सहकारी अर्थव्यवस्था की प्राचीन परंपरा

एक और आवाज़ आजकल जोरों से उठाई जा रही है, वह है सहकारिता आंदोलन की. सहकारिता आंदोलन देश के लिए, राष्ट्र के हर व्यक्ति के लिए उपादेय है, बशर्ते कि इस पद्धति का ईमानदारी से अनुसरण किया जाए. यदि सहकारिता के नाम पर भी उसी पूंजीवादी प्रतिष्ठा की स्थापना होनी है तो फिर सहकारिता को बदनाम क्यों किया जाए? यूं तो सृष्टि के आदि से लेकर हर आदमी किसी न किसी रूप में सहकारिता का पक्षपाती रहा है. भारत की परिवार व्यवस्था, ग्राम्य व्यवस्था, नगर व्यवस्था सभी सहकारिता पर ही तो अवलंबित हैं. आज भी उसी रूढ़िगत परिपाटी की छाया मौजूद है. किसी व्यक्ति के यहां लड़की की शादी है. शादी में मान लें, 1 हज़ार रुपया ख़र्च होने वाला है. गांव के क़रीब-क़रीब सारे ही व्यक्ति इस आयोजन में सहयोग देंगे. कोई एक रुपया, कोई दो रुपये, कोई कम, कोई ज़्यादा व्यवहार का या चांदला का अपनी-अपनी सामाजिक रस्म के अनुसार देंगे. लड़की के पिता को अपने पास से मुश्किल से सौ या दो सौ रुपये ख़र्च करने पड़ेंगे. बाक़ी सारी व्यवस्था इसी ग्राम्य सहकारिता या सहयोग से हो जाएगी. जीवन की हर क्रिया में, जन्म से लेकर मरण पर्यंत भारत के हर घर में यह सहकारिता विद्यमान थी. आगे चलकर यह सहकारिता जाति या वर्णभेद में समा गई. लोग अपने जीवनोपयोगी पदार्थों को उपलब्ध करने के लिए संघर्षजीवी थे. अतएव दल के दल अपनी सुरक्षा का उचित प्रबंध स्वयं करते थे. कबीले ठौर-ठौर बन गए थे. यह सारा सहकारिता आंदोलन ही तो था.

भारत के विभिन्न राज्यों में सहकारी संस्थाओं के नियमन के लिए विभिन्न क़ानून बने हुए हैं. उदाहरण के लिए बंबई सहकारी संस्था एक्ट के सिद्धांत तो सही हैं, पर इस देश में, जहां शिक्षा का नितांत अभाव है, कोई भी व्यक्ति अपने अधिकारों को समझ कर क्या उचित ढंग से अपना मत दे सकता है? मान लीजिए, आपने एक सहकारी संस्था का स्टोर बनाया, जिसके द्वारा जीवनोपयोगी हर वस्तु उचित मूल्य पर हर मेंबर को मिलेगी. यह संभव इस तरह से होता है कि बहुत सी खाद्य सामग्री, पहनने के लिए कपड़े और अन्य बहुत सी चीजें सरकार से नियंत्रित मूल्य पर मिल जाती हैं या पैदा करने वालों से सीधे बिना किसी बिचौलिए की कमीशन के मिल जाती हैं.

अवैध कामों में भी बिना सहकारिता के कार्य होना असंभव सा था. चार चोर मिलकर किसी घर या मकान में चोरी करते थे तो वे भी एक-दूसरे के सहायक बनकर अलग-अलग कामों का जिम्मा लेते थे, बाद में चोरी से प्राप्त धन का सहकारिता के हिसाब से ही बंटवारा होता था. कहने का मतलब यही है कि सहकारिता भारत के लिए कोई नई चीज तो है नहीं. अब इसको वैध रूप से, आंदोलन का स्वरूप देकर, जीवनोपयोगी वस्तुओं को प्राप्त कर सकने या श्रम वितरण का या वित्त वितरण का सुगम मार्ग मानकर जगह-जगह सहकारी संस्थाएं खोल दी गई हैं. अगर भारत की सहकारी संस्थाओं के अधिष्ठाता ईमानदारी से अपने-अपने उद्देश्यों की पूर्ति करते रहें तो समाजवादी अर्थव्यवस्था का ध्येय बहुत ही जल्दी हासिल किया जा सकता है. समान वित्त वितरण आसान हो जाएगा. पर क्या ये सहकारी संस्थाएं उचित मार्ग पर चलती हैं या चल सकती हैं? यह प्रश्न विचारणीय है. ज़रा ग़ौर कीजिए.

