यात्रा साहित्य माला में एक और मोती

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मनुष्य-जातियों का इतिहास उनकी यायावरी प्रवृत्ति से संबद्ध है. यात्रा का मुख्य आकर्षण-बिंदु मनुष्य के सौंदर्य बोध के विकास के साथ-साथ चतुर्दिक्‌ व्याप्त जगत का विस्तार भी है. प्रस्तुत कृति के लेखक अनिल सुलभ ने सौंदर्य बोध की दृष्टि से उल्लास की भावना द्वारा प्रेरित होकर उत्तर और दक्षिण भारत की यात्रा की. सुलभ ने ऐसे यायावर की भूमिका का निर्वहन किया, जिसमें साहित्यिक मनोवृत्ति दृष्टिगत होती है.

सुलभ एक ऐसे साहित्यिक यायावर हैं, जिन्होंने मुक्त मनोवृत्ति के साथ परिभ्रमण किया और इस कृति की रचना करके यात्रा साहित्य या फिर परम घुमक्कड़ राहुल सांकृत्यायन के शब्दों में, घुमक्कड़ साहित्य की श्रीवृद्धि की. सुलभ ने यात्रा का केवल विवरण मात्र ही प्रस्तुत नहीं किया, अपितु उनकी यात्रा में धार्मिक, सामाजिक और सांस्कृतिक दृष्टि को अपेक्षित प्रमुखता प्राप्त हुई और हिंदी यात्रा साहित्य समृद्ध हुआ.

सुलभ एक ऐसे साहित्यिक यायावर हैं, जिन्होंने मुक्त मनोवृत्ति के साथ परिभ्रमण किया और इस कृति की रचना करके यात्रा साहित्य या फिर परम घुमक्कड़ राहुल सांकृत्यायन के शब्दों में, घुमक्कड़ साहित्य की श्रीवृद्धि की.

सुलभ की इस कृति से यात्रा साहित्य का विस्तार हुआ है, साथ ही हिंदी की निबंध शैली को भी नया आयाम मिला, जिसमें यात्रा करने वाले की व्यक्तिपरकता, स्वच्छंदता और आत्मीयता आदि गुणों का भी समावेश हुआ है. सुलभ ने यात्रा के क्रम में प्राय: उन्हीं क्षणों को अक्षरबद्ध किया है, जिन्हें उन्होंने अनुभूत सत्य के रूप में ग्रहण किया. भ्रमण से संबद्ध देश और काल के वर्णन में निरपेक्ष रूप से सुलभ का अपना व्यक्तित्व भी उभर कर सामने आया. उन्होंने खुद को केंद्र में रखकर भी प्रमुख न बनाकर साहित्यिक यायावर के कर्तव्य का सफल निर्वहन किया. सरल-प्रांजल भाषा में लिखी यह कृति यात्रा साहित्य में एक महत्वपूर्ण स्थान रखती है.

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