पूंजी की निर्धारित सीमा

पूंजी संपत्ति पूंजीवाद का मूल स्तंभ है. इसे मिटाना ही होगा. इस श्रेणी में प्रधानत: दो ही संपत्तियों का समावेश होता है- (1) ज़मीन जायदाद, (2) पूंजी. भारत सरकार ने जबसे समाजवादी अर्थव्यवस्था को अपना ध्येय घोषित किया है, प्रथम कक्षा के लिए कई संशोधन हुए हैं, नए क़ानून बने हैं. खेती-बाड़ी की ज़मीन एक व्यक्ति निर्धारित सीमा से ज़्यादा नहीं रख सकता. यह क़ानून अलग-अलग राज्यों में, प्राय: सारे भारत में ही बन गया है. जहां एक जमींदार के पास हज़ारों एकड़ भूमि होती थी, वहां आज क़ानूनन 30 या 50 एकड़ भूमि से ज़्यादा एक व्यक्ति या एक परिवार रख नहीं सकता. उसकी सारी अतिरिक्त भूमि कुछ मुआवज़ा देकर या बिना मुआवज़ा दिए उससे ले ली गई है या ली जा रही है. यह बड़ा भारी क्रांतिकारी परिवर्तन है. वे पूंजीवादी, जिनके पास सैकड़ों वर्षों से हज़ारों एकड़ भूमि क़ब्ज़े में चली आ रही थी, अब संत्रस्त हो रहे हैं. समान वित्त वितरण की दिशा में यह एक ठोस क़दम है.

एक पूंजीपति के पास ज़्यादा ज़मीन होना ज़्यादा पूंजी के मुक़ाबले में ज़्यादा ख़तरनाक क्यों समझा गया? कारण, जमींदार, जागीरदार या राजा-महाराजा गिनती के थे. अत: इनका हक़ हड़प लेने या समाजवादी व्यवस्था को लागू करने के बहाने से आसानी से सारी ज़मीन हस्तगत कर ली गई. अगर पूंजी का राष्ट्रीयकरण हो या सीमा निर्धारित की जाए तो बहुत भारी जनसंख्या पर इसका असर पड़ेगा.

ज़मीन रखने की ऊपरी सीमा क़ानून द्वारा निर्धारित कर दी गई, पर खेती-बाड़ी की ज़मीन के सिवाय अन्य मकान या जायदाद के संबंध में ऐसी कोई सीमा निर्धारित नहीं की गई. कोई भी एक व्यक्ति एक ही शहर में सैकड़ों मकानों का मालिक हो सकता है और मनचाहा भाड़ा जनता से वसूल कर सकता है. सौभाग्यवश शासन ने भाड़ा नियमन क़ानून बना रखा है. उसके प्रभाव से मकान मालिक स्वेच्छा से चाहे जिस हद तक भाड़ा नहीं बढ़ा सकते, पर फिर भी नए-नए मकानों में किराया बढ़ाने की जो अवधि है, वह अनुचित ढंग से ऊंची है. मकानों की क़ीमत भी काफी बढ़ी हुई है, अतएव जिस किसी जमींदार ने आज से 15 या 20 वर्ष पूर्व अपनी खेती-बाड़ी की ज़मीन बेचकर शहरों में मकान बनवा लिए या ख़रीद लिए, वे अपने आपको ज़्यादा बुद्धिमान और सौभाग्यशाली समझने लगे हैं. कारण स्पष्ट है कि इस बारे में सरकार की नीति अभी तक निश्चित नहीं हुई है. उसे समाजवादी व्यवस्था क़ायम करनी भी है और जैसा चलता है, वैसे चलने देना भी है. कृषि के लायक़ भूमि पर सीमा निर्धारित कर दी गई, पर पूंजी की कोई सीमा निश्चित नहीं हुई. कारण?

एक पूंजीपति के पास ज़्यादा ज़मीन होना ज़्यादा पूंजी के मुक़ाबले में ज़्यादा ख़तरनाक क्यों समझा गया? कारण, जमींदार, जागीरदार या राजा-महाराजा गिनती के थे. अत: इनका हक़ हड़प लेने या समाजवादी व्यवस्था को लागू करने के बहाने से आसानी से सारी ज़मीन हस्तगत कर ली गई. अगर पूंजी का राष्ट्रीयकरण हो या सीमा निर्धारित की जाए तो बहुत भारी जनसंख्या पर इसका असर पड़ेगा. प्रधानत: संसद, राज्यसभा के बहुत से सदस्यों पर भी असर पड़े बिना नहीं रहेगा. भारत इतना ज़्यादा ग़रीब देश है कि अगर ज़मीन की ऊपरी सीमा के अनुमान से ही पूंजी की सीमा निर्धारित की जाए तो ऊपरी सीमा लगभग 50 हज़ार रुपये की होगी. फिर क़ानून का यह रूप होगा कि कोई व्यक्ति अपने लिए या अपने परिवार के लिए 50 हज़ार से ज़्यादा न रख सके, बाक़ी पूंजी उसे राष्ट्र को दे देनी होगी. यह एक ऐसा क़दम है, जिसके लिए कठोर से कठोर समाजवादी भी तत्काल तैयार नहीं होगा, क्योंकि जहां तक ज़मीनें हस्तगत करने का सवाल था, इन पूंजीपतियों को व्यक्तिगत क्षति नहीं होती थी. जमींदारी उन्मूलन के अंतर्गत दिए गए मुआवज़े ने पूंजीपतियों की श्रेणी में वृद्धि ही की है. लिहाज़ा ज़मीन के एवज में प्राप्त धन का किराया जमींदारों को और अधिक मिल सकता है, कम से कम ऐसी आशा है. इसीलिए पूंजीपतियों के साथ इन विगत जमींदारों का बल भी पूंजी की सीमा निर्धारण में बाधक है.

