अन्ना और लोकपाल

पिछले अप्रैल महीने से सिविल सोसाइटी की एक टीम भ्रष्टाचार के मुद्दे पर आंदोलन कर रही है. संसद में भी इस आंदोलन के पक्ष-विपक्ष में बहस हो रही है. सरकार की परेशानी बढ़ गई है. यह एक अलग तरह का आंदोलन है. यह जाति, धर्म एवं क्षेत्र आदि के आधार पर किए जाने वाले आंदोलनों से भिन्न है. यह आंदोलन सारे भारत में हो रहा है, जबकि जाति, धर्म एवं क्षेत्र आदि के मुद्दों पर होने वाले आंदोलन किसी एक क्षेत्र विशेष तक सीमित रहते हैं, जिन्हें दबाना सरकार के लिए बड़ी बात नहीं होती है. अन्ना हजारे का आंदोलन केवल भ्रष्टाचार के विरुद्ध नहीं है, बल्कि यह एक क़ानून यानी लोकपाल बिल का हिस्सा है, जो कि साठ के दशक से लटका हुआ है. संसद के पास समय की कमी के कारण इसे पारित नहीं किया जा सका, लेकिन इस बार संसद के पास समय की कमी नहीं है. इसलिए कोई बहाना नहीं बनाया जा सकता. यह आंदोलन एक तरह से लोकतंत्र का विस्तार है. इस आंदोलन के माध्यम से संसद के क़ानून बनाने के एकाधिकार में हस्तक्षेप किया जा रहा है. इसे लोकतंत्र के क्षेत्र का बढ़ना ही कहा जा सकता है. वैसे अन्ना हजारे को कुछ लोग पसंद नहीं करते हैं. मैं भी संत या अध्यात्म से जुड़े लोगों पर विश्वास नहीं करता हूं. ये लोग दबंग और असहिष्णु होते हैं. इनकी अनशन करने की लालसा भी उबाऊ है. यह एक ऐसा हथियार है, जो अपना असर खोता जा रहा है, लेकिन फिर भी इसे होने दो.

एक तऱफ आम आदमी को 32 रुपये प्रतिदिन पर जीवित रहने की बात की जाती है तो दूसरी तऱफ एक सांसद को लाखों रुपये दिए जाते हैं. चुनाव में भी ये सांसद करोड़ों रुपये ख़र्च करते हैं, जिसमें काले धन का हिस्सा भी काफी होता है. ऐसे में ये लोग भ्रष्टाचार के ख़िला़फ मुहिम कैसे चला सकते हैं. बेशक लोकपाल और सीबीआई को सरकार के नियंत्रण से स्वतंत्र होना चाहिए.

अब हम लोग इस प्रक्रिया के अंतिम चरण में हैं. जन लोकपाल बिल के साथ-साथ सरकारी बिल पर बहस की जा चुकी है. संसद की स्थायी समिति ने इसे देखा है. सभी दलों की बैठक हो चुकी है और कई बैठकें बैकडोर से भी हो गई हैं. कई सारे मसौदे बांटे जा चुके हैं और अंतिम मसौदा संसद में पेश किया जा चुका है. नागरिक वर्ग इस बात को स्वीकार करता है कि संसद वैध है, क्योंकि इसे जनता द्वारा चुना गया है, लेकिन उसे इस बात का भरोसा नहीं है कि राजनीतिक व्यवस्था या सही मायनों में कार्यकारिणी भ्रष्टाचार के ख़िला़फ कोई क़दम उठाएगी. कांग्रेस ने देश पर सबसे अधिक समय तक शासन किया है, इसलिए वर्तमान स्थिति के लिए सबसे अधिक ज़िम्मेदार वही है, लेकिन दूसरे दलों को भी पाक-साफ नहीं कहा जा सकता है. सभी किसी न किसी स्तर पर भ्रष्टाचार के लिए ज़िम्मेदार हैं. सभी एक-दूसरे को भ्रष्ट कहते हैं. भाजपा कांग्रेस को भ्रष्ट कहती है और कांग्रेस भाजपा को.

अब सबसे बड़ा प्रश्न यह है कि क्या संसद, जो कि राजनीतिक व्यवस्था का हृदय है और जिसे चुनाव द्वारा वैधता प्रदान की गई है, पर इस बात का भरोसा किया जा सकता है कि वह ख़ुद भ्रष्टाचार को मिटाने वाला बिल पारित कर सकती है. जनता का उत्तर यही होगा कि संसद पर इस बात के लिए भरोसा नहीं किया जा सकता है. यही कारण है कि अन्ना हजारे के आंदोलन के साथ इतने अधिक लोग जुड़ते हैं, जिन्होंने पहले क़ानून बनाने का अधिकार नेताओं को दे रखा था. भारतीय संसद के काम करने के अपने तरीक़े हैं, जिसका पालन भी किया जाना चाहिए, लेकिन यहां सवाल उठता है कि क्या संसद सही मायनों में जनता का प्रतिनिधित्व करती है या केवल अपने अधिकारों की रक्षा करने में रुचि रखती है. वैसे भी भारतीय सांसद को जितना वेतन, भत्ता, सुविधाएं और अधिकार हासिल है, उतना किसी अन्य देश के सांसद को नहीं मिलता है. प्रति व्यक्ति आय की तुलना में तो इन्हें दी गई सुविधाएं बहुत अधिक हैं.

एक तऱफ आम आदमी को 32 रुपये प्रतिदिन पर जीवित रहने की बात की जाती है तो दूसरी तऱफ एक सांसद को लाखों रुपये दिए जाते हैं. चुनाव में भी ये सांसद करोड़ों रुपये ख़र्च करते हैं, जिसमें काले धन का हिस्सा भी काफी होता है. ऐसे में ये लोग भ्रष्टाचार के ख़िला़फ मुहिम कैसे चला सकते हैं. बेशक लोकपाल और सीबीआई को सरकार के नियंत्रण से स्वतंत्र होना चाहिए. सीबीआई के दुरुपयोग के बारे में कोई शक नहीं है, लेकिन टीम अन्ना जिस तरह लोकपाल को सबसे शक्तिशाली संस्था बनाना चाहती है, वह भी सही नहीं है. कोई भी संस्था इतनी शक्तिशाली नहीं होनी चाहिए, जिससे बाद में उससे ख़तरा होने लगे. लोकपाल और सीबीआई को संसद के प्रति ज़िम्मेदार होना चाहिए. संसद के प्रति ज़िम्मेदार होने का मतलब यह नहीं है कि वे सरकार या कार्यकारिणी के प्रति ज़िम्मेदार हों. संसद और सरकार एक नहीं है, दोनों अलग-अलग संस्थाएं हैं. लोकपाल के लिए संसद के दोनों सदनों की संयुक्त स्थायी समितियां बनाई जा सकती हैं. अब प्रश्न यह है कि क्या सरकार अपने लोकपाल बिल को संसद से पारित कराएगी या प्रदर्शन को मुद्दा बनाकर इस बिल को फिर टाल देगी कि अभी उसके पास समय नहीं है. क्या इस मुद्दे पर भी संसद में फूट पड़ेगी या फिर एकजुट होकर जवाब दिया जाएगा.