कांग्रेस-भाजपा का कम्युनल कार्ड

उमा भारती कहती हैं कि मुस्लिम आरक्षण इस देश के बंटवारे का रास्ता तय करेगा. मुस्लिम आरक्षण की बात करके कांग्रेस वोट बैंक की राजनीति कर रही है. ऐसा करके कांग्रेस ने संविधान, क़ानून एवं मर्यादा का उल्लंघन किया है. मुस्लिम आरक्षण इस्लाम के बुनियादी उसूलों के ख़िलाफ़ है, क्योंकि मुस्लिम समाज में जाति प्रथा नहीं है. जाति प्रथा तो हिंदू समाज में है. अब सवाल यह है कि उमा भारती के इस बयान का मतलब क्या है? मतलब बहुत साफ है. अब उत्तर प्रदेश चुनाव को सांप्रदायिकता के हवाले कर दिया गया है. कांग्रेस और भाजपा, दोनों ने अपना-अपना कम्युनल कार्ड खेल दिया है. जो कांग्रेस आरक्षण की बात करके अपनी पीठ थपथपा रही है, वह दरअसल चाहती ही नहीं है कि इस मुल्क के मुसलमानों का भला हो.

बार-बार साढ़े चार फ़ीसदी अल्पसंख्यक आरक्षण को मुस्लिम आरक्षण का नाम देकर उसने अपना कम्युनल कार्ड खेला, वहीं इस वजह से भाजपा को भी अपना कम्युनल कार्ड खेलने का मौक़ा दे दिया. अब उत्तर प्रदेश चुनाव में भाजपा जमकर मुसलमानों पर हमला बोलेगी. वह इस बहाने मंदिर, गौ हत्या, रामराज, समान नागरिक संहिता और धारा 370 का अपना पुराना राग भी अलापेगी. अब सांप्रदायिक ध्रुवीकरण के ज़रिए नफ़रत फैलाने का काम होगा. ज़ाहिर है, इस सबके लिए कांग्रेस भी बराबर की ज़िम्मेदार होगी.

इस मुल्क के मुसलमानों के लिए यह वक़्त अब जागने का है. अब दिल नहीं, दिमाग़ से काम करने का वक़्त आ गया है. उन्हें इस सच को स्वीकारना होगा कि वह जमाना गया, जब आस्तीनों में सांप पलते थे. अब ये सांप दोस्त बनकर साथ-साथ चल रहे हैं. उन्हें रहज़नों से तो ख़तरा था ही, अब रहबरों से भी ख़तरा है. आख़िर कौन है उनके दुश्मन और क्या है ख़तरा?

महज़ साढ़े चार फ़ीसदी अल्पसंख्यक आरक्षण के नाम पर उसने एक ऐसा खेल शुरू किया है, जिसका परिणाम भयानक हो सकता है. कांग्रेस को मुसलमानों की वाक़ई फ़िक्र होती तो वह रंगनाथ कमीशन और सच्चर कमेटी की सिफ़ारिशों को ईमानदारी से लागू करती, लेकिन उसने ऐसा नहीं किया. उसने साढ़े चार फीसदी आरक्षण यह कहकर लागू किया कि वह ऐसा रंगनाथ कमीशन की स़िफारिश के आधार पर कर रही है. जबकि यह सरासर झूठ है. रंगनाथ कमीशन ने साढ़े चार नहीं, 15 फीसदी या साढ़े 8 फीसदी आरक्षण की सिफारिश की थी. इसके अलावा कमीशन ने मुसलमानों की भलाई के लिए और भी बहुत सारे उपाय बताए थे, जिनमें से शायद ही किसी स़िफारिश पर अमल किया गया हो. उल्टे भाजपा को ऩफरत फैलाने का एक मौक़ा दे दिया गया. तभी तो उमा भारती, जिन्होंने शायद ही सच्चर कमेटी एवं रंगनाथ कमीशन की स़िफारिशों या संविधान को ईमानदारी से पढ़ा होगा, अल्पसंख्यक आरक्षण को मुल्क के लिए ख़तरा बता रही हैं. उमा भारती को चाहिए था कि वह अपनी पार्टी के अंदर के मुस्लिम साथियों से पूछतीं कि मुस्लिम समाज के धोबी, रंगरेज़, धुनिया, सैफ़ी, अंसारी, नाई एवं मोची की सामाजिक, आर्थिक और शैक्षणिक हालत क्या है. अगर उमा भारती ने इस सवाल का जवाब जानने की कोशिश की होती तो शायद ऐसा कुछ बोलने से पहले वह दस बार सोचतीं.

