बार-बार वर्धा

तक़रीबन दस-ग्यारह महीने बाद एक बार फिर वर्धा जाने का मौक़ा मिला. वर्धा के महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय के छात्रों से बात करने का मौक़ा था. दो छात्रों हिमांशु नारायण और दीप्ति दाधीच के शोध को सुनने का अवसर मिला. महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय में यह एक अच्छी परंपरा है कि पीएचडी के लिए किए गए शोध को जमा करने के पहले छात्रों, शिक्षकों एवं विशेषज्ञों के सामने प्रेजेंटेशन देना पड़ता है. कई विश्वविद्यालयों में जाने और वहां की प्रक्रिया को देखने-जानने के बाद मेरी यह धारणा बनी थी कि विश्वविद्यालयों में शोध प्रबंध बेहद जटिल और शास्त्रीय तरीक़े से पुराने विषयों पर ही किए जाते हैं. मेरी यह धारणा साहित्य के विषयों के इर्द-गिर्द बनी थी. जब महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय के  पत्रकारिता के छात्रों से मिलने और उनके शोध सुनने का मौक़ा मिला तो मेरी यह धारणा थोड़ी बदली. हिमांशु नारायण के शोध का विषय भारतीय फीचर फिल्म और शिक्षा से जुड़ा था, जबकि दीप्ति ने इंडिया टीवी और एनडीटीवी का तुलनात्मक अध्ययन किया था. दोनों के अध्ययन में कई बेहतरीन निष्कर्ष देखने को मिले.

गोपाल कृष्ण गांधी ने गांधी और जय प्रकाश के बीच पहली मुलाकात का दिलचस्प वर्णन किया है. उनके मुताबिक़, तक़रीबन सात साल बाद जब जय प्रकाश नारायण अपनी पढ़ाई ख़त्म करके अमेरिका से भारत लौटे तो अपनी पत्नी से मिलने वर्धा गए, जहां वह गांधी के सानिध्य में रह रही थीं. पहली मुलाकात में गांधी ने जय प्रकाश से देश में चल रहे आज़ादी के आंदोलन के बारे में कोई बात नहीं की, बल्कि उन्हें ब्रह्मचर्य पर लंबा उपदेश दिया.

हिमांशु ने तारे जमीं पर और थ्री इडियट जैसी फिल्मों के आधार पर श्रमपूर्वक कई बातें कहीं, जिन पर ग़ौर किया जाना चाहिए. हिमांशु ने पांच सौ से ज़्यादा लोगों से बात करके उनकी राय को अपने शोध प्रबंध में शामिल किया है, जो उसे प्रामाणिकता प्रदान करती है. उसके शोध के प्रेजेंटेशन के समय कई सवाल खड़े हुए. यह देखना बेहद दिलचस्प था कि दूसरे विषयों के छात्र या फिर उसके ही विभाग के छात्र भी पूरी तैयारी के साथ आए थे, ताकि शोध करने वाले अपने साथी छात्रों को घेरा जाए. सुझाव और सलाह के नाम पर जब छात्र खड़े हुए तो फिर शुरू हुआ ग्रीलिंग का सिलसिला, जिसे विभागाध्यक्ष प्रोफेसर अनिल राय अंकित ने रोका. दीप्ति का शोध बेहद दिलचस्प था. एनडीटीवी और इंडिया टीवी की तुलना ही अपने आप में दिलचस्प विषय है. ख़बरों को पेश करने का दोनों चैनलों का बेहद अलहदा अंदाज है, लेकिन दो साल के अपने शोध के बाद दीप्ति ने यह निष्कर्ष दिया कि समाचारों में कमी आई है और न्यूज़ चैनलों पर मनोरंजन बढ़ा है. दोनों चैनलों की कई हज़ार मिनटों की रिकॉर्डिंग का विश्लेषण करने के बाद उसके निष्कर्ष दिलचस्प थे और चौंकाने वाले भी. वर्धा जाकर एक बार फिर बापू की कुटी या आश्रम में जाने का मन करने लगा था. दूसरे दिन सुबह-सुबह वर्धा के ही गांधी आश्रम पहुंच गया, जो विश्वविद्यालय से आधे घंटे की दूरी पर स्थित है. वहां पहुंच कर एक अजीब तरह की अनुभूति होती है. वातावरण इस तरह का है, लगता है कि आप वहां घंटों बैठ सकते हैं. तक़रीबन दस महीने पहले जब वर्धा गया था तो भी गांधी आश्रम गया था. वहां गांधी जी की कई वस्तुएं रखी हैं, गांधी का बाथ टब, मालिश टेबल एवं चक्की आदि. उनके बैठने का स्थान भी सुरक्षित रखा हुआ है. पिछली बार जब गया था तो वहां बंदिशें कम थीं, लेकिन इस बार पाबंदियां इस वजह से ज़्यादा थीं, क्योंकि कुछ महीनों पहले वहां रखा बापू का ऐनक चोरी चला गया था. ऐनक चोरी हो जाने के बाद वहां रहने वाले कार्यकर्ताओं ने थोड़ी ज़्यादा सख्ती शुरू कर दी. गांधी जिस कमरे में बैठते थे, वहां बैठने के बाद आप उनके सिद्धांतों को महसूस कर सकते हैं. एक अजीब सा एहसास. गांधी आश्रम में हम चार लोग गए थे यानी मैं, अनिल राय जी, विश्वविद्यालय के शिक्षक मनोज राय और इंद्रप्रस्थ विश्वविद्यालय के शिक्षक प्रोफेसर सी पी सिंह. वहां इस बार मेरी मुलाकात गांधी जी के व़क्त से आश्रम में रह रहीं कुसुम लता ताई से हुई. वह गांधी जी के कमरे के बाहर बैठी थीं. वहां हम उनके साथ बैठे, बतियाए. हम एक ऐसी महिला के साथ बैठे थे, जिन्होंने गांधी को न स़िर्फ देखा था, बल्कि उनके आश्रम में कई साल तक उनके साथ रही थीं. बातचीत के क्रम में मैंने उनसे गांधी जी के बारे में पूछा. गांधी कैसे थे, वह कैसे रहा करते थे, आदि-आदि. गांधी, कस्तूरबा और जय प्रकाश नारायण की पत्नी प्रभावती के बारे में उन्होंने कई बातें बताईं.

