सबके दुलारे दाग़ी, दलबदलू और धन्ना सेठ

यह लोकतंत्र की सियासी गाथा का स्याह पक्ष है, जहां दाग को अच्छा माना जाता है. निष्ठा जहां पैसे के आगे दम तोड़ देती है. ईमानदारी जहां बाहुबल के आगे हार जाती है. यह चुनावी समर है. जहां सब कुछ जायज़ है, बशर्ते आप ईमानदार न हों, साफ छवि के न हों. यहां जनता हारती है, जीतता है स़िर्फ पैसा और पावर. क्या है उत्तर प्रदेश के चुनावी महासमर की हक़ीक़त. पढ़िए इस रिपोर्ट में.

उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव के लिए ताल ठोंक रहे किसी भी दल को दलबदलुओं और दागियों से परहेज नहीं है. इनके सहारे कोई साइकिल पंक्चर करना चाहता है तो कोई पंजा मरोड़ना. कोई हाथी की मदमस्त चाल को मंद करने की फिराक में है तो कोई कीचड़ में खोलने वाले कमल को कीचड़ में ही मिलाने की व्यूह रचना कर रहा है. इस सबके बीच जनता बेचारी तमाशबीन बनी बैठी है. जनता इन सबके दागदार दामन से वाक़ि़फ है, लेकिन वह क्या करे. उसे तो कम दाग या ज़्यादा दाग वालों में से ही किसी एक को चुनना है. यह जनता की मजबूरी है और शायद नासमझी भी. बहरहाल, इस सबके लिए सबसे ज़्यादा ज़िम्मेदार कोई है तो वे हैं राजनीतिक दल. दागियों और दलबदल के खेल में जुटे विभिन्न राजनीतिक दलों में से एक भाजपा ने हाल में बसपा से निकाले गए उसके कुछ दागी दिग्गज नेताओं को अपने यहां शरण देकर एक नई बहस को जन्म दे दिया है. इसके लिए भाजपा की आलोचना भी हो रही है, लेकिन उसे अपनी चाल, चरित्र और चेहरे से अधिक चिंता जिताऊ प्रत्याशियों को लेकर है. भाजपा के इस क़दम का स़िर्फपार्टी से बाहर ही विरोध नहीं हो रहा है, बल्कि आरएसएस और पार्टी के कुछ नेताओं को भी यह सब रास नहीं आ रहा है. यह और बात है कि वे फिलहाल मुंह खोलने से कतरा रहे हैं. भाजपा ने दागियों को न केवल पार्टी में शामिल किया, बल्कि उनमें से कई को विधानसभा के लिए टिकट भी थमा दिया. ऐसा किसके इशारे पर हुआ, यह एक यक्ष प्रश्न बना हुआ है. दलबदल के इस खेल में हाथ आजमाने के बाद पार्टी में मंथन का भी दौर शुरू हो गया है.

राजनीति के अपराधीकरण के लिए सपा, बसपा एवं कांग्रेस को कोसने वाली भाजपा में इधर शामिल हुए और पद-प्रतिष्ठा से नवाजे गए लोगों पर नज़र डालें तो पता चलता है कि केवल दलबदलुओं को ही प्रत्याशी नहीं बनाया गया, बल्कि उन प्रेम नारायण पांडेय को तरबगंज से उम्मीदवार बना दिया गया, जिन पर भाजपा कार्यकर्ताओं के उत्पीड़न का आरोप है. भाजपा की तीसरी सूची में साक्षी महाराज का भी नाम है. वह अक्टूबर में जनस्वाभिमान यात्रा के दौरान भाजपा में शामिल हुए थे. साक्षी पर उन्हीं के आश्रम में रहने वाली विद्या भारती ने यौन उत्पीड़न का आरोप लगाया था. इसी प्रकार दलबदलू पूर्व विधायक शशिबाला पुंडीर, अजय सिंह पोईया, पूर्व विधायक समरपाल एवं अनिल यादव भी भाजपा का टिकट पाने में सफल रहे.

