आरक्षण के नाम पर मुसलमानों से धोखा

देश के संविधान में कुछ वर्गों के लिए आरक्षण की व्यवस्था की गई थी, ताकि सामाजिक तौर पर पिछड़े लोगों को बराबरी के अधिकार दिए जा सकें, उन्हें भी अन्य नागरिकों की तरह तरक्की के अवसर मिल सकें, क्योंकि इतिहास गवाह है कि हमारे यहां जाति और धर्म के नाम पर विभिन्न वर्गों और धर्मों के लोगों के साथ अन्याय होता रहा है. आज़ादी के बाद जब देश में लोकतांत्रिक सरकार बनी तो सभी वर्गों को साथ लेकर चलने की बात कही गई. इसके मद्देनज़र दलितों और आदिवासियों के लिए अलग से आरक्षण की व्यवस्था की गई, लेकिन कुछ उन वर्गों की उपेक्षा कर दी गई, जिनके भारतीय होने पर जरा भी संदेह नहीं किया जा सकता. कांग्रेस ने मुसलमानों के बीच में एक ऐसा समूह पैदा कर दिया, जो जानता तो सब है, लेकिन आम मुसलमानों को वही बात बताता है, जिसका आदेश कांग्रेस पार्टी की तऱफ से आता है. मुसलमानों को गुमराह करने और उन्हें पिछड़ा बनाए रखने में इस समूह का बहुत बड़ा हाथ है. हाल में केंद्र की कांग्रेस सरकार ने ओबीसी के लिए पहले से लागू 27 प्रतिशत आरक्षण के अंदर अल्पसंख्यकों को साढ़े चार प्रतिशत आरक्षण देने की घोषणा की और उसे मंत्रिमंडल से म़ंजूर भी करा लिया. इसके बाद पूरे देश में ढिंढोरा पीटा गया कि कांग्रेस ने ओबीसी कोटे के अंदर मुसलमानों को साढ़े चार प्रतिशत आरक्षण की व्यवस्था की है. मुसलमान खुशियां मनाने लगे, मुसलमानों के बड़े-बड़े नेता, पत्रकार एवं विद्वान कांग्रेस का आभार व्यक्त करने लगे. अ़खबारों ने लिखा कि यह आरक्षण मुसलमानों के पिछड़ेपन को दूर करने का प्रयास है. वैसा ही हुआ, जैसा कांग्रेस चाहती थी. वह मुसलमानों को आरक्षण के नाम पर धोखा देने में एक बार फिर कामयाब हो गई.

कांग्रेस मुसलमानों को खुशहाल देखना ही नहीं चाहती. अगर आप सत्ता में आए हैं तो संविधान ने आपको जनहित में कोई भी निर्णय लेने से कभी नहीं रोका है. अगर यूपीए सरकार मुसलमानों के मुहल्ले में स्कूल खोलना चाहे तो क्या कोई उसे ऐसा करने से मना कर देगा? अगर वह सरकारी पैसे का इस्तेमाल बेघर और भूमिहीन लोगों के लिए मकानों का निर्माण कराने में करना चाहती है तो क्या कोई उसे रोक देगा? हरगिज़ नहीं.

आज भी उर्दू अ़खबारों से जुड़े पत्रकारों को पता नहीं है कि यह आरक्षण स़िर्फ मुसलमानों के लिए नहीं, बल्कि देश के सभी अल्पसंख्यकों के लिए है, क्योंकि खबरों में मुसलमानों को साढ़े चार फीसदी आरक्षण जैसे वाक्य प्रकाशित हो रहे हैं. उर्दू पत्रकारिता पर अ़फसोस होता है, क्योंकि कांग्रेस ने एक झूठ बोला और उर्दू पत्रकारों ने उसे फैलाना शुरू कर दिया. यही नहीं, जामिया उर्दू अलीगढ़ में एक समारोह के दौरान न केवल कांग्रेस सरकार के इस फैसलेका स्वागत किया गया, बल्कि मिठाइयां भी बांटी गईं. वास्तविकता यह है कि कांग्रेस सरकार ने मुसलमानों को अलग से कोई आरक्षण नहीं दिया है, बल्कि उनकी प्लेट से कुछ निवाले छीनने का प्रयास किया है. ओबीसी कोटे के तहत देश के सभी पिछड़ों को 27 प्रतिशत आरक्षण पहले से मिल रहा है, लेकिन अब उस कोटे में से अल्पसंख्यकों के लिए केवल साढ़े चार प्रतिशत आरक्षण अलग कर दिया गया है. पहले मुसलमान 27 प्रतिशत के अंदर आरक्षण हासिल करने के लिए अन्य पिछड़ों से मुक़ाबला करता था. अब यह 27 प्रतिशत घटकर साढ़े बाईस प्रतिशत रह गया है. वहीं दूसरी तरफ साढ़े चार प्रतिशत कोटे में मुसलमानों के लिए सिखों, ईसाइयों, बौद्धों और जैनियों से मुक़ाबला करना मुश्किल हो जाएगा, क्योंकि मुसलमान इस स्थिति में नहीं हैं कि वे अन्य अल्पसंख्यकों से मुक़ाबला कर सकें.