जब पूंजी की सीमा निर्धारित करने का प्रश्न आता है तो आधी प्रजा, खासकर शिक्षित वर्ग नाराज़ होकर कहने लगेंगे कि यह तो सोवियत रूस का साम्यवाद है. बड़ा अत्याचार है, ऐसा नहीं होना चाहिए. समान वित्त वितरण में इसीलिए बाधा उत्पन्न हो रही है. मान लें, राष्ट्र ऐसा क़ानून बनाने को तैयार हो भी जाए, तो क्या वह सुचारू रूप से चल सकता है? क्या वह लागू हो सकेगा? क्यों नहीं, जहां हर व्यक्ति को आजकल अपनी संपूर्ण संपत्ति का ब्यौरा देना पड़ता है, हर साल संपत्ति कर के आंकड़े भरकर भेजने पड़ते हैं, वहां कुल संपत्ति की ऊपरी सीमा क़ानून द्वारा आराम से बांधी जा सकती है. हां, प्रत्येक प्रगतिशील अच्छे क़ानून के लागू करने में शुरू-शुरू में जो बाधाएं आती हैं, इसमें भी आएंगी. लोग थोड़ा-बहुत धन चोरी-छिपे रख लेंगे, ऐसी संभावना हो सकती है. लेकिन जब जमा पूंजी एक निर्धारित सीमा से अधिक रखी नहीं जा सकती तो वह धन भी ख़र्च करना होगा. संपत्ति के इस सीमा निर्धारण का अर्थ यह नहीं है कि लोगों के कमाने की शक्ति के बारे में भी कोई लक्ष्मण रेखा खींच दी जाएगी. कमाने और व्यवसाय करने के क्षेत्र तो फिर भी खुले ही रहेंगे. इस सीमाबंदी का नतीजा तो यह होगा कि लोग उस जमा पूंजी को दबाकर मृत धन न होने देंगे. यदि कमाया हुआ धन ख़र्च होता गया, तो वह कई लोगों के हाथ से गुजरेगा और रुपये की इस गति से धन धीरे-धीरे अनेक भागों में बंटकर अनेक लोगों तक पहुंच जाएगा. रही वारिसदार के सौभाग्य और दुर्भाग्य की बात, सो उस बारे में भी चिंता करने की ज़रूरत नहीं. राजस्थानी कहावत के अनुसार, पूत सपूत तो क्यों धन संचे, इन वारिसदारों के लिए भी सही मार्ग निर्धारित हो सकेगा.

जब निर्धारित सीमा से अधिक धन काम में लाया ही नहीं जा सकेगा तो निश्चय ही धन जमा करके गाड़ कर रखने की मनोवृत्ति भी समाप्त हो जाएगी. धन या संपत्ति का सबसे बड़ा दुरुपयोग उसको जमा रखना है. अगर किसी व्यक्ति के पास धन है और वह काम में आता है तो भले ही असमान वित्त वितरण रहे, पर राष्ट्र के लिए वह पूंजी कुछ न कुछ कार्य तो करती रहेगी. एक न एक दिन जब राष्ट्र की इच्छा होगी, उसका राष्ट्रीयकरण हो ही जाएगा. पर जो व्यक्ति सोना-चांदी जवाहरात इकट्ठे करके भूमि में गाड़ कर रखते हैं या अपार धन संपत्ति के खजाने भरकर रखते हैं, वे सही मायने में देश के बड़े शत्रु हैं. क़ानून द्वारा सोना-चांदी, जवाहरात या अन्य बहुमूल्य धातु या चीजें भरकर रखना अपराध घोषित हो जाना चाहिए. भारत में जितनी दरिद्रता है, उसे देखते हुए लोग सोना- चांदी या जवाहरात भरकर रखें, यह अशोभनीय है. निजी संपत्ति का एक अंग यानी ज़मीन की मालिकी धीरे-धीरे या एक झटके के साथ समाप्त की जा रही है या मिट चुकी है. दूसरे अंग यानी पूंजी को मिटाने का एकमात्र प्रयत्न सीधे करों द्वारा ही है, जिनका उपयोग अभी तक सही ढंग से नहीं हो पाया है. पूंजी को भी एक झटके के साथ समान स्तर पर लाया जा सकता है. वैसा करने में शायद बहुत कम लोगों को दर्द हो.