भले ही आज भाजपा दागियों को पार्टी में शामिल करने से कठघरे में खड़ी हो गई हो, लेकिन साफ-सुथरी राजनीति और चुनाव सुधारों से सरोकार रखने वाली स्वयंसेवी संस्था नेशनल इलेक्शन वॉच की रिपोर्ट के मुताबिक़, बीते माह के अंत तक उत्तर प्रदेश में भाजपा ने बीस, कांगे्रस ने छब्बीस और समाजवादी पार्टी ने चौबीस ऐसे लोगों को टिकट दिए हैं, जिनका आपराधिक रिकॉर्ड है. बसपा भले ही अबकी बार दागियों और अपराधियों को टिकट देने से परहेज कर रही हो, लेकिन 2007 के विधानसभा चुनाव में उसने भी दागियों को फलने-फूलने का ख़ूब मौक़ा दिया था. भ्रष्टाचार और राजनीति के अपराधीकरण के मुद्दे पर राजनीतिक दलों की कथनी और करनी में काफी अंतर है. जहां तक बात दलबदलुओं की है, उनकी तो सभी दलों में चांदी है. खासकर चुनाव के समय तो दलबदल का मौसम ही आ जाता है. आज जो नेतागण दलबदल को लेकर भाजपा पर उंगली उठा रहे हैं, उनमें भी कई नेता अनेक बार दलबदल कर चुके हैं. अगर कांग्रेस की बात करें तो दलबदल को लेकर उसने भाजपा पर ज़बरदस्त हमला बोल रखा है, बिना यह परवाह किए कि उत्तर प्रदेश कांग्रेस में इस समय दलबदलुओं का ही दबदबा है. राहुल के मिशन 2012 को पूरा करने का ज़िम्मा भी यही दलबदलू संभाले हुए हैं. परंपरागत कांग्रेसी हाशिए पर हैं या फिर हाईकमान के रवैये से क्षुब्ध होकर घर बैठ गए हैं. कांग्रेस हाईकमान को भी पुराने कांग्रेसियों से ज़्यादा भरोसा उन नेताओं पर है, जो दूसरे दलों से आए हैं.

प्रदेश कांग्रेस की बागडोर सपा छोड़कर आई डॉ. रीता बहुगुणा जोशी के हाथों में है. सपा से ही आए बेनी प्रसाद वर्मा को इस चुनाव में सबसे ज़्यादा तवज्जो मिल रही है. कहा तो यह भी जा रहा है कि अगर बिल्ली के भाग्य से छीका टूट गया तो बेनी बाबू उत्तर प्रदेश के अगले मुख्यमंत्री हो सकते हैं. बेनी की तरह राजबब्बर भी सपा से आकर कांगे्रस को मज़बूत कर रहे हैं. राजबब्बर भी बेनी की तरह अमर सिंह से खटपट होने के बाद कांग्रेस में शामिल हुए थे. अब वह हाईकमान के सबसे भरोसेमंदों में गिने जाते हैं. वहीं पश्चिमी उत्तर प्रदेश में चुनाव अभियान रशीद मसूद की अगुवाई में चलाने के संकेत हैं. हाल में सपा छोड़कर कांग्रेस में शामिल हुए रशीद मसूद को तो पार्टी की सबसे ताक़तवर कमेटी कांग्रेस कार्यसमिति में ले लिया गया है. राहुल के मिशन 2012 को पूरा करने के लिए जिन नेताओं के नेतृत्व में कांग्रेस चुनाव मैदान में उतरने जा रही है, उनमें परंपरागत कांग्रेसियों के बजाय समाजवादी पार्टी से आए नेताओं की संख्या कहीं अधिक है. कांग्रेस में उत्तर प्रदेश से लेकर दिल्ली तक दलबदलुओं का ही सिक्का चल रहा है. कई सीटों पर पुराने कांग्रेसियों को दरकिनार कर बेनी की सिफारिश पर दूसरे दलों से आए लोगों को टिकट दिए गए. इसी प्रकार बसपा से कांग्रेस में लौटे पूर्व एमएलसी सिराज मेंहदी को मीडिया कोऑर्डिनेटर बनाया गया है.

