दिल्ली का बाबू : ममता को बाबुओं की तलाश

पश्चिम बंगाल के बाबुओं के साथ सब ठीक नहीं हो रहा है. पहले तो ममता बनर्जी ने उन्हें केंद्र में जाने से मना कर दिया, जो डिपुटेशन पर जाना चाहते थे. इससे बाबुओं को परेशानी हुई. अब वह राज्य के कई प्रशासनिक पदों पर नियुक्ति के लिए बाबुओं की खोज कर रही हैं. सूत्रों के अनुसार, राज्य के वित्त सचिव सी एम बछावत अपना स्थानांतरण कराना चाहते हैं, लेकिन उनका स्थानांतरण नहीं किया जा रहा है, क्योंकि सरकार को इस पद पर नियुक्ति के लिए जिस तरह के अधिकारी की आवश्यकता है, उसे ढूंढने के लिए महीनों का समय चाहिए. सच बात तो यह है कि सरकार बछावत की जगह आबकारी सचिव एच के द्विवेदी को लाना चाहती है, जिसके लिए उसे कुछ महीने इंतजार करना पड़ेगा. इसीलिए वह वित्त सचिव का स्थानांतरण नहीं कर रही है. अभी इस राज्य के बाबुओं का रूटीन स्थानांतरण भी सही तरीके से नहीं हो रहा है. यहां के बाबू चर्चा में नहीं आना चाहते हैं. महत्वपूर्ण बात यह है कि प्रशासनिक प्रशिक्षण संस्थान के निदेशक पद पर बैठे बाबू सुरक्षित स्थान पाने के लिए होड़ लगाए हुए हैं. पता नहीं, दीदी को अपने प्रशासन में सुधार के लिए किस तरह के अधिकारियों की आवश्यकता है, जिन्हें खोजने के लिए उन्हें इतनी मशक्कत करनी पड़ रही है.

स्थानांतरण की राजनीति

पंजाब विधानसभा चुनाव की तारीखों की घोषणा के कारण आईएएस अधिकारी अडप्पा कार्तिक को राहत मिली है. एक साल के भीतर कार्तिक का सात बार स्थानांतरण किया जा चुका है, लेकिन चुनाव आचार संहिता लागू होने के बाद कम से कम उन्हें स्थानांतरण से कुछ समय के लिए निजात मिल जाएगी. इस समय कार्तिक सचिव-तकनीकी शिक्षा हैं और अब वह नई सरकार के गठन तक इस पद पर रह सकते हैं. सूत्रों का कहना है कि मुख्यमंत्री प्रकाश सिंह बादल की आईएएस अधिकारियों के स्थानांतरण संबंधी नीति समान नहीं है. वह कुछ अधिकारियों का स्थानांतरण बहुत जल्दी-जल्दी कर देते हैं, जबकि कुछ अधिकारी ऐसे हैं, जो एक ही पद पर पांच साल से बैठे हुए हैं और उनका स्थानांतरण नहीं किया जा रहा है. स्थानांतरण की यह नीति तो राजनीति से ही प्रेरित मानी जा सकती है. वैसे कई आईएएस अधिकारी सेवानिवृत्त होने के बाद राजनीति में आने लगे हैं और चुनाव भी लड़ना चाहते हैं. ऐसे में यही कहा जा सकता है कि यह तो स्थानांतरण की राजनीति है, जो पहले से चली आ रही है, लेकिन इस बीच कुछ बढ़ती जा रही है.

सीबीआई की परेशानी

सीबीआई आजकल कई कारणों से चर्चा में है. सामाजिक कार्यकर्ता उसे सरकार के चंगुल से मुक्त कराने के लिए संघर्ष कर रहे हैं. राजनेताओं के बीच भी इस बात के लिए बहस चल रही है कि किस तरह सीबीआई के दुरुपयोग को रोका जाए. सीबीआई अभी कई घोटालों की जांच कर रही है, लेकिन इस समय उसकी चिंता का एक और कारण है. इस विभाग में कई पद खाली हैं, जिन्हें भरा जाना जरूरी है, लेकिन नियुक्तियां नहीं की जा रही हैं. सीबीआई में निरीक्षक, उपनिरीक्षक, एएसपी और एसपी जैसे कई अधिकारियों की जरूरत है, लेकिन इस पर ध्यान नहीं दिया जा रहा है. सूत्रों के अनुसार, सीबीआई के कार्यकारी विभाग में 690 पद खाली हैं, जबकि विधि विभाग में 100 से अधिक पद खाली हैं. इसके अलावा संयुक्त निदेशक के कम से कम चार पद खाली हैं. इस समय सीबीआई के निदेशक ए पी सिंह प्रधानमंत्री एवं अन्य नेताओं से मिलने में व्यस्त हैं, ताकि वह सीबीआई के भविष्य के बारे में सही जानकारी प्राप्त कर सकें. लोकपाल आने के बाद सीबीआई की क्या स्थिति होगी, यह अभी तय नहीं है. लगता है कि जब तक सीबीआई की स्थिति स्पष्ट नहीं होगी, तब तक इन खाली पदों पर नियुक्तियों के लिए इंतजार करना पड़ेगा. इससे सीबीआई को परेशानी हो रही है, क्योंकि उसके पास बहुत सारे मामले हैं, जिनकी वह जांच कर रही है.

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