अमेरिका : मार्ग से भटकते नागरिक

संयुक्त राज्य अमेरिका की संस्कृति को मेल्टिंग पॉट संस्कृति कहा जाता है. मतलब यह कि वहां रहने वाले लोग चाहे किसी देश, समुदाय, धर्म या क्षेत्र से आए हों, लेकिन अमेरिका आने के बाद उन्हें उसी संस्कृति का हिस्सा बनकर रहना पड़ेगा, जिसे अमेरिका ने स्वीकार किया है. मेल्टिंग पॉट संस्कृति का मतलब है सभी संस्कृतियों का मिश्रण, जिसमें किसी की अपनी पहचान नहीं बचती है, बल्कि सभी की पहचान केवल अमेरिकी के रूप में रह जाती है. इस देश को अपनी इस संस्कृति पर नाज़ है. अमेरिका में हाल में हुई घटना से तो यह लगता है कि वहां के कुछ लोग अपनी संस्कृति से भटक गए हैं. उन्हें दूसरे धर्मों के लोगों के धार्मिक स्थलों से चिढ़ होने लगी है. वे उनके धार्मिक आयोजनों को बर्दाश्त नहीं कर पा रहे हैं. वे अपने मार्ग से भटकते जा रहे हैं, जिसका ख़ामियाजा अमेरिका को भुगतना पड़ सकता है. हाल में अमेरिका के न्यूयार्क शहर में मंदिर और मस्जिद सहित चार जगहों पर बमों से हमले हुए. इन हमलों का कारण क्या है, यह तो जांच के बाद ही पता चलेगा, लेकिन इतना तो तय है कि जिस किसी ने यह हमला किया है, वह धार्मिक कट्टरता की भावना से प्रेरित रहा होगा. इस हमले में किसी की जान नहीं गई, लेकिन यह कैसे कहा जा सकता है कि अगर इस बार जान नहीं गई तो अगली बार भी ऐसा ही होगा. ये हमले दो विभिन्न धर्मों के धार्मिक स्थलों पर हुए. अगर ये हमले किसी दूसरे देश के लोगों के घरों पर हुए होते तो कहा जा सकता था कि स्थानीय लोगों के अंदर इस बात का गुस्सा है कि अमेरिका में आकर ये लोग उनका रोज़गार छीन रहे हैं, लेकिन धार्मिक स्थलों पर हुए इन हमलों को आर्थिक कारणों से नहीं जोड़ा जा सकता है.

9/11 की घटना के बाद अमेरिका में मुसलमानों पर हमले किए गए थे. यही नहीं, वहां ऐसे हमले दूसरे समुदाय के लोगों, जैसे सिखों पर भी किए गए थे, क्योंकि वे पगड़ी पहनते हैं, जिसके कारण हमलावर उन्हें पठान समझ बैठते हैं.

धार्मिक स्थलों पर हमले का मतलब है कि हमलावर किसी न किसी तौर पर धार्मिक उन्माद से ग्रस्त हैं. ये हमले हिंदुओं एवं मुस्लिमों के धार्मिक स्थलों पर हुए हैं, जिससे यह अनुमान लगाया जा सकता है कि इन दोनों धर्मों के प्रति अमेरिकियों में आक्रोश है और यह आक्रोश इतना बढ़ता जा रहा है कि अब वे इन धर्मों को वहां बर्दाश्त नहीं करना चाहते. हमले का शिकार हुए धार्मिक स्थल न्यूयार्क के उस इलाक़े में स्थित हैं, जहां एशिया, अफ्रीका और लातिन अमेरिका के मूल निवासी रहते हैं. न्यूयार्क में रहने वाले कुछ मुसलमानों का कहना है कि पुलिस उनकी निगरानी कर रही है. ग़ौरतलब है कि इन हमलों के एक दिन पहले वहां के मेयर ने एक भोज दिया था, जिसमें सभी धर्मों के लोगों को बुलाया गया था, लेकिन उस भोज का कुछ मुस्लिम संगठनों ने बहिष्कार किया था. उन्हें शक है कि उनके धार्मिक स्थल पर हुआ हमला कहीं उसी बहिष्कार की प्रतिक्रिया तो नहीं है. हो सकता है कि इस हमले का भोज वाली घटना से कोई ताल्लुक न रहा हो, लेकिन इतना तो स्पष्ट है कि मुस्लिमों के मन में कहीं न कहीं इस बात का संदेह है कि अमेरिका में उनका धर्म सुरक्षित नहीं है. कट्टरवादी इस्लामिक संगठन पहले से ही इस बात का प्रचार करते रहे हैं कि इस्लाम ख़तरे में है. मुस्लिम समुदाय के जिन पढ़े-लिखे नौजवानों को गुमराह किया जाता है, जिन्हें आतंकवादी बनाया जाता है, उन्हें यही बताया जाता है कि उनका धर्म ख़तरे में है और यह ख़तरा जिन देशों ने पैदा किया है, उनमें अमेरिका प्रमुख है. अमेरिका को वे अपना शत्रु मानते हैं. जब इस तरह की घटनाएं होती हैं तो चरमपंथी संगठनों का काम और भी आसान हो जाता है.

