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लोकपाल के नाम पर धोखाः कहां गया संसद का सेंस ऑफ हाउस

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इस बार दिल्ली की जगह मुंबई में अन्ना का अनशन होगा. जंतर-मंतर और रामलीला मैदान से गिरफ्तारियां दी जाएंगी. इसकी घोषणा टीम अन्ना ने कर दी है. आख़िरकार, वही हुआ, जिसकी आशंका चौथी दुनिया लगातार ज़ाहिर कर रहा था. अगस्त का अनशन ख़त्म होते ही चौथी दुनिया ने बताया था कि देश की जनता के साथ धोखा हुआ है. एक मज़बूत लोकपाल अब नहीं बन पाएगा. टीम अन्ना को तब तो ऐसी आशंका नहीं थी, लेकिन स्टैंडिंग कमेटी की रिपोर्ट आते ही वह भी इसी आशंका से घिर गई. लोकपाल के सरकारी प्रारूप में 60 से भी ज़्यादा संशोधन हुए, इसे कैबिनेट ने पास भी कर दिया और इसी के साथ अन्ना के एक और अनशन की पृष्ठभूमि भी सरकार ने तैयार कर दी. इसी के साथ एक और बड़ी भूल सरकार कर रही है. वह टीम अन्ना के आंदोलन को महज़ लोकपाल से जुड़ा आंदोलन समझने की ग़लती कर रही है, जबकि ऐसा नहीं है. जंतर-मंतर, रामलीला मैदान, आज़ाद मैदान या देश भर में प्रभातफेरी, रैली या प्रदर्शन करते युवा, प्रौढ़ या वृद्ध स़िर्फ एक जन लोकपाल के लिए सड़कों पर नहीं उतरते. वे इस उम्मीद में अन्ना के साथ हैं, क्योंकि उन्हें लगता है कि जन लोकपाल पास होगा तो उनकी सारी समस्याएं दूर नहीं तो कम ज़रूर हो जाएंगी. युवाओं को उम्मीद है कि उन्हें नौकरी या एडमीशन के लिए रिश्वत या पैरवी का सहारा नहीं लेना पड़ेगा. व्यापारी या नौकरीपेशा लोग सरकारी कार्यालयों में व्याप्त रिश्वतखोरी से राहत की उम्मीद लगाए हुए हैं. वृद्ध या प्रौढ़ आने वाली पीढ़ियों को एक बेहतर भविष्य देने के लिए जन लोकपाल की मांग कर रहे हैं. दरअसल, भ्रष्टाचार जैसी समस्या से आज देश के हर तबके, हर जाति, हर धर्म के लोग पीड़ित हैं.

रामलीला मैदान के अनशन के बाद जब संसद ने सेंस ऑफ हाउस पास किया, तब एक सशक्त लोकपाल की उम्मीद बंधी थी. सेंस ऑफ हाउस पास तो हुआ, लेकिन टीम अन्ना सहित इस देश की जनता यह नहीं समझ पाई कि इस सेंस ऑफ हाउस की वैधानिकता क्या है, क्या इसे स्थायी समिति हूबहू मान लेगी और क्या यह बाध्यकारी निर्णय होगा? ज़ाहिर है, ऐसा कुछ नहीं हुआ. सरकार ख़ुद अपने सेंस को नहीं समझ पाई, जनता के मूड को नहीं समझ पाई.

