सहकारी बैंक और वित्तीय समावेशन

संयुक्त राष्ट्र संघ ने 2012 को अंतरराष्ट्रीय सहकारिता वर्ष घोषित किया है. यह भारत के लिए बहुत महत्वपूर्ण है, क्योंकि भारत का सहकारिता के क्षेत्र में बहुत अहम योगदान रहा है. इसने कृषि एवं ग्रामीण विकास के लिए जिस तरह से सहकारी बैंकों का उपयोग किया है, वह सरहानीय है. इसने न केवल सैद्धांतिक तौर पर सहकारी बैंकों की भूमिका को माना है, बल्कि इसे लागू करने के लिए भी महत्वपूर्ण क़दम उठाया है. देश में विस्तृत रूप से वित्तीय समावेशन को लागू करने के लिए भारत सरकार और भारतीय रिजर्व बैंक ने इसके लिए कुछ रणनीति बनाई हैं. भारत सरकार ने सुदूर क्षेत्र में अवस्थित गांवों तक वित्तीय सेवा उपलब्ध कराने के लिए आरबीआई को अपने साथ शामिल किया है. दोनों ने मिलकर अनुसूचित वाणिज्यिक बैंक और क्षेत्रीय ग्रामीण बैंकों में कई सुधार करने की नीति बनाई है. भारतीय रिजर्व बैंक और भारत सरकार इनकी निगरानी करेगी, ताकि इसका फायदा ग़रीब लोगों तक पहुंच सके. बीसी-आईसीटी-सीबीएस (बिजनेस कॉरस्पांडेंट-इंफोर्मेशन एंड कम्युनिकेशन टेक्नोलॉजी-कोर बैंकिंग) द्वारा इस सेवा का विस्तार उन क्षेत्रों तक किया जाएगा, जहां अभी तक वित्तीय सेवा की पहुंच नहीं हो पाई है. यह नहीं कहा जा सकता है कि इस विचार से ग्रामीण क्षेत्र में वित्तीय सेवा उपलब्ध कराने संबंधी सारी समस्याएं समाप्त हो जाएंगी, लेकिन यह एक बेहतर विकल्प ज़रूर उपलब्ध कराएगा. सरकार की वित्तीय समावेशन की अवधारणा के मार्ग को प्रशस्त करने में इस विचार की एक अहम भूमिका हो सकती है. हालांकि कुछ कारणों से भारत में सहकारी बैंकों का विकास उम्मीद से कम हुआ है, लेकिन यह कहा जा सकता है कि अगर इसका विकास सही तरीक़े से किया जाए तो यह वाणिज्यिक बैंकों की सहयोगी की भूमिका निभा सकता है. इससे इन वाणिज्यिक बैंकों का बोझ भी कम हो जाएगा.

वित्तीय क्षेत्र के आंकलन के लिए बनाई गई समिति जिसके अध्यक्ष राकेश मोहन तथा उपाध्यक्ष अशोक चावला थे, ने अपनी अनुशंसा में कहा था कि जो भी सहकारी बैंक मार्च 2012 तक लाइसेंस नहीं ले पाए हैं, को आगे काम करने की अनुमति नहीं दी जानी चाहिए. साथ ही अप्रैल 2009 में भी यह कहा गया था कि जिन केंद्रीय और राज्य सहकारी बैंकों को लाइसेंस नहीं मिला है, उन्हें लाइसेंस देने के लिए एक रोडमैप तैयार किया जाए. इन निर्देशों के आधार पर नाबार्ड के साथ संपर्क कर सहकारी बैंकों को लाइसेंस देने के लिए कुछ दिशा निर्देश तय किए गए.