आदमी को सबसे बड़ा दर्द है प्रतिस्पर्धा की वजह से. अगर किसी के पास दोनों वक्त पेट भर खाने को भी न हो और उसे निश्चय ही यह मालूम हो कि दूसरे किसी व्यक्ति के पास भी पेट भर खाने को नहीं है तो वह उतना दु:खी कदापि नहीं होगा, जितना दु:खी एक लखपति अपने पड़ोसी को करोड़पति देखकर होता है. मानव की पशुवृत्ति प्रतिस्पर्धात्मक है, इसलिए वह समदु:खी के साथ राहत अनुभव करता है. जहां उसे उन्नतिशील या समृद्ध व्यक्ति मिले तो अपने को हीन समझ कर वह तत्काल दु:खी हो जाता है. यदि यहां ऐसा नियम बना दिया जाए कि कोई भी व्यक्ति 50 हज़ार से ज़्यादा संपत्ति नहीं रख सकेगा, तो एक लाख वालों को या कम-ज़्यादा वालों को, किसी को भी इतना क्षोभ नहीं होगा, जितना असमान वित्त वितरण से हो रहा है. तात्पर्य यही है कि सब अपना-अपना छोड़ने को तत्पर हो सकते हैं, बशर्ते कि किसी भी दूसरे के पास उनसे ज़्यादा न छोड़ा जाए. इन सब अतिरिक्त करों की अंतिम परिणति समान वित्त वितरण है. यह उद्देश्य जरा भी सफल होता दृष्टिगोचर होता तो वे लोग भी, जिनको कर देने पड़ रहे हैं, संभवत: इतने असंतुष्ट नहीं होते. उनके असंतोष का मूल कारण यही सोच है कि हमसे करों के रूप में भारी रकमें ली जा रही हैं और सीधे या टेढ़े मार्ग से भारी से भारी पूंजी सरकारी नौकरों या कर्मचारियों के यहां इकट्ठी हो रही है और आज के पूंजीपति या उद्योगपति हम हैं, कल हमारी जगह ये होने वाले हैं. इसी ईर्ष्या या द्वेष के वशीभूत होकर भारत का तथाकथित पूंजीवादी यदि समाजवाद का दिल से हिमायती हो, तो भी विरोध ही करेगा. क़ानून ऐसे बने हुए हैं कि बनाने के पूर्व ही उनके उल्लंघन के मार्ग खुले छोड़ दिए जाते हैं. आज भारत में ज़्यादा से ज़्यादा काबिल वही वकील-बैरिस्टर समझा जाता है, जो क़ानून उल्लंघन करने का सरल से सरल मार्ग बता सके. आयकर का भूत इतना भयावह हो गया है कि क्या वकील, क्या डॉक्टर, क्या अन्य आदरणीय पेशे वाले, सभी बिना उचित रिकॉर्ड के अपनी फी के बदले में ब्लैक की रकम नि:संकोच लेना चाहते हैं. अच्छे-अच्छे महानुभाव यह शर्त रख देते हैं. जहां क़ानून के रक्षकों का यह हाल है, वहां देश का उत्थान या प्रगति हो भी तो कैसे? इस सारी कुबुद्धि की जड़ वही असमान वित्त वितरण है. एक बार समान वित्त वितरण संभव हो जाए और समाजवादी अर्थव्यवस्था सही अर्थ में लागू हो जाए तो न रुपये लेने का ही आकर्षण रहेगा, न क़ानून ही भंग होंगे.

महावीर प्रसाद आर मोरारका का जन्म 12 अगस्त, 1919 को नवलगढ़ (झुंझनू) राजस्थान में हुआ था. उद्योगपति, स्वप्नदृष्टा और लेखक से कहीं अधिक वह उदात्त मानवीय मूल्यों के संवाहक थे. उनकी गणना भारत के प्रमुख उद्योगपतियों में की जाती है.

महावीर प्रसाद आर मोरारका

महावीर प्रसाद आर मोरारका का जन्म 12 अगस्त, 1919 को नवलगढ़ (झुंझनू) राजस्थान में हुआ था. उद्योगपति, स्वप्नदृष्टा और लेखक से कहीं अधिक वह उदात्त मानवीय मूल्यों के संवाहक थे. उनकी गणना भारत के प्रमुख उद्योगपतियों में की जाती है.

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महावीर प्रसाद आर मोरारका

महावीर प्रसाद आर मोरारका का जन्म 12 अगस्त, 1919 को नवलगढ़ (झुंझनू) राजस्थान में हुआ था. उद्योगपति, स्वप्नदृष्टा और लेखक से कहीं अधिक वह उदात्त मानवीय मूल्यों के संवाहक थे. उनकी गणना भारत के प्रमुख उद्योगपतियों में की जाती है.