दिल्ली का बाबू : उच्चायुक्तों की कमी

प्रधानमंत्री की व्यस्तता का प्रभाव भारत की विदेश नीति पर भी पड़ रहा है. कई देशों में भारत सरकार अपना राजदूत या उच्चायुक्त नियुक्त नहीं कर पा रही है. इसके पीछे एक कारण तो प्रधानमंत्री की राजनीतिक व्यस्तता बताई जा रही है, क्योंकि वही विदेश मंत्री और विदेश सचिव के साथ मिलकर राजदूत या उच्चायुक्त की नियुक्ति करते हैं. दूसरी वजह यह है कि इसके लिए राजनीतिक पृष्ठभूमि वाले लोगों की तलाश की जा रही है. महत्वपूर्ण देशों में उच्चायुक्त या राजदूत उन्हें ही बनाया जाता है, जिनका तत्कालीन सरकार से नजदीकी रिश्ता हो. अगस्त 2011 में नलिन सूरी की सेवानिवृत्ति के बाद किसी को ब्रिटेन का उच्चायुक्त नहीं बनाया गया. यही स्थिति बांग्लादेश में है. रंजीत मित्तल गत अक्टूबर में सेवानिवृत्त हो गए, लेकिन किसी को अभी तक वहां का उच्चायुक्त नहीं बनाया गया है. विदेश मंत्रालय के सूत्रों का कहना है कि विदेश सचिव रंजन मथाई इस बीच कुछ राजदूतों एवं उच्चायुक्तों की नियुक्ति की घोषणा करने वाले हैं. चूंकि 1975 एवं 1976 बैच के कई आईएफएस अधिकारी सेवानिवृत्त होने वाले हैं, इसलिए विदेश मंत्रालय को जल्दी ही दूसरे लोगों को नियुक्त करने की जरूरत पड़ेगी.

वरिष्ठता की अनदेखी

वरिष्ठ आईपीएस अधिकारियों की नियुक्तियां एवं स्थानांतरण विवादों से परे नहीं होते हैं. यही स्थिति पश्चिम बंगाल में देखने को मिल रही है. राज्य के पुलिस स्थापना बोर्ड, जिसके प्रमुख डीजीपी एन मुखर्जी हैं, में नियुक्ति को लेकर विवाद चल रहा है. 1981 बैच के आईपीएस अधिकारी नजरुल इस्लाम, जो अभी एडीजी रैंक के हैं, ने बोर्ड के पुनर्गठन पर सवाल उठाया है. उनका कहना है कि अभी बोर्ड के कई सदस्य उनसे रैंक में नीचे हैं, इसलिए बोर्ड के पुनर्गठन से पहले इस बात पर विचार किया जाए. सूत्रों के अनुसार, पुलिस स्थापना बोर्ड का गठन सुप्रीम कोर्ट के निर्देश पर किया गया है, जिसके अनुसार डीजीपी के अलावा बोर्ड में चार सदस्य होंगे, जो वरिष्ठ आईपीएस अधिकारी होंगे, लेकिन पश्चिम बंगाल सरकार वरिष्ठता का ध्यान नहीं रख रही है.

ईमानदार बाबू की परेशानी

सरकारी सेवाओं में पारदर्शिता और जिम्मेदारी के लिए शोर मचाया जा रहा है, लेकिन फिर भी आदिवासी क्षेत्रों में होने वाले भ्रष्टाचार को उजागर करने वाले अधिकारियों के लिए अपना करियर सही तरीके से चलाना मुश्किल होता है. हरियाणा कैडर के वन सेवा के एक अधिकारी संजीव चतुर्वेदी के साथ ऐसा ही होता रहा है. उन्होंने जब वन विभाग के भ्रष्टाचार को उजागर किया तो उन्हें अपने पांच साल के कार्यकाल में बारह बार स्थानांतरण झेलना पड़ा, साथ ही कई आरोपों का भी सामना करना पड़ा. उन्होंने जब केंद्रीय प्रतिनियुक्ति पर जाने की बात कही तो भी हरियाणा सरकार ने उन्हें जाने नहीं दिया, लेकिन उन्हें खुशी तब हुई, जब हाल में केंद्र में लाए जाने वाले अधिकारियों की सूची में उनका नाम भी शामिल कर लिया गया. यही नहीं, सीबीआई ने यह भी कहा कि वन विभाग की जिन अनियमितताओं का पर्दाफाश संजीव चतुर्वेदी ने किया है, उनकी स्वतंत्र जांच की जानी चाहिए. इसे भ्रष्टाचार को उजागर करने वाले अधिकारियों के लिए खुशी की बात कही जा सकती है.

loading...