भारत सरकार को अगर वित्तीय समावेशन के एजेंडे को सफल बनाना है तो ग्रामीण सहकारी ऋण संरचना को और बेहतर करना होगा. लोगों तक इनकी पहुंच बढ़ानी होगी. वाणिज्यिक बैंक और क्षेत्रीय ग्रामीण बैंक जिनकी ग्रामीण क्षेत्रों की शाखाएं 33000 हैं, से इनकी तुलना की जाए तो सहकारी बैंकों का फैलाव इन क्षेत्रों में का़फी अधिक है. भारत में 33 राज्य सहकारी बैंकों की 953 शाखाएं हैं, 371 ज़िला सहकारी बैंकों की 12858 शाखाएं हैं. इसके अलावा हमारे देश में 109000 प्राथमिक कृषि ऋण समितियां (पीएसीएस) भी हैं, अर्थात भारत में ग्रामीण स्तर पर काम करने वाली सहकारी ऋण समितियों की संख्या 122590 है. इसकी संख्या की अधिकता के कारण इसका संचालन एक कठिन काम रहा है. सरकार के सामने इसका सफल संचालन करना एक बड़ी चुनौती रही है. इसकी भूमिका को बढ़ाने के लिए आरबीआई ने कई क़दम उठाए हैं. आरबीआई ने न केवल पीएसीएस को वाणिज्यिक बैंकों के व्यापारिक अभिकर्ता के रूप में काम करने की अनुमति दी है, बल्कि किसानों को ऋण उपलब्ध कराने के लिए वाणिज्यिक बैंक और किसानों की बीच की कड़ी की भूमिका निभाने के लिए भी अनुमति दी है. पीएसीएस के अलावा किसान सेवा समिति (एफएसएस) तथा लार्ज साइज मल्टीपर्पस सोसायटी (एलएएमपीएस) को भी परोक्ष रूप से किसानों तथा आदिवासियों को ऋण देने की स्वीकृति मिल चुकी है. वाणिज्यिक बैंक तथा क्षेत्रीय ग्रामीण बैंक 2013 तक 350000 गांवों में वित्तीय सेवा उपलब्ध कराएंगे. वित्तीय समावेशन के उद्देश्य को पूरा करने के लिए सरकार तथा आरबीआई सहकारी ऋण सेवा की भूमिका बढ़ाना चाहती है. इसके लिए बहुत समय से उपेक्षित अल्पावधि सहकारी ऋण संरचना का पुनरुद्धार करना चाहती है. इसके लिए आरबीआई ने विद्यानाथ समिति का गठन किया है. इस समिति की अनुशंसा को लागू करने का प्रयास भी आरबीआई कर रही है. विद्यानाथ समिति की अनुशंसा के आधार पर भारत सरकार ने राज्यों के मुख्यमंत्रियों, वित्त मंत्रियों तथा सहकारिता मंत्रियों के साथ मुलाक़ात की. इस मुलाक़ात के बाद भारत सरकार ने संकटग्रस्त अल्पावधि सहकारी ऋण संरचना को मज़बूत करने के लिए पहले से घोषित वित्तीय सहायता में बढ़ोत्तरी कर दी है. पूर्व में इसके लिए 136 बिलियन रुपये की घोषणा की गई थी, जिसे बढ़ाकर 193 बिलियन रुपये कर दिया गया है. लेकिन इस धन के उपयोग के लिए कुछ शर्तें भी रखी गई हैं. इसके अनुसार अब नियामक अधिकार आरबीआई के पास होगा तथा राज्य सरकार की हिस्सेदारी घटाकर 25 प्रतिशत तक सीमित कर दी जाएगी. इससे बोर्ड के निरीक्षण में राज्य सरकार की भूमिका नहीं होगी. वित्तीय तथा आंतरिक प्रशासन में भी राज्य सरकार का हस्तक्षेप कम हो जाएगा. पीएसीएस, डीसीसीबी (ज़िला केंद्रीय सहकारी बैंक), एससीबी (राज्य सहकारी बैंक) का ऑडिट चार्टर अकांउटेंट द्वारा कराया जाएगा. मुख्य कार्यकारी अधिकारी (सीइओ) की नियुक्तियों में आरबीआई की भूमिका होगी. इसके अलावा ट्रेनिंग अकाउंट सिस्टम (सीएएस) मैनेजमेंट इंफोर्मेशन सिस्टम (एमआईएस) में सुधार किया जाएगा. साथ ही राज्य सहकारी समिति अधिनियम में भी संशोधन किया जाएगा.

यह एक बहुत महत्वपूर्ण बात है कि भारत के 25 राज्यों ने सहकारी समितियों के पुनरुद्धार के लिए दिए जाने वाले पैकेज को लागू करने वाले क़रार पर हस्ताक्षर किया है. एमओयू (मेमोरेंडम ऑफ अंडरस्टैंडिंग) पर हस्ताक्षर करने वाले राज्यों में आंध्र प्रदेश, अरुणाचल प्रदेश, असम, बिहार, छत्तीसगढ़, गुजरात, हरियाणा, जम्मू-कश्मीर, झारखंड, कर्नाटक, मध्य प्रदेश, महाराष्ट्र, मणिपुर, मेघालय, मिजोरम, नागालैंड, ओडिसा, पंजाब, राजस्थान, सिक्किम, तमिलनाडु, त्रिपुरा, उत्तराखंड, उत्तर प्रदेश और पश्चिम बंगाल शामिल हैं.