बसपा छोड़कर आए पूर्व सांसद बलिहारी बाबू पर भी कांग्रेस हाईकमान मेहरबान है.   समाजवाद को ठेंगा दिखाकर कांग्रेसी रंग में रंगने वाले नेताओं के आगे जीवन भर कांग्रेस का झंडा उठाने वाले हाशिए पर पहुंचा दिए गए हैं. पूर्व प्रदेश अध्यक्ष अरुण कुमार सिंह मुन्ना, कांग्रेस कार्यसमिति के सदस्य रहे हरिकेश बहादुर, पूर्व विधायक भूधर नारायण मिश्र, नेक चंद्र पांडेय, राजेश पति त्रिपाठी, सुबोध श्रीवास्तव, डॉ. संतोष सिंह, रत्नाकर पांडेय, चंद्रभान मणि त्रिपाठी, जयराम गौतम, प्रियदर्शी जेटली एवं अनुसूइया शर्मा जैसे दर्जनों नेता किनारे कर दिए गए हैं. खीरी से कई बार विधायक रहे तेज नारायण त्रिवेदी तो पार्टी छोड़कर चले गए. दागियों, अपराधियों एवं भ्रष्टाचारियों को शामिल करके सत्ता पाने का सपना संजोए भाजपा के बारे में तो जितना भी कहा जाए, कम है. उस पर भाजपा नेता मुख्तार अब्बास नकवी कहते हैं, भाजपा गंगा है, जिसमें नालों का पानी भी गंगाजल बन जाता है. आम लोगों से लेकर भाजपा कार्यकर्ताओं तक को यह भरोसा नहीं हो पा रहा था कि बसपा, सपा और कांग्रेस को दागियों की पनाहगाह बताते न थकने वाले नेताओं ने उन्हीं बाबू सिंह कुशवाहा को पार्टी में ले लिया, जिन्हें एनआरएचएम घोटाले में मुख्य भूमिका निभाने वाला बताते हुए मंत्रिमंडल से न केवल बर्खास्त करने की मांग भाजपा ने उठाई थी, बल्कि जेल भेजने की मांग भी की थी. जो कुशवाहा छह महीने से लगातार भाजपा की भ्रष्टाचार विरोधी समिति के अध्यक्ष किरीट सोमैया के निशाने पर थे, वह अब पार्टी में शामिल हैं.

राजनीति के अपराधीकरण के लिए सपा, बसपा एवं कांग्रेस को कोसने वाली भाजपा में इधर शामिल हुए और पद-प्रतिष्ठा से नवाजे गए लोगों पर नज़र डालें तो पता चलता है कि केवल दलबदलुओं को ही प्रत्याशी नहीं बनाया गया, बल्कि उन प्रेम नारायण पांडेय को तरबगंज से उम्मीदवार बना दिया गया, जिन पर भाजपा कार्यकर्ताओं के उत्पीड़न का आरोप है. भाजपा की तीसरी सूची में साक्षी महाराज का भी नाम है. वह अक्टूबर में जनस्वाभिमान यात्रा के दौरान भाजपा में शामिल हुए थे. साक्षी पर उन्हीं के आश्रम में रहने वाली विद्या भारती ने यौन उत्पीड़न का आरोप लगाया था. इसी प्रकार दलबदलू पूर्व विधायक शशिबाला पुंडीर, अजय सिंह पोईया, पूर्व विधायक समरपाल एवं अनिल यादव भी भाजपा का टिकट पाने में सफल रहे. बसपा छोड़कर आए बाबू सिंह कुशवाहा, दद्दन मिश्रा, बादशाह सिंह एवं अवधेश वर्मा से भाजपा को क्या फायदा होगा? इस सवाल का जवाब तलाशा गया तो पता चला कि भाजपा दरअसल पिछड़ा कार्ड खेलने की कोशिश कर रही है. अवधेश वर्मा और दद्दन मिश्रा तो टिकट भी पा गए हैं. सपा भी इससे अछूती नहीं है. सपा में दागियों और दलबदलुओं की संख्या अच्छी-खासी है. हद तो तब हो गई, जब बलात्कार और अपहरण के एक मामले को लेकर चर्चा में आने के बाद बसपा से निकाले गए विधायक गुड्डू पंडित को सपा में शामिल कर लिया गया. गुड्डू पंडित जब तक बसपा में रहे, तब तक समाजवादी पार्टी उनके नश्तर चुभोती रही. आज की तारीख़ में वह सपा की तऱफ से चुनावी मैदान में हैं. नरेश अग्रवाल जो वैश्यों का नेता होने का दंभ भरते हैं, वह भी सपा में पाला बदल कर आ गए हैं. नरेश अग्रवाल, उनके विधायक पुत्र नितिन अग्रवाल, कई बार भाजपा के टिकट से चुनाव जीते गोमती यादव (लखनऊ), लोकदल के पूर्व मंत्री कुतबुद्दीन अंसारी (नूरपुर), बसपा के हाजी गुलाम मोहम्मद (सिवालखास), लोकदल के बदरुल हसन (सिकंदराबाद), सुनील सिंह (स्याना), बसपा की राजेश्वरी देवी (सांडी) एवं महेश वर्मा (औरैया) पाला बदल कर आए थे, उन्हें टिकट देने में सपा नेतृत्व को कोई संकोच नहीं हुआ. इसी प्रकार राष्ट्रीय लोकदल में भी दलबदलुओं का सिक्का चल रहा है. करतार सिंह, सपा से आए अशरफ अली ख़ान, पंडित उमेश सैथिंया, अमित यादव, बासित अली एवं हाजी याकूब क़ुरैशी राष्ट्रीय लोकदल की शोभा बढ़ा रहे हैं.