सरकार जनता की इस आस को, उम्मीद को लगातर कुचलने का काम कर रही है. पहले जंतर-मंतर, फिर रामलीला मैदान. हर जगह उसने टीम अन्ना और देश की जनता को छलने का काम किया. बीते 27 अगस्त को संसद में पास सेंस ऑफ हाउस को भी स्टैंडिंग कमेटी ने दरकिनार करते हुए वही किया, जो सरकार करना चाहती थी. लोकपाल के दायरे से सीबीआई को बाहर कर दिया, ग्रुप सी के कर्मचारियों को लोकपाल की जगह सीवीसी के अधीन कर दिया. जांच के बाद सीवीसी लोकपाल को रिपोर्ट करेगा. वहीं जन शिकायतों और उच्च न्यायपालिका के मामले में अलग से बिल पेश कर दिया गया यानी अब लोकपाल के दायरे में न सीबीआई, न सिटीज़न चार्टर और न ग्रुप सी एवं डी के कर्मचारी होंगे. हां, प्रधानमंत्री को कुछ शर्तों के साथ लोकपाल के दायरे में ज़रूर रखा गया है, लेकिन जो शर्तें लगाई गई हैं, उनकी वजह से प्रधानमंत्री का इसके दायरे में होना या न होना बराबर है. मसलन, अंतरराष्ट्रीय संबंधों, परमाणु ऊर्जा, अंतरिक्ष, आंतरिक एवं बाह्य सुरक्षा और सार्वजनिक व्यवस्था से जुड़े मामलों को छोड़कर ही प्रधानमंत्री को लोकपाल के दायरे में लाया गया है. इसके अलावा प्रधानमंत्री के ख़िला़फ किसी शिकायत को तभी शिकायत माना जाएगा और जांच तभी होगी, जब इसके लिए लोकपाल सहित इस संस्था के ज़्यादातर सदस्यों की सहमति हो.

लोकपाल के दायरे से सीबीआई को बाहर कर दिया, ग्रुप सी के कर्मचारियों को लोकपाल की जगह सीवीसी के अधीन कर दिया. जांच के बाद सीवीसी लोकपाल को रिपोर्ट करेगा. वहीं जन शिकायतों और उच्च न्यायपालिका के मामले में अलग से बिल पेश कर दिया गया यानी अब लोकपाल के दायरे में न सीबीआई, न सिटीज़न चार्टर और न ग्रुप सी एवं डी के कर्मचारी होंगे.

बहरहाल, जहां पिछले 40 सालों में लोकपाल विधेयक को क़ानून बनाने के लिए ज़रूरी राजनीतिक इच्छाशक्ति का अभाव था, वहीं जब यह क़ानून बनने जा रहा है, तब भी ऐसा लग रहा है कि सरकार भ्रष्टाचार उन्मूलन को लेकर संजीदा नहीं है. जल्दबाज़ी में कहें या किसी दबाव में, लोकपाल जैसी महत्वपूर्ण संस्था का हश्र भी सीबीआई और सीवीसी जैसा हो जाएगा, इसमें शक की कोई गुंजाइश नहीं है. व्यवस्था की खामियों का फायदा उठाकर जिस तरह जनता की संपत्ति को अब तक लूटा गया, क्या सरकारी लोकपाल उसे रोक पाएगा, क्योंकि पहले भी सीबीआई, सीवीसी, विजिलेंस जैसे भ्रष्टाचाररोधी विभाग तो थे ही. अब एक और संस्था यानी लोकपाल का नाम इस सूची में जुड़ जाएगा. दरअसल, भ्रष्टाचार का कैंसर इतना फैल चुका है कि उसे मौजूदा सरकारी लोकपाल बिल के सहारे ख़त्म नहीं किया जा सकता. एक उम्मीद थी कि स्वतंत्र लोकपाल के तहत सीबीआई एवं सीवीसी जैसी संस्थाएं होंगी तो लोकपाल निष्पक्ष, स्वतंत्र और सक्षम रूप से जांच कर पाएगा, जनता की शिकायतों का निवारण हो सकेगा, रिश्वतखोरी पर अंकुश लगाया जा सकेगा, लेकिन प्रत्यक्ष-अप्रत्यक्ष रूप से सरकारी नियंत्रण में रहते हुए जो हाल सीबीआई या सीवीसी का हुआ, वही सरकार के इस लोकपाल का भी होगा, इस आशंका से इंकार नहीं किया जा सकता. अब सवाल उठता है कि जन लोकपाल के लिए सड़कों पर उतरी जनता क्या करेगी, भ्रष्टाचार के ख़िला़फ आंदोलन छेड़ चुकी जनता के पास क्या विकल्प बचेगा?