उनसे प्रभावती देवी और जय प्रकाश के बारे में बात करते हुए मुझे गोपाल कृष्ण गांधी की कुछ बातें याद आ गईं, जो उन्होंने अपनी किताब-ऑफ अ सर्टेन एज में लिखी हैं. गोपाल कृष्ण गांधी ने लिखा है, जय प्रकाश नारायण को गांधी जी जमाई राजा मानते थे, क्योंकि उच्च शिक्षा के लिए जय प्रकाश के अमेरिका चले जाने के बाद प्रभावती जी गांधी के साथ वर्धा में ही रहने लगी थी और बा एवं बापू दोनों उन्हें पुत्रीवत्‌ स्नेह करते थे. दरअसल, जय प्रकाश नारायण की पत्नी प्रभावती डॉक्टर राजेंद्र प्रसाद के भाई की लड़की थीं. वर्धा के आश्रम में रहने के  दौरान बापू और कस्तूरबा दोनों उन्हें अपनी बेटी की तरह मानने लगे. भारत छोड़ो आंदोलन के दौरान गांधी जी और कस्तूरबा को पुणे के आगा खान पैलेस में कैद कर लिया गया. वहां बा की तबीयत बिगड़ गई तो गांधी ने 6 जनवरी, 1944 को अधिकारियों को पत्र लिखकर अनुरोध किया कि दरभंगा जेल में बंद प्रभावती देवी को पुणे जेल में स्थानांतरित किया जाए, ताकि कस्तूरबा की उचित देखभाल हो सके. उस पत्र में गांधी ने लिखा कि प्रभावती उनकी बेटी की तरह हैं. ये बातें कुसुमलता ताई ने भी बताईं. उन्होंने कहा कि बा और बापू दोनों प्रभावती देवी को बेटी की तरह मानते थे.

गोपाल कृष्ण गांधी ने गांधी और जय प्रकाश के बीच पहली मुलाकात का दिलचस्प वर्णन किया है. उनके मुताबिक़, तक़रीबन सात साल बाद जब जय प्रकाश नारायण अपनी पढ़ाई ख़त्म करके अमेरिका से भारत लौटे तो अपनी पत्नी से मिलने वर्धा गए, जहां वह गांधी के सानिध्य में रह रही थीं. पहली मुलाकात में गांधी ने जय प्रकाश से देश में चल रहे आज़ादी के आंदोलन के बारे में कोई बात नहीं की, बल्कि उन्हें ब्रह्मचर्य पर लंबा उपदेश दिया. बताते हैं कि गांधी जी ने प्रभावती जी के कहने पर ही ऐसा किया, क्योंकि प्रभावती जी शादी तो क़ायम रखना चाहती थीं, लेकिन ब्रह्मचर्य के व्रत के साथ. जय प्रकाश नारायण ने अपनी पत्नी की इस इच्छा का आजीवन सम्मान किया. तभी तो गांधी जी ने एक बार लिखा, मैं जय प्रकाश की पूजा करता हूं. गांधी जी की यह राय 25 जून, 1946 को एक दैनिक समाचारपत्र में प्रकाशित भी हुई थी. गांधी से जय प्रकाश का मतभेद भी था. गांधी जय प्रकाश के व्यक्तित्व में एक प्रकार की अधीरता भी देखते थे, लेकिन बावजूद इसके वह कहते थे कि जय प्रकाश एक फकीर हैं, जो अपने सपनों में खोए रहते हैं. कुसुमलता ताई ने भी जय प्रकाश और प्रभावती के बारे में कई दिलचस्प किस्से सुनाए. इसके अलावा देश की वर्तमान हालत और राजनीति के बारे में भी कुसुमलता ताई से लंबी बातचीत हुई. उसके बाद हम लोग वापस विश्वविद्यालय लौटे. वहां भी कुलपति विभूति नारायण राय की पहल पर गांधी हिल्स बना है. गांधी हिल्स पर बापू का ऐनक, उनकी बकरी, उनकी चप्पलें और उनकी कुटी बनाई गई है. आप वहां घंटों बैठकर गांधी के दर्शन के बारे में मनन कर सकते हैं बग़ैर ऊबे. महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय में गांधी के  बाद अब कबीर हिल्स बन रहा है, जहां कबीर से जुड़ी यादें ताजा होंगी. बार-बार वर्धा जाना और गांधी से जुड़ी चीजों को देखना, पढ़ना और चर्चा करना अपने आप में एक ऐसा अनुभव है, जिसे स़िर्फ महसूस किया जा सकता है, बयां नहीं.

(लेखक IBN7 से जुड़े हैं)