सबसे आश्चर्य की बात तो यह है कि इस पूरे मसले पर मुलायम सिंह एवं मायावती ख़ामोश हैं. मुस्लिम आरक्षण के मसले पर जहां कांग्रेस और भाजपा के बीच तलवारें खिंच गई हैं, वहीं बसपा और सपा ख़ामोश हैं. मुसलमानों को आरक्षण दिए जाने का वायदा उत्तर प्रदेश में सबसे पहले मायावती ने ही किया था और रैलियों में वह दावा कर रही थीं कि उन्होंने प्रधानमंत्री को पत्र लिखकर मुसलमानों को आरक्षण देने की सिफ़ारिश की है, लेकिन अब वह इस मुद्दे पर कुछ बोलने को तैयार नहीं हैं. दूसरी तरफ़ समाजवादी पार्टी प्रमुख मुलायम सिंह यादव हैं, जो तेज़ी से अपनी तरफ़ आने वाले मुसलमानों को देखकर इस मुद्दे को छेड़ना नहीं चाहते. उन्हें डर है कि उनका कोई बयान मुसलमानों को नाराज़ न कर दे और वे उनसे दूर हो जाएं, लेकिन यह बात भी सही है कि ओबीसी कोटे के अंदर अल्पसंख्यकों के लिए साढ़े चार फ़ीसदी कोटे के ऐलान से मुलायम सिंह ख़ुश नहीं थे, क्योंकि ओबीसी कोटे के अंदर उनकी अपनी यादव बिरादरी भी आती है. फिर भी मुसलमानों को ख़ुश करने के लिए मुलायम सिंह और आज़म ख़ां उत्तर प्रदेश में सत्ता मिलने पर उन्हें 18 फ़ीसदी आरक्षण देने की बात कर रहे हैं, लेकिन सलमान ख़ुर्शीद ने जब आरक्षण को बढ़ाकर 9 फीसदी करने की बात कही और उस पर बावेला मच गया, तब भी मुलायम सिंह ख़ामोश रहे. यह बात वाक़ई हैरान करती है. उत्तर प्रदेश का मुसलमान इस मसले पर उनकी राय जानना चाहता है, लेकिन वह ख़ामोश हैं. आख़िर क्यों, उनकी इस ख़ामोशी का मतलब क्या है?

सोचते नहीं, स़िर्फ बोलते हैं

कांग्रेस के दिग्विजय सिंह और भारतीय जनता पार्टी की उमा भारती उत्तर प्रदेश के चुनाव में आमने-सामने हैं. दिग्विजय सिंह और उमा भारती के बीच ज़ुबानी जंग जारी है. दोनों के बयानों से चुनाव में सांप्रदायिकता को हवा मिल रही है. उमा भारती मुस्लिम आरक्षण का विरोध करती हैं तो दिग्विजय सिंह बटला हाउस का मामला उठा रहे हैं. दोनों ऐसे-ऐसे मुद्दे उठा रहे हैं, जिनसे हिंदू-मुस्लिम भाईचारे को चोट पहुंचती है. सवाल यह है कि दिग्विजय सिंह बाटला हाउस का मामला उठाकर क्या साबित करना चाहते हैं. केंद्र में कांग्रेस की सरकार है, कांग्रेस का गृहमंत्री है और उनकी ही पुलिस है, फिर बाटला हाउस मामले के लिए वह किस पर उंगलियां उठा रहे हैं, किसे मुजरिम साबित करना चाहते हैं? दरअसल वह वोट पाने के लिए यह साबित करना चाहते हैं कि कांग्रेस मुसलमानों की हमदर्द है. यही वजह है कि वह आरएसएस, भाजपा या दूसरे विवादास्पद मसलों पर बयान देते हैं. उनसे निपटने का काम भाजपा ने उमा भारती को सौंप दिया है. पार्टी में वापस होते ही उमा भारती ने दिग्विजय सिंह को राहुल गांधी की स्टेपनी बता डाला, आरएसएस के मसले पर दिग्विजय सिंह को यह नसीहत दे डाली कि उन्हें पंडित नेहरू का वह पत्र पढ़ना चाहिए, जिसमें उन्होंने आरएसएस से कश्मीर बचाने की अपील की थी. बहरहाल, इस ज़ुबानी जंग का कुछ नतीजा निकले या न निकले, लेकिन उत्तर प्रदेश चुनाव में सांप्रदायिक तनाव ज़रूर बढ़ रहा है.

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