जन लोकपाल क्‍यों खास हैः

जांच या मुक़दमा

  • वर्तमान व्यवस्था: तमाम सबूतों के बाद भी कोई नेता या बड़ा अफसर जेल नहीं जाता. एंटी करप्शन ब्रांच और सीबीआई सीधे सरकारों के अधीन आती है. जांच या मुक़दमा शुरू करने के लिए इजाज़त लेनी पड़ती है.
  • जन लोकपाल पास हो तब: प्रस्तावित क़ानून के बाद केंद्र में लोकपाल और राज्य में लोकायुक्त सरकार के अधीन नहीं होंगे. एसीबी और सीबीआई को इसके अधीन लाया जाएगा. भ्रष्टाचार के मामलों की जांच और मुक़दमे के लिए इन्हें सरकार से इजाज़त की ज़रूरत नहीं पड़ेगी. जांच जल्द पूरी होगी.

सीवीसी

  • वर्तमान व्यवस्था: तमाम सबूतों के बावजूद भ्रष्ट अधिकारी सरकारी नौकरी पर बने रहते हैं. केंद्रीय सतर्कता आयोग केवल केंद्र सरकार को सलाह दे सकता है, जिसे अमूमन माना नहीं जाता.
  • जन लोकपाल पास हो तब: प्रस्तावित लोकपाल और लोकायुक्तों के पास शक्ति होगी कि वे भ्रष्ट लोगों को उनके पद से हटा सकें. केंद्रीय सतर्कता आयोग और राज्यों के विजिलेंस विभागों को लोकपाल के तहत लाया जाएगा.

व्हिसल ब्लोअर

  • वर्तमान व्यवस्था: अगर आम आदमी भ्रष्टाचार उजागर करता है तो उसकी शिकायत कोई नहीं सुनता, उसे प्रताड़ित किया जाता है, धमकी दी जाती है.
  • जन लोकपाल पास हो तब: लोकपाल और लोकायुक्त किसी की शिकायत को खुली सुनवाई किए बिना खारिज़ नहीं कर सकेंगे. आयोग भ्रष्टाचार के ख़िला़फ आवाज़ उठाने वाले लोगों की सुरक्षा भी सुनिश्चित करेंगे.

पारदर्शिता

  • वर्तमान व्यवस्था: सीबीआई और विजिलेंस विभागों का कामकाज गोपनीय होता है. नतीजतन भ्रष्टाचार होना लाज़िमी है.
  • जन लोकपाल पास हो तब: लोकपाल और लोकायुक्तों का कामकाज पारदर्शी होगा. जांच के बाद सारे रिकॉर्ड जनता के लिए उपलब्ध रहेंगे. ख़ुद के कर्मचारी के ख़िला़फ भी शिकायत आने पर उसकी जांच करने और उस पर ज़ुर्माना लगाने का काम अधिकतम दो महीने में पूरा करना होगा.

नियुक्ति

  • वर्तमान व्यवस्था: कमज़ोर, भ्रष्ट और राजनीति से प्रभावित लोग एंटी करप्शन विभागों के मुखिया बनते हैं.
  • जन लोकपाल पास हो तब: लोकपाल और लोकायुक्तों की नियुक्ति में नेताओं की भूमिका कम से कम होगी. इनकी नियुक्ति पारदर्शी तरीक़े और जनता की भागीदारी से होगी.

जन शिकायत

  • वर्तमान व्यवस्था: सरकारी दफ्तरों में लोगों से रिश्वत मांगी जाती है. लोग ज़्यादा से ज़्यादा वरिष्ठ अधिकारियों से शिकायत कर सकते हैं, लेकिन वे भी कुछ नहीं करते, क्योंकि वे भी इसमें शामिल होते हैं.
  • जन लोकपाल पास हो तब: लोकपाल और लोकायुक्त किसी व्यक्ति का तय समय सीमा में किसी भी विभाग में काम न होने पर दोषी अधिकारियों पर 250 रुपये प्रतिदिन के हिसाब से ज़ुर्माना लगा सकेंगे, जो शिकायतकर्ता को मुआवज़े के रूप में मिलेगा.