यह एक बहुत महत्वपूर्ण बात है कि भारत के 25 राज्यों ने सहकारी समितियों के पुनरुद्धार के लिए दिए जाने वाले पैकेज को लागू करने वाले क़रार पर हस्ताक्षर किया है. एमओयू (मेमोरेंडम ऑफ अंडरस्टैंडिंग) पर हस्ताक्षर करने वाले राज्यों में आंध्र प्रदेश, अरुणाचल प्रदेश, असम, बिहार, छत्तीसगढ़, गुजरात, हरियाणा, जम्मू-कश्मीर, झारखंड, कर्नाटक, मध्य प्रदेश, महाराष्ट्र, मणिपुर, मेघालय, मिजोरम, नागालैंड, ओडिसा, पंजाब, राजस्थान, सिक्किम, तमिलनाडु, त्रिपुरा, उत्तराखंड, उत्तर प्रदेश और पश्चिम बंगाल शामिल हैं. ये राज्य पूरे देश के एसटीसीसीएस (अल्पावधि सहकारी ऋण संरचना) के अंतर्गत आने वाली सहकारी समितियों का 96 फीसदी हिस्सा कवर करते हैं. इन राज्यों की सहकारी समितियों को वित्तीय सहायता तभी दी जाएगी, जब ये लोग क़ानूनी और संस्थागत सुधार को लागू करेंगे. 31 अक्टूबर, 2011 तक नाबार्ड ने सात राज्यों में पीएसीएस के पुनः पंजीकरण के लिए भारत सरकार की ओर से 90 बिलियन रुपये दिए हैं, जिसमें 8.5 बिलियन रुपये राज्य सरकार द्वारा दिए गए हैं. यह बहुत ही उत्साहवर्द्धक बात है कि 21 राज्यों ने अपने राज्य सहकारी समिति अधिनियम में संशोधन कर दिया है. संशोधन करने वाले राज्य आंध्र प्रदेश, अरुणाचल प्रदेश, बिहार, गुजरात, हरियाणा, कर्नाटक, जम्मू-कश्मीर, झारखंड, मध्य प्रदेश, महाराष्ट्र, मणिपुर, मिजोरम, मेघालय, नागालैंड, ओडिसा, राजस्थान, सिक्किम, तमिलनाडु, त्रिपुरा, उत्तर प्रदेश और पश्चिम बंगाल हैं. इस प्रकार से ग्रामीण सहकारी ऋण संरचना के प्रबंधन एवं संचालन में किए गए सुधारों का असर ज़रूर होगा तथा इसका लाभ गांवों में रह रहे ग़रीब लोगों तक पहुंचेगा. सरकार के वित्तीय समावेशन के लक्ष्य को पूरा करने में इसकी अहम भूमिका होगी.