भारत के विभिन्न राज्यों में सहकारी संस्थाओं के नियमन के लिए विभिन्न क़ानून बने हुए हैं. उदाहरण के लिए बंबई सहकारी संस्था एक्ट के सिद्धांत तो सही हैं, पर इस देश में, जहां शिक्षा का नितांत अभाव है, कोई भी व्यक्ति अपने अधिकारों को समझ कर क्या उचित ढंग से अपना मत दे सकता है? मान लीजिए, आपने एक सहकारी संस्था का स्टोर बनाया, जिसके द्वारा जीवनोपयोगी हर वस्तु उचित मूल्य पर हर मेंबर को मिलेगी. यह संभव इस तरह से होता है कि बहुत सी खाद्य सामग्री, पहनने के लिए कपड़े और अन्य बहुत सी चीजें सरकार से नियंत्रित मूल्य पर मिल जाती हैं या पैदा करने वालों से सीधे बिना किसी बिचौलिए की कमीशन के मिल जाती हैं. कोई थोक विक्रेता भी उस भाव से नहीं दे सकता. अब अगर उस सहकारी संस्था के अधिकारी और कर्मचारीगण ईमानदार हैं, तो निश्चय ही उस संस्था के मेंबरों को तमाम इच्छित वस्तुएं सस्ती और अच्छी सुलभ हो जाएंगी. पर जैसा मानव का स्वभाव है, अपने लाभ की बात सोचे बिना वह रह नहीं सकता. एक धोती जोड़ा बाज़ार में 15 रुपये में बिक रहा है और अपनी संस्था को 10 रुपये में ही मिल रहा है. सारे ख़र्चे लगाकर भी मेंबरों को 12 से ज़्यादा में नहीं दिया जा सकता तो आदमी सोच सकता है, क्यों न इनमें से कुछ लेकर, बाज़ार में ऊंची क़ीमत पर बेचकर मुना़फा कमा लिया जाए?

इसी तरह से ख़रीदने में सैकड़ों प्रलोभन के क्षण आते हैं, जिनका संवरण करना कठिन हो जाता है. सहकारी संस्था के नियमन की देखरेख करने वाले सरकार द्वारा नियुक्त किए गए इंस्पेक्टर या ऑफिसर लोग भी जब तहक़ीक़ात करने के लिए दौरे पर आते हैं, तो वे ही लोग उनकी सेवा-पूजा ज़्यादा कर सकते हैं, जिनका अपना पेट भरा हुआ हो. उपभोक्ताओं की सहकारी संस्थाओं के अलावा अब तो औद्योगिक सहकारी संस्थाएं भी जोर-शोर से चलने लगी हैं. बड़े-बड़े कारखाने या फैक्ट्रियां इस विभाग के अंतर्गत लगाए जा रहे हैं. शासन की नीति इनको यथाशक्ति सब तरह से सहायता देने की है. परिणाम यही है कि कुछ होशियार व्यक्ति, जो अपने हथकंडों से संस्था पर काबू जमाए रहते हैं, अपनी मनमानी करते रहते हैं. जिस तरह से पूंजीवादी अपनी निजी संपत्ति को अपनी बपौती समझता है, उसी तरह ये कार्यकर्तागण या सहकारिता के अधिकारी भी सहकारिता के लिए प्राप्त सुविधाओं को अपनी बपौती समझने लगे हैं. इस परिस्थिति का आख़िर इलाज हो कैसे?

जनता को प्रबुद्ध किया जाए, ताकि उनको अपने भले-बुरे का संपूर्ण ज्ञान हो जाए. वे यह समझने लगें कि उनका वोट ही वह ताक़त है, जिसकी बदौलत ये अधिकारीगण अपनी मनमानी कर सकते हैं. इस तरह की शिक्षा का प्रचार-प्रसार करने में काफी समय लगता है. इस अज्ञान को दूर करने में किसी भी राजनीतिक पार्टी का हित भी तो नहीं है. इसलिए तमाम राजनीतिक पार्टियों का बल जनता की अज्ञानता पर ही निर्भर करता है. लिहाज़ा, राजनीतिक नारों की आवाज़ चाहे जितनी बुलंद हो, जनता को अपने अधिकारों के प्रति जागरूक बनाने के लिए कोई राजनीतिक पार्टी प्रयत्नशील नहीं है. राजनेताओं का रवैया राष्ट्र के दुर्भाग्य और जनता के अकल्याण के लिए काफी हद तक ज़िम्मेदार है. सहकारिता के हिमायती उसकी सफलता के इतने ज़्यादा समर्थक हैं कि प्रत्येक बात के लिए वे अब सहकारी संस्था को ही श्रेष्ठ पंथ मानते हैं. कांग्रेस पार्टी के वामपक्षीय दल ने गत नागपुर अधिवेशन में कृषि को भी सहकारिता के सिद्धांत पर करना या कराना श्रेयष्कर समझा है. इस योजना को कार्यान्वित करने में अनेक कठिनाइयां उपस्थित हुईं, इसलिए कृषि अभी तक सहकारी बुनियाद पर चल नहीं सकी. आगे क्या होगा,  ठीक से कहा नहीं जा सकता.

महावीर प्रसाद आर मोरारका का जन्म 12 अगस्त, 1919 को नवलगढ़ (झुंझनू) राजस्थान में हुआ था. उद्योगपति, स्वप्नदृष्टा और लेखक से कहीं अधिक वह उदात्त मानवीय मूल्यों के संवाहक थे. उनकी गणना भारत के प्रमुख उद्योगपतियों में की जाती है.

महावीर प्रसाद आर मोरारका

महावीर प्रसाद आर मोरारका का जन्म 12 अगस्त, 1919 को नवलगढ़ (झुंझनू) राजस्थान में हुआ था. उद्योगपति, स्वप्नदृष्टा और लेखक से कहीं अधिक वह उदात्त मानवीय मूल्यों के संवाहक थे. उनकी गणना भारत के प्रमुख उद्योगपतियों में की जाती है.

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महावीर प्रसाद आर मोरारका

महावीर प्रसाद आर मोरारका का जन्म 12 अगस्त, 1919 को नवलगढ़ (झुंझनू) राजस्थान में हुआ था. उद्योगपति, स्वप्नदृष्टा और लेखक से कहीं अधिक वह उदात्त मानवीय मूल्यों के संवाहक थे. उनकी गणना भारत के प्रमुख उद्योगपतियों में की जाती है.