दूसरी ओर आरक्षण के कारण अन्य पिछड़ी जातियों में शत्रुता का भाव पैदा होगा. मुलायम सिंह यादव का विरोध भी इसी तऱफ इशारा करता है. कांग्रेस के इस ़फैसले से भाजपा को भी मुसलमानों के खिला़फ दूसरों को भड़काने का मौक़ा मिल गया है. रंगनाथ मिश्र कमीशन और जस्टिस राजेंद्र सच्चर कमेटी की रिपोर्ट आने के बाद देश के मुसलमान यह आस लगा बैठे थे कि शायद अब सरकार उन पर मेहरबान होगी, उनका पिछड़ापन दूर करने का प्रयास करेगी, उनके लिए शिक्षा और रोज़गार की व्यवस्था करेगी, लेकिन केंद्र की कांग्रेस नेतृत्व वाली यूपीए सरकार ने मुसलमानों के पिछड़ेपन का मज़ाक़ उड़ाया है और उन्हें मूर्ख बनाने की कोशिश की है. मुसलमानों की ओर से जितनी नाराज़गी ज़ाहिर की जाए, कम है. कांग्रेस ने ऐसा इसलिए किया है, क्योंकि कुछ ही दिनों में पांच राज्यों में विधानसभा चुनाव होने वाले हैं. पिछले चुनाव के अनुभवों ने यह साबित कर दिया था कि मुसलमानों का वोट जिस पार्टी को मिलेगा, वही सत्ता में आएगी. इसलिए आगामी विधानसभा चुनाव में मुसलमानों के वोट हासिल करने के लिए कांग्रेस ने आरक्षण की चाल चली है.

दरअसल, राजनीतिक पार्टियों ने मुसलमानों को अब तक स़िर्फ वोट बैंक के तौर पर ही इस्तेमाल किया है. इससे ज़्यादा मुसलमानों की इस देश में और कोई हैसियत नहीं है. अगर मुसलमानों से वोट देने का उनका अधिकार छीन लिया जाए तो देश में उनकी हैसियत शून्य के अलावा कुछ नहीं रह जाएगी. जब चुनाव का समय आता है तो सबको मुसलमान याद आने लगते हैं, मदरसों का दौरा शुरू होने लगता है, उलेमा और मिल्ली संगठनों के प्रतिनिधियों से मुलाक़ात करने का सिलसिला शुरू हो जाता है, ताकि पर्दे के पीछे कुछ दे-दिलाकर उन्हें इस्तेमाल करते हुए उनसे अपने पक्ष में बयान दिलाए जा सकें. क्या एक कमरे के अंदर कुछ मुट्ठी भर मुसलमानों को खरीद कर पूरे देश के मुसलमानों की ग़रीबी और बदहाली को दूर किया जा सकता है? हरगिज़ नहीं. इस बार भी ऐसा ही हुआ. मुसलमानों के कुछ जाने-पहचाने चेहरे कांग्रेस द्वारा किए गए एहसानों को महसूस कराने में लगे हुए हैं. वे चाहते हैं कि एक झूठ को सौ बार बोला जाए तो वह सच साबित हो जाएगा, लेकिन उन्हें यह भी सोचना चाहिए कि हम इक्कीसवीं सदी के भारत में जी रहे हैं. आज के मुसलमानों को मूर्ख बनाना उतना आसान नहीं है, जितना पहले हुआ करता था.

दरअसल, कांग्रेस मुसलमानों को खुशहाल देखना ही नहीं चाहती. अगर आप सत्ता में आए हैं तो संविधान ने आपको जनहित में कोई भी निर्णय लेने से कभी नहीं रोका है. अगर यूपीए सरकार मुसलमानों के मुहल्ले में स्कूल खोलना चाहे तो क्या कोई उसे ऐसा करने से मना कर देगा? अगर वह सरकारी पैसे का इस्तेमाल बेघर और भूमिहीन लोगों के लिए मकानों का निर्माण कराने में करना चाहती है तो क्या कोई उसे रोक देगा? हरगिज़ नहीं. अगर वह मुसलमानों के मुहल्ले में नालियों की उचित व्यवस्था करना चाहती है, सड़कें बनवाना चाहती है तो उसके लिए अलग से क़ानून बनाने की क्या ज़रूरत है? संविधान ने धर्म के नाम पर आरक्षण देने के लिए मना किया है, लेकिन पिछड़ेपन के नाम पर आरक्षण देने के लिए हरगिज़ मना नहीं किया. देश के मुसलमान आर्थिक, शैक्षिक और सामाजिक तौर पर पिछड़े हुए हैं. कांग्रेस उन्हें पिछड़ेपन के आधार पर आरक्षण देने की बात क्यों नहीं कर रही है, उसमें अल्पसंख्यक या मुसलमान शब्द क्यों जोड़ा जा रहा है?

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