9/11 की घटना के बाद अमेरिका में मुसलमानों पर हमले किए गए थे. यही नहीं, वहां ऐसे हमले दूसरे समुदाय के लोगों, जैसे सिखों पर भी किए गए थे, क्योंकि वे पगड़ी पहनते हैं, जिसके कारण हमलावर उन्हें पठान समझ बैठते हैं. चरमपंथियों ने इन हमलों को बढ़ा-चढ़ाकर प्रचारित किया था, ताकि युवाओं का माइंड वास किया जा सके. इस बार हमले धार्मिक स्थलों पर हुए हैं. इसे अमेरिका की आतंकवाद विरोधी मुहिम के मार्ग का रोड़ा कहा जा सकता है. बहरहाल, अमेरिकी प्रशासन को इन हमलों के लिए ज़िम्मेदार लोगों को जल्द से जल्द ढूंढना होगा और न केवल उन्हें इस अपराध के लिए सज़ा देनी होगी, बल्कि यह भी पता लगाना होगा कि हमलों का कारण क्या है. अमेरिकी प्रशासन को यह विश्वास दिलाना होगा कि वहां रहने वाले सभी धर्मों के लोग सुरक्षित हैं और उनके साथ किसी तरह की दोहरी नीति नहीं अपनाई जा रही है. इस घटना की जांच कर रही टीम ने आशंका ज़ाहिर की है कि कहीं यह हेट क्राइम तो नहीं है. अगर उसका अनुमान सही निकला तो इस पर गंभीरता से विचार करना होगा. ऐसी घटनाएं एक साथ कई प्रश्नों को जन्म देती हैं. ऐसे प्रश्न उन सभी लोगों के मन में उठते हैं, जिन्हें लक्ष्य बनाया जाता है. यह हमला किसी व्यक्ति विशेष पर नहीं है कि अपराधी को सज़ा देकर मामला रफा-दफा कर दिया जाए. यह किसी समुदाय विशेष की आस्था पर हमला है, जिससे उनकी भावना आहत होती है. अगर किसी समुदाय की भावनाओं के साथ छेड़छाड़ की जाती है तो उसका परिणाम बहुत घातक होता है. वहां रहने वाले धार्मिक अल्पसंख्यक ख़ुद को उपेक्षित महसूस करने लगते हैं. अगर अमेरिका शांति चाहता है तो उसे ऐसी घटनाओं पर रोक लगाने के लिए कड़े क़दम उठाने होंगे. इसके लिए शस्त्र से ज़्यादा शास्त्र की ज़रूरत होती है. अत: यह ज़रूरी है कि अमेरिका इस तरह के धार्मिक उन्माद को रोकने के लिए शास्त्र का सहारा ले. ऐसी घटनाओं के परिणामों के बारे में लोगों को बताए, ताकि वह अपनी छवि और अधिक धूमिल होने से बचा सके.

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