

वर्ष 2011 ख़त्म हो गया. देश के विभिन्न समाचारपत्र-पत्रिकाओं में पिछले वर्ष प्रकाशित किताबों का लेखा-जोखा छपा. पत्र-पत्रिकाओं में जिस तरह के सर्वे छपे, उससे हिंदी प्रकाशन की बेहद संजीदा तस्वीर सामने आई. एक अनुमान के मुताबिक़, तक़रीबन डेढ़ से दो हज़ार किताबों का प्रकाशन पिछले साल भर में हुआ. लेखा-जोखा करने वाले लेखकों ने हर विधा में कई पुस्तकों को उल्लेखनीय तो कई पुस्तकों को साहित्यिक जगत की अहम घटना करार दिया. कुछ समीक्षकों ने तो चुनिंदा कृतियों को महान कृतियों की श्रेणी में भी रख दिया. मैं उन समीक्षकों पर कोई टिप्पणी नहीं करना चाहता, लेकिन अगर हम वस्तुनिष्ठता के साथ पिछले वर्ष के हिंदी साहित्य पर नज़र डालें तो पाते हैं कि बीता वर्ष रचनात्मकता के लिहाज़ से उतना उर्वर नहीं रहा, जितना साहित्यिक सर्वे में हमें दिखा. मैंने पिछले वर्ष जितना पढ़ा या फिर यह कह सकता हूं कि जिन कृतियों के बारे में पढ़ा, उसके आधार पर जो एक तस्वीर उभर कर सामने आती है, वह बहुत निराशाजनक है. अगर हम हर विधा के हिसाब से बात करें तो भी हिंदी साहित्य में कोई आउटस्टैंडिंग कृति के आने का दावा नहीं कर सकते.

हंस के सर्वेक्षण में आलोचना विधा में पहला नाम निर्मला जैन की किताब कथा समय में तीन हमसफर का है. पता नहीं, अशोक मिश्र को निर्मला जैन की किताब आलोचना की किताब कैसे लगी, ज़्यादा से ज़्यादा उस किताब को संस्मरणात्मक समीक्षा कह सकते हैं. निर्मला जैन की उक्त किताब में उनकी तीन सहेलियों के घर-परिवार से लेकर नाते- रिश्तेदार सभी मौजूद हैं.

अगर हम हिंदी साहित्य में उपन्यास के परिदृश्य को देखें तो पिछले साल साहित्य की इस विधा में दर्जनों किताबें प्रकाशित हुईं, कईयों की चर्चा भी हुई, लेकिन कोई भी किताब साहित्य जगत में धूम मचा दे, यह हो नहीं सका. कुछ दिनों पहले एक सोशल नेटवर्किंग साइट पर समीक्षक साधना अग्रवाल ने पिछले वर्ष प्रकाशित दस किताबों की सूची जारी की. साधना अग्रवाल ने उन्हीं किताबों के आधार पर तहलका में लेख भी लिखा. फेसबुक पर मेरा और साधना जी का संवाद भी हुआ. वहां भी मैंने यह संकेत करने की कोशिश की थी कि इस वर्ष कुछ भी उल्लेखनीय नहीं छपा. यहां मैं अगर उल्लेखनीय कह रहा हूं तो इसका मतलब यह है कि वर्ष भर उस कृति की चर्चा हो और उसके बहाने साहित्य में विमर्श भी हो. इसके अलावा साहित्यिक पत्रिका हंस और पाखी में भी साल भर की किताबों पर विस्तार से लेख छपे. हंस में अशोक मिश्र ने उपन्यासों की पूरी सूची दी. अशोक मिश्र के मुताबिक़, हरिसुमन बिष्ट का उपन्यास बसेरा साल का सबसे अच्छा उपन्यास है. उन्होंने श्रमपूर्वक उपन्यासों की एक पूरी सूची गिनाई है, लेकिन बिष्ट के उपन्यास को सबसे अच्छा क्यों माना, इसकी वजह नहीं बताई. हो सकता है कि अशोक मिश्र की राय में दम हो, लेकिन हिंदी जगत में बिष्ट का यह उपन्यास अननोटिस्ड रह गया.

हंस के सर्वेक्षण में आलोचना विधा में पहला नाम निर्मला जैन की किताब कथा समय में तीन हमसफर का है. पता नहीं, अशोक मिश्र को निर्मला जैन की किताब आलोचना की किताब कैसे लगी, ज़्यादा से ज़्यादा उस किताब को संस्मरणात्मक समीक्षा कह सकते हैं. निर्मला जैन की उक्त किताब में उनकी तीन सहेलियों के घर-परिवार से लेकर नाते- रिश्तेदार सभी मौजूद हैं. उस किताब को पढ़ने के बाद मेरी जो राय बनी, वह यह है कि निर्मला जैन का लेखन बेहद कंफ्यूज्ड है और वह क्या लिखना चाहती थीं, यह साफ ही नहीं हो पाया. आलोचना में जिन नामों को उन्होंने प्रमुख किताबें माना है, उनमें से ज़्यादातर लेखों के संग्रह हैं या फिर कुछ संपादित किताबें. पाखी में भारत भारद्वाज के लेख पर टिप्पणी करने से मैं अपने आपको रेस्कयू कर रहा हूं. तहलका में साधना अग्रवाल ने अपने चयन को सीमित किया है और स़िर्फ दस किताबों पर बात की है. इसका एक फायदा यह हुआ कि दस किताबों के बारे में संक्षिप्त ही सही, जानकारी तो मिली.