नए सुधारों के तहत रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया सहकारी ऋण संस्थाओं पर नियंत्रण रखेगी तथा नाबार्ड इनका निरीक्षण करेगा. इस तरह आरबीआई इन सरकारी संस्थाओं को सुझाव देगी तथा इन सुझावों के अनुसार काम हो रहा है कि नहीं, इसे देखने की ज़िम्मेदारी नाबार्ड की होगी. पहले कई संस्थाएं इन्हें निर्देश देती थीं, जिससे सुचारु रूप से कार्य करने में का़फी कठिनाई होती थी. अब आरबीआई और नाबार्ड ही इसके लिए ज़िम्मेदार होंगे. इस तरह से सहकारी संस्थाओं का त़ेजी से विकास होगा और इसका परिणाम लोगों के सामने जल्द से जल्द आ जाएगा. इसके अलावा एक महत्वपूर्ण बात यह भी है कि जिन राज्य सहकारी बैंकों को पुनःपंजीकरण के लिए पुनरुद्धार पैकेज की आवश्यकता नहीं है, उन्हें भी अपने बैंक की शाखाएं खोलने के लिए कुछ शर्तों का पालन करना होगा. वित्तीय क्षेत्र के आंकलन के लिए बनाई गई समिति जिसके अध्यक्ष राकेश मोहन तथा उपाध्यक्ष अशोक चावला थे, ने अपनी अनुशंसा में कहा था कि जो भी सहकारी बैंक मार्च 2012 तक लाइसेंस नहीं ले पाए हैं, को आगे काम करने की अनुमति नहीं दी जानी चाहिए. साथ ही अप्रैल 2009 में भी यह कहा गया था कि जिन केंद्रीय और राज्य सहकारी बैंकों को लाइसेंस नहीं मिला है, उन्हें लाइसेंस देने के लिए एक रोडमैप तैयार किया जाए. इन निर्देशों के आधार पर नाबार्ड के साथ संपर्क कर सहकारी बैंकों को लाइसेंस देने के लिए कुछ दिशा निर्देश तय किए गए. इसके साथ आरबीआई के सभी क्षेत्रीय शाखाओं को यह सलाह दी गई कि जो सहकारी बैंक निर्धारित मानदंड का पालन करते हैं, उन्हें लाइसेंस दिया जाए. इससे यह उम्मीद है कि 2012 में बहुत सारे सहकारी बैंकों को लाइसेंस प्राप्त हो जाएगा. विद्यानाथ समिति की अनुशंसा के आधार पर जो पुनरुद्धार पैकेज दिए जा रहे हैं, उससे राज्य सहकारी बैंक तथा केंद्रीय सहकारी बैंक की आर्थिक स्थिति में सुधार आएगा और ये लाइसेंस लेने के क़ाबिल बन जाएंगे. ग़ौरतलब है कि 31 मार्च, 2009 तक 17 राज्य सहकारी बैंक तथा 296 ज़िला केंद्रीय सहकारी बैंक बिना लाइसेंस के थे, जिनकी संख्या 30 नवंबर, 2011 तक घटकर क्रमशः 6 और 117 हो गई. सहकारी बैंकों के परिचालन को सुदृढ़ करने के लिए सही तरीक़े से चल रहे कुछ सहकारी बैंकों का अध्ययन किया गया. इस अध्ययन में प्राथमिक कृषि सहकारी समितियों (पीएसीएस) लार्ज आदिवासी मल्टीपर्पस को ऑपरेटिव सोसायटी (एलएएमपीएस) फार्मर्स सर्विस सोसायटी (एफएसएस) को भी इसमें शामिल किया गया है. 21 राज्यों में सुचारू रूप से चलाए जा रहे 208 सहकारी समितियों का अध्ययन किया गया. रिजर्व बैंक के अनुसार, अध्ययन में इन बैंकों की कार्यप्रणालियों के बारे में जानकारी प्राप्त करना, इन संस्थाओं के सदस्यों, इनमें धन जमा करने वाले जमाकर्ताओं तथा ऋण लेने वालों का प्रोफाइल इकठ्ठा करके उसका अध्ययन करना, इनके प्रबंधन के बारे में जानकारी प्राप्त करना, इनकी कार्यप्रणाली के प्रभावों का विश्लेषण करना तथा इनके प्रभावशाली संचालन के लिए कुछ सुझाव देना आदि शामिल किया गया है. नवंबर 2011 तक इस अध्ययन को अंजाम दिया जा चुका है. इस अध्ययन से यह पता चला है कि किस तरह से संकट में फंसे सहकारी बैंकों को फिर से सशक्त किया जाए. आरबीआई इस पर निर्देश जारी करेगी. रिजर्व बैंक और भारत सरकार के इन प्रयासों से उम्मीद है कि कुछ समय में अल्पावधि सहकारी ऋण संरचना को एक नया आधार प्राप्त होगा तथा इसका तेज़ी से विकास होगा. सहकारी ऋण संरचना के विकास का सबसे ज़्यादा लाभ सुदूर गांव में रहने वाले किसानों, मज़दूरों तथा आदिवासियों को होगा. इस संरचना को मज़बूत किए बिना सरकार के वित्तीय समावेशन का सपना पूरा होना मुश्किल है. अतः यह भारत सरकार के लिए बड़ी चुनौती है कि वह इस संरचना को और मज़बूत करे. इसकी मज़बूती का फायदा दूसरी हरित क्रांति, पशुपालन, म़ुर्गी पालन आदि में होगा. इससे हमारे देश की उत्पादकता बढ़ेगी, जिससे भारत खाद्य सुरक्षा संबंधी अपने लक्ष्य को पा सकेगा.

(लेखक रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया के एग्जीक्यूटिव डायरेक्टर हैं)