अदम गोंडवी : आम आदमी का शायर

शब्द-शब्द संघर्ष करने वाले साहित्य जगत के शिल्पकार रामनाथ सिंह उ़र्फ अदम गोंडवी नहीं रहे. ग़ुरबत में ज़िंदगी ग़ुजार कर साहित्य की सेवा करने वाले अदम गोंडवी ने अभाव में ज़िंदगी के ताप को महसूस कराने के लिए अपने गांव आटा परसपुर (गोंडा, उत्तर प्रदेश) की ओर से साहित्यानुरागियों का ध्यान खींचने के लिए क़लम को तलवार बनाते हुए कहा था,

आइए महसूस करिए ज़िंदगी के ताप को.

इन पंक्तियों के रचियता और गाहे-बगाहे इसे गुनगुनाने वाले रामनाथ ने इन पंक्तियों की रचना उस समय की थी, जब उनका गांव दबंगों से भयाक्रांत था. दबंग जब तब ग़रीबों की बहू-बेटियों को उठा ले जाने को अपना हक़ समझते थे. आम जनता की वेदनाओं को शब्दों में पिरोकर वाले गोंडवी की मौत पर सभी ने शोक व्यक्त किया. शोक व्यक्त करने वालों में वे लोग तो थे ही, जो गोंडवी को अपना आदर्श मानते थे, ऐसे लोगों की संख्या भी कम नहीं थी जिनका साहित्य जगत से कुछ लेना-देना नहीं था. ऐसे लोगों में नेताओं और नौकरशाहों की संख्या अधिक थी, जो ऐसे मौक़ों पर प्रेस नोट के माध्यम से दुख व्यक्त कर अपने कर्तव्यों की इतिश्री कर लेते हैं. अदम गोंडवी को पीजीआई में इलाज तक तब उपलब्ध हो पाया था, जब पूर्व मुख्यमंत्री और सपा प्रमुख मुलायम सिंह यादव ने हस्तक्षेप किया. गोंडवी लीवर संबंधी बीमारी से पीड़ित थे. अंत समय तक वह अपने घर वालों को हिदायत देते रहे कि उनके इलाज के लिए सरकार का मुंह न देखा जाए. उन्होंने सरकारी मदद लेने से इंकार कर रखा था. अदम की इच्छानुसार उनका अंतिम संस्कार उनके गांव में ही किया गया.

आज़ादी के बाद 22 अक्टूबर, 1947 में गोंडा ज़िले के छोटे से गांव आटा परसपुर में जन्मे अदम गोंडवी कभी अपनी जड़ों से दूर नहीं हुए. यही वजह थी कि खेती-किसानी करते हुए भी वह अपनी रचनाओं के ज़रिये जनआक्रोश और पीड़ा को शब्दों में पिरोते रहे. शहरी चकाचौंध से दूर धूल के ग़ुबार व खेत-खलिहान के बीच क़लम को तलवार की तरह धार देने वाले गोंडवी फक्कड़ स्वभाव के जनकवि थे.

वर्ष 1973 में उनके गांव के दलित हरखू की बेटी कृष्णा के साथ शर्मसार कर देने वाली घटना हुई थी और डर के कारण पूरा गांव मौन था. उस समय अदम मुखर होकर अपनी बात कहने में लगे थे. उनकी कविता आग उगल रही थी और इसकी तपिश भारत ही नहीं बीबीसी हिंदी सेवा लंदन तक जा पहुंची थी. बीबीसी ने गोंडवी की इस कविता को (जो कविता नहीं चश्मदीद गवाह बन प्रस्फुटित हुई थी) विश्व भर में फैलाया.

वर्षों तक हिंदी साहित्य की सेवा के बाद बीते 18 दिसंबर को प्रातकाल: सवा पांच बजे लखनऊ पीजीआई में आ़खिरी सांस लेने वाले रामनाथ की छवि गंवई कवि की थी. वह अपने  गांव के यथार्थ के बारे में कहा करते थे-

फटे कप़डों में तन ढाके गुज़रता है जहां कोई

समझ लेना वो पगडंडी अदम के गांव जाती है

आज़ादी के बाद 22 अक्टूबर, 1947 में गोंडा ज़िले के छोटे से गांव आटा परसपुर में जन्मे अदम गोंडवी कभी अपनी जड़ों से दूर नहीं हुए. यही वजह थी कि खेती-किसानी करते हुए भी वह अपनी रचनाओं के ज़रिये जनआक्रोश और पीड़ा को शब्दों में पिरोते रहे. शहरी चकाचौंध से दूर धूल के ग़ुबार व खेत-खलिहान के बीच क़लम को तलवार की तरह धार देने वाले गोंडवी फक्कड़ स्वभाव के जनकवि थे. कवि सम्मेलनों में गोंडवी मंच पर होते तो श्रोताओं की फरमाइश का सिलसिला मुश्किल से थमता था. उनकी रचनाओं की धार और मार का अंदाज़ा इसी से लगाया जा सकता है कि 1980-90 के दशक में उनकी रचनाएं जन आंदोलनों में छाई रहती थीं. उनकी रचना यह रचना आज भी लोगों की ज़ुबान पर छाई रहती है.

सौ में सत्तर आदमी फ़िलहाल जब नाशाद है

दिल पर रखकर हाथ कहिए देश क्या आज़ाद है

कालू भुने प्लेट में, विह्स्की गिलास में

उतरा है रामराज विधायक निवास में

कवि नरेश सक्सेना कहते हैं कि अदम गोंडवी की गिनती उन कवियों में होती थी, जिनकी ख्याति जन-जन में थी. जनता के संघर्ष को लेकर चलने वाले कवि अदम गोंडवी सहज भाव से हमारे जीवन व हमारे चिंतन में प्रवेश कर जाते थे. उनका निधन हमारे समय की बहुत बड़ी क्षति है. यह जनसंघर्ष की भी बहुत बड़ी क्षति है.

इलाज के लिए गोंडवी को हुई मुश्किलों से शायर मुनव्वर राना के दिल को का़फी ठेंस लगी. वह अपने जज्बात को रोक नहीं पाए और बोले-इस मुल्क में परंपरा है मांगने की, मांगोगे तो पद्मश्री मिल जाएगा और नहीं मांगोगे तो इलाज भी नहीं मिलेगा. अदम सरकार के दरबार में सलामी देने नहीं जाते थे. वह जिस सम्मान के हक़दार थे, उसका दसवां हिस्सा भी उन्हें नहीं मिला. आदमी को सम्मान नहीं मिलता तो वह अपने आप को खत्म करने लगता है, जैसा गोंडवी जैसे तमाम खुद्दार लोगों के साथ होता है.