साधना अग्रवाल ने पहला नाम मेवाराम के उपन्यास सुल्तान रजिया का दिया है. हो सकता है कि मेवाराम का यह उपन्यास बेहतर हो, लेकिन अगर यह इतना अच्छा था तो हिंदी जगत में इस पर चर्चा होनी चाहिए थी, जो सर्वेक्षणों के अलावा ज़्यादा दिखी नहीं. सूची में और नाम हैं- मंजूर एहतेशाम का मदरसा, प्रदीप सौरभ का उपन्यास तीसरी ताली, ओम थानवी का यात्रा संस्मरण मुअनजोदड़ो. तीसरी ताली मैंने पढ़ी है और मुझे लगता है कि इस उपन्यास का न तो विषय नया है और न कहने का अंदाज़. इस विषय पर अंग्रेजी में कई किताबें लिखी जा चुकी हैं. प्रदीप सौरभ के उपन्यास तीसरी ताली और पूर्व में प्रकाशित रेवती के उपन्यास अ ट्रूथ अबाउट में संयोगवश कई समानताएं देखी जा सकती हैं. अब अगर जनसत्ता के संपादक ओम थानवी के यात्रा संस्मरण मुअनजोदड़ो पर बात करें तो हम देखते हैं कि इस किताब की समीक्षा हिंदी की लगभग सभी पत्र-पत्रिकाओं में छपी. एक अनुमान के मुताबिक़, इस किताब की तक़रीबन दो से तीन दर्जन समीक्षाएं तो मेरी ही नज़र से गुजरी होंगी. ओम थानवी यशस्वी संपादक हैं, देश-विदेश में घूमते रहते हैं. उनका यह यात्रा संस्मरण अच्छा है, लेकिन हिंदी में यात्रा संस्मरणों की जो समृद्ध परंपरा रही है, उसमें मुअनजोदड़ो ने थोड़ा ही जोड़ा है. इसके अलावा साधना अग्रवाल की सूची में जो अहम नाम है, वह है विश्वनाथ त्रिपाठी की किताब व्योमकेश दरवेश. इस किताब की भी ख़ूब समीक्षाएं छपीं, लेकिन हिंदी के आलोचकों में इसको लेकर दो मत हैं. कुछ लोगों को यह कृति कालजयी लग रही है तो कई नामवर आलोचकों ने इस कृति को साधारण क़रार दिया, जिसमें तथ्यात्मक भूलों के अलावा बहुत ज़्यादा दोहराव है. मैंने दो सर्वेक्षणों का जिक्र इसलिए किया, ताकि एक अंदाज़ा लग सके कि हिंदी में पिछले वर्ष किन रचनाओं को लेकर सर्वेक्षणकर्ताओं ने उत्साह दिखाया. मैं जो एक बड़ा सवाल खड़ा करना चाहता हूं, वह यह कि हिंदी में पिछले वर्ष जो रचनाएं छपीं, उन्हें लेकर हिंदी साहित्य में कोई खासा उत्साह देखने को नहीं मिला. मैं यह बात पाठकों के पाले में डालता हूं कि वे यह तय करें और विचार करें कि क्या पिछले वर्ष गालिब छूटी शराब, मुझे चांद चाहिए, चाक, आंवा, कितने पाकिस्तान जैसी कोई कृति छपी. मैं सर्वेक्षणकर्ताओं और हिंदी के आलोचकों के सामने भी यह सवाल खड़ा करता हूं कि वे इस बात पर ग़ौर करें कि बीते वर्षों में कोई अहम कृति सामने क्यों नहीं आ पा रही है, क्या हिंदी लेखकों के सामने रचनात्मकता का संकट है या फिर जो स्थापित लेखक हैं, वे चुकने लगे हैं और नए लेखकों के लेखन में वह कलेवर नहीं है या फिर कहें कि उनकी लेखनी पर अभी सान नहीं चढ़ पाई है कि वे हिंदी साहित्य जगत को झकझोर सकें. पिछले दिनों सामयिक प्रकाशन के सर्वेसर्वा और मित्र महेश भारद्वाज से बात हो रही थी तो मैंने यूं ही उनसे पूछ लिया कि पिछले कई सालों से आंवा जैसी कृति क्यों नहीं छाप रहे हैं. महेश जी ने जो बात कही, उसने मुझे झकझोर दिया. महेश भारद्वाज के मुताबिक़, आज का हिंदी का लेखक डूबकर लेखन नहीं कर रहा है, पाठकों के बदलते मिज़ाज को समझ भी नहीं पा रहा है और लेखकों से पाठकों की नब्ज़ छूटती हुई सी प्रतीत होती है. आज हिंदी के लेखकों का ज़्यादा ध्यान लेखन के बजाय पुरस्कार-सम्मान पाने की तिकड़मों में लगा है. अगर हिंदी का लेखक इन तिकड़मों के बजाय अपने विषय पर ध्यान केंद्रित करे और विषय में डूबकर लिखे तो हिंदी जगत को पिछले एक दशक से जिस मुझे चांद चाहिए, आंवा और चाक जैसी कृतियों का इंतज़ार है, वह ख़त्म हो सकता है. बातों-बातों में महेश भारद्वाज ने बहुत बड़ी बात कह दी है, जिस पर हिंदी के लेखकों को ध्यान देना चाहिए, क्योंकि प्रकाशक होने की वजह से वह पाठकों के बदलते मन-मिज़ाज से तो वाक़ि़फ हैं ही.

(लेखक IBN7 से जुड़े हैं)

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