संपत्ति वसूली

  • वर्तमान व्यवस्था: भ्रष्ट व्यक्ति के पकड़े जाने पर भी उससे रिश्वतखोरी से कमाया गया पैसा वापस लेने का कोई प्रावधान नहीं है.
  • जन लोकपाल पास हो तब: भ्रष्टाचार से सरकार को हुई हानि का आकलन कर दोषियों से उसकी वसूली की जाएगी.

सज़ा

  • वर्तमान व्यवस्था: भ्रष्टाचार के मामले में 6 महीने से लेकर अधिकतम 7 साल तक कारावास का प्रावधान है.
  • जन लोकपाल पास हो तब: कम से कम 5 साल से लेकर आजीवन कारावास तक की सज़ा.

ऐसा नहीं हुआ

मुद्दा जन लोकपाल सरकारी लोकपाल
प्रधानमंत्री बिना शर्त दायरे में सशर्त दायरे में
सरकारी कर्मचारी ग्रुप ए से डी तक स़िर्फ ग्रुप ए, बी ग्रुप सी, डी सीवीसी के दायरे में
संसद में सांसदों का आचरण लोकपाल जांच के दायरे में लोकपाल जांच से छूट
सीबीआई लोकपाल के अधीन लोकपाल के दायरे से बाहर
उच्च न्यायपालिका लोकपाल के दायरे में नहीं, अलग क़ानून
सिटीज़न चार्टर लोकपाल के तहत नहीं, अलग क़ानून
व्हिसल ब्लोअर लोकपाल के तहत नहीं, अलग क़ानून
लोकपाल की नियुक्ति नेताओं की भूमिका कम नेताओं की भूमिका ज़्यादा
बर्खास्तगी कोई भी कर सकता है शिकायत सौ से ज़्यादा सांसदों की शिकायत पर महाभियोग

संवैधानिक दर्जा का क्‍या फायदा ?

कुछ समय पहले ही सीवीसी पी जे थॉमस की नियुक्ति को याद कीजिए या फिर इस देश की संवैधानिक संस्थाओं की हालत पर ग़ौर कीजिए. चुनाव आयोग या कैग का कार्यालय. 2-जी मामले में कैग की रिपोर्ट को ही सरकार में शामिल सारे मंत्री झूठी साबित करने पर आमादा थे या फिर याद कीजिए कि आचार संहिता के उल्लंघन के मामले में कब किस राजनीतिक दल की मान्यता चुनाव आयोग ने ख़त्म की. जबकि हर चुनाव के दौरान लगभग सैकड़ों उम्मीदवारों को चुनाव आयोग नोटिस जारी करता है. अब सरकार लोकपाल संस्था को संवैधानिक दर्जा देने की बात कह रही है, लेकिन सवाल है कि पहले से मौजूद संवैधानिक संस्थाओं का जो हाल है, उसमें यह नई संस्था कैसे और कितनी कारगर साबित होगी. जिस तरह इस संस्था का गठन होगा और लोकपाल या अन्य सदस्यों की नियुक्ति होगी, उससे यह संस्था कितनी मज़बूत बन पाएगी? इस संस्था के सदस्यों के चयन में प्रधानमंत्री, लोकसभा अध्यक्ष, लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष, सुप्रीम कोर्ट के चीफ जस्टिस या उनकी ओर से नामित सुप्रीम कोर्ट के जजों की चार सदस्यीय समिति की भूमिका होगी यानी लोकपाल या उसके सदस्यों को नियुक्त करने में सबसे ज़्यादा राजनेताओं की भूमिका होगी. ऊपर से 50 फीसदी आरक्षण का भी प्रावधान है.

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