कितने दा़गी, कितने धन्ना सेठ

एक नज़र 2007 यानी मौजूदा विधानसभा के सदस्यों की चाल, चरित्र और चेहरे पर. 73 विधायकों के ख़िला़फ संगीन मामले लंबित हैं. संगीन मामलों से मतलब है हत्या, हत्या की कोशिश या फिरौती के लिए अपहरण. इनमें सबसे ज़्यादा बसपा के 34, सपा के 16, भाजपा के 8, कांग्रेस के 4, आरएलडी के 4 और 7 अन्य शामिल हैं. प्रतिशत के हिसाब से देखें तो सबसे आगे आरएलडी है. उसके दस में से 4 विधायकों के ख़िला़फ संगीन मामले हैं. फिर नंबर आता है कांग्रेस, बसपा और सपा का. 2007 के उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव में 293 ऐसे निर्वाचन क्षेत्र थे, जहां कम से कम एक दागी उम्मीदवार मैदान में था. 148 क्षेत्रों में एक दागी उम्मीदवार था, वहां जनता ने साफ-सुथरी छवि वाले 94 उम्मीदवारों को चुना यानी 64 फीसदी अच्छे उम्मीदवार चुने गए. 48 ऐसे क्षेत्र थे, जहां 3 दागी उम्मीदवार थे, वहां साफ-सुथरी छवि वाले स़िर्फ 11 उम्मीदवार ही चुने जा सके, जबकि 37 दागी उम्मीदवार जीतकर आए. 6 ऐसे क्षेत्र थे, जहां 4 दागी उम्मीदवार लड़ रहे थे, वहां सभी दागी चुनाव जीत गए. यानी जिन क्षेत्रों में कम दागी थे, वहां साफ छवि के लोग जीते और जहां दागियों की संख्या ज़्यादा थी, वहां दागी उम्मीदवार चुनाव जीते. ज़ाहिर है, मतदाताओं के पास अच्छे विकल्प हों तो अच्छे उम्मीदवार ही चुनकर आएंगे. वहीं इस बीमारू प्रदेश के विधायकों की आर्थिक स्थिति ज़बरदस्त रूप से सेहतमंद है. 2007 के विधानसभा चुनाव में 125 करोड़पति विधायक चुनकर आए. लगभग 32 फीसदी करोड़पति विधायक. इनमें सबसे ज़्यादा सत्तारूढ़ दल यानी बसपा के 51, सपा के 37, भाजपा के 15, कांग्रेस के 8 और आरएलडी के 5 विधायक शामिल हैं. अगर राज्य के सभी विधायकों की बात की जाए तो प्रत्येक की औसत संपत्ति 1.14 करोड़ रुपये है.