देव आनंद और मारियो मिरांडा वैश्विक व्यक्तित्व थे

एक सप्ताह के भीतर भारत के दो बड़े कलाकारों देव आनंद और मारियो मिरांडा का निधन हो गया. दोनों अपने-अपने क्षेत्र के महारथी थे. दोनों का अपना रास्ता था, दोनों को लोगों का बहुत प्यार मिला और दोनों अद्वितीय प्रतिभा वाले थे. दोनों ने पचास के दशक में भरपूर नाम कमाया और लोगों का मनोरंजन किया. मुझे याद है, जब मैं बारह साल का था तो मैंने देव आनंद की फिल्म बाजी देखी थी. इसके बाद मैं उनकी हर फिल्म प्रथम दिन के प्रथम शो में देखता था. उस समय पांच आने और साढ़े दस आने का टिकट होता था. देव आनंद की फिल्म देखने के लिए लंबी कतार लगती थी. इसके बाद मैंने जाल, टैक्सी ड्राइवर, सीआईडी, नौ दो ग्यारह एवं मिलाप आदि फिल्में देखीं. इसके अलावा मैंने दिलीप कुमार के साथ देव आनंद की एकमात्र बनी फिल्म इंसानियत देखी, जिसे देखने वाले कम लोग थे.

मारियो मिरांडा वैसे दूसरे कलाकार थे, जिनकी मैं पचास के दशक में प्रशंसा करता था, लेकिन उन्हें पिछले दशक से जानने लगा. वह भी देव आनंद की तरह वैश्विक व्यक्ति थे. उनका अधिकांश समय भारत के गोवा में व्यतीत हुआ. वह जितने भारतीय थे, उतने ही पश्चिम के थे. गोवा की सबसे पुरानी पुर्तगीज बस्ती लोटीलुम में उनका घर था.

पचास के दशक में भारतीय सिनेमा में तीन नाम सबसे चर्चित रहे, दिलीप कुमार, राजकपूर और देव आनंद. उस समय के युवा इनमें अपनी छवि देखने का प्रयत्न करते थे. वे इनकी नकल करते थे, ताकि लड़कियों को अपनी ओर आकर्षित कर सकें. दिलीप कुमार ने कई तरह की भूमिकाएं निभाईं. उन्होंने ग्रामीण पृष्ठभूमि वाले युवक से लेकर शहरी युवक तक की भूमिका फिल्मों में निभाई. वह ऐतिहासिक और आधुनिक समय की फिल्में भी करते थे. उनकी फिल्में नेहरू के समय की भारतीय राजनीति से संबंधित होती थीं. राजकपूर ने अलग तरह की भूमिकाएं निभाईं. उनकी फिल्में वाम विचारधारा से संबंधित होती थीं. ख्वाजा अहमद अब्बास ने राजकपूर के लिए ऐसी फिल्में बनाईं. उनकी आवारा जैसी फिल्में सोवियत संघ में बहुत चर्चित रहीं.

इन दोनों से इतर देव आनंद की फिल्में अराजनीतिक होती थीं, लेकिन वह और उनके भाई इप्टा से आए थे, इस कारण उनके पास प्रगतिशील आइडिया होता था. देव आनंद ने हमेशा शहरी युवक की भूमिका निभाई, जो न्याय के लिए ऊंचे ओहदे पर बैठे लोगों से संघर्ष करता था. कृष्ण मेनन के 1957 के चुनाव में प्रचार के अलावा देव आनंद ने कभी किसी पार्टी के साथ काम नहीं किया, लेकिन उन्होंने आपातकाल के समय विरोध किया था, जैसा कि वह अपनी फिल्मों में किया करते थे. उन्होंने एक किताब भी लिखी, जिसमें बेबाकी से सारे विषयों पर चर्चा की. कहा जा सकता है कि आजादी के बाद किसी व्यक्ति ने, जिसका जनता के साथ जुड़ाव रहा, इतनी बेबाकी से अपने जीवन के अनुभवों को नहीं लिखा. उनसे मेरी अंतिम मुलाक़ात लंदन में हुई थी. वह उन लोगों में से थे, जो सारे संसार को अपना घर मानते हैं. वह जैसे मुंबई में रहते थे, ठीक उसी तरह लंदन में भी रहते थे. उनकी छवि मनोज कुमार की तरह ब्रिटिश विरोधी नहीं थी. वह लंदन में ब्रिटिश बनकर ही रहते थे. उनका अंतिम संस्कार ईसाई कब्रिस्तान में किया गया, लेकिन हिंदू रीति- रिवाज से. अंतिम समय में भी उन्होंने किसी तरह का कोई समझौता नहीं किया.

मारियो मिरांडा वैसे दूसरे कलाकार थे, जिनकी मैं पचास के दशक में प्रशंसा करता था, लेकिन उन्हें पिछले दशक से जानने लगा. वह भी देव आनंद की तरह वैश्विक व्यक्ति थे. उनका अधिकांश समय भारत के गोवा में व्यतीत हुआ. वह जितने भारतीय थे, उतने ही पश्चिम के थे. गोवा की सबसे पुरानी पुर्तगीज बस्ती लोटीलुम में उनका घर था. उनके घर की दीवारें देशी-विदेशी पेंटिंग्स से भरी पड़ी रहती थीं. उनकी पत्नी हबीबा हैदराबाद की थीं, जो उन्हें वहां की तहजीब से वाक़ि़फ कराती रहती थीं. दोनों के पास विश्व के कोने-कोने से उनके दोस्त आते थे, जिनका वे स्वागत किया करते थे. पचास के दशक में वैश्विक विचार रखने वाले भारतीय थे, लेकिन धीरे-धीरे वे ख़त्म होते गए. इससे भारत को नुक़सान भी हुआ. उस समय भारत ग़रीब, लेकिन ख़ुश देश था. आज अमीर और वैश्वीकृत हो गया है. आज भी कई सितारे विदेश जाते हैं, लेकिन यह नहीं कह सकते कि वे वहां घर जैसा अनुभव कर रहे हैं. अगर वे ऐसा कहेंगे तो कोई उनके ख़िला़फ पीआईएल दर्ज कर देगा.