मिस्र : मार्शल तांतवी का तांडव

कहा जाता है कि क्रांति अपने पुत्रों को निगल जाती है. क्या मिस्र में कुछ ऐसा ही होने वाला है? जिन लोगों ने देश में लोकतंत्र की बहाली के लिए अपना क़ीमती समय ख़र्च किया, संसाधन लगाए और होस्नी मुबारक को इस्ती़फा देने के लिए मजबूर किया, आज उन्हीं के साथ फिर से अन्याय किया जा रहा है. क्या लोकतंत्र की स्थापना के लिए प्रदर्शन करना आज इतना बड़ा गुनाह हो गया है कि सेना को अपनी मर्यादा का भी ध्यान नहीं रहा. जिन लोगों ने मिस्र में लोकतंत्र की स्थापना के लिए दिन-रात मेहनत की, उन्हीं को हाशिए पर भेज दिया गया. मिस्र आज भी वहीं खड़ा है, जहां दस महीने पहले खड़ा था. अंतर इतना है कि इस समय लोग बदल गए हैं. शासन का तरीक़ालोगों को दिखाने के लिए बदल गया है. सत्ता एक हाथ से निकल कर दूसरे हाथ में चली गई है. उस समय होस्नी मुबारक अपनी मर्जी चलाते थे, अब सेना प्रमुख उनकी भूमिका निभा रहे हैं. पिछले दिनों एक लड़की को कुछ सैनिकों ने पीटा और उसे घसीटते हुए कुछ दूर तक ले गए. उस लड़की के कपड़े कुछ इस कदर फट गए कि वह लगभग अर्द्धनग्न स्थिति में आ गई, लेकिन सैनिकों को उस पर दया नहीं आई. उसे उसी अवस्था में घसीटा जाता रहा. जिस इस्लाम धर्म में औरतों को इतनी इज़्ज़त की नज़र से देखा जाता है, वहां किसी औरत के साथ होने वाले इस बर्बर व्यवहार को बर्दाश्त कैसे किया जा सकता है.

प्रदर्शनकारियों ने काहिरा में जमकर तोड़फोड़ मचाई, कुछ इमारतों में आग भी लगा दी. लोग सेना से शासन छोड़ने की मांग कर रहे हैं. उनका कहना है कि सेना की मंशा साफ होती जा रही है. वह परोक्ष तौर पर शासन करना चाहती है. संसदीय चुनाव कराना तो केवल एक बहाना है, इससे लोकतंत्र बहाल नहीं होगा. सेना जब तक शासन की बागडोर नागरिक प्रशासन के हाथों में नहीं सौंपती, तब तक देश में सही मायनों में लोकतंत्र नहीं कहा जा सकता.

इस घटना के बाद प्रदर्शनकारियों की संख्या बढ़ने लगी है. आख़िरकार उसकी ग़लती क्या थी, उसने कौन सा अपराध किया था? मिस्र की जनता तो केवल इतना चाहती है कि जिस बदलाव के लिए उसने महीनों तक संघर्ष किया, उसकी हत्या न हो. देश में सही मायनों में लोकतंत्र की स्थापना हो, न कि लोकतंत्र के नाम पर सेना की तानाशाही बरक़रार रहे. क्या इसे अपराध कहेंगे? अगर यह अपराध है तो फिर इसकी सज़ा उन सभी लोगों को मिलनी चाहिए, जिन्होंने होस्नी मुबारक के शासन के ख़ात्मे के लिए सड़कों को अपना घर बनाया, जिन्होंने अपनी जान की परवाह नहीं की और अपने एवं बच्चों के सुनहरे भविष्य के लिए महीनों तक संघर्ष किया. सेना के उन लोगों को भी अपराधी क़रार दिया जाना चाहिए, जिन्होंने होस्नी मुबारक का साथ नहीं दिया. ग़ौरतलब है कि फरवरी में हुई क्रांति के बाद तीस सालों से काबिज होस्नी मुबारक को सत्ता छोड़नी पड़ी थी. होस्नी मुबारक के बाद शासन की बागडोर सेना के हाथों में सौंप दी गई थी. उस समय आंदोलन करने वाले युवा इससे ख़ुश थे, लेकिन कुछ राजनीतिक विश्लेषकों ने उस समय भी इसे सही नहीं बताया था. उनका कहना था कि सेना को सत्ता सौंपना लोकतंत्र के लिए ख़तरनाक हो सकता है और उनका अनुमान बिल्कुल सही निकला.

अंतरिम सरकार संविधान संशोधन का प्रस्ताव लाई, जिसके मुताबिक़ सेना को संवैधानिक वैधता का रक्षक घोषित करना था. साथ ही उसमें यह भी कहा गया कि सेना का बजट सार्वजनिक नहीं किया जाएगा. इसके अलावा राष्ट्रपति के चुनाव को 2012 के अंत या 2013 तक के लिए टाल दिया गया. संविधान संशोधन के इस प्रस्ताव से जनता भड़क गई. उसे लगने लगा कि सेना किसी तरह सत्ता अपने पास रखना चाहती है. मिस्र के युवा जल्द से जल्द लोकतंत्र बहाल करना चाहते हैं. उन्होंने ख़ुद को ठगा महसूस किया, सेना को क्रांति विरोधी क़रार दिया और काहिरा एवं अलक्जेंड्रिया में इकट्ठा होने लगे. पहले सेना ने इसे दबाने की कोशिश की, लेकिन जब प्रदर्शनकारियों की संख्या बढ़ने लगी तो उनकी कुछ बातों को स्वीकार कर लिया गया. मिस्र की जनता सोई नहीं है और जागे हुए लोगों को धोखा नहीं दिया जा सकता. सेना ने संसदीय चुनाव कराने का अपना वायदा तो पूरा किया, लेकिन जनता इतने से ख़ुश नहीं हुई. उसका कहना है कि जब तक शासन की बागडोर नागरिक प्रशासकों के हाथों में नहीं सौंपी जाएगी, तब तक उसे इस बात का भरोसा नहीं होगा कि सेना लोकतंत्र की स्थापना के लिए काम कर रही है. जनता को भरोसा दिलाने के लिए सेना को उसकी बात माननी चाहिए थी, लेकिन वह इसके विपरीत काम कर रही है. वह प्रदर्शन कर रहे लोगों पर लगातार हमले कर रही है. सेना के ताजा हमले में दस से अधिक लोग मारे गए और सौ से अधिक घायल हो गए.

प्रदर्शनकारियों ने काहिरा में जमकर तोड़फोड़ मचाई, कुछ इमारतों में आग भी लगा दी. लोग सेना से शासन छोड़ने की मांग कर रहे हैं. उनका कहना है कि सेना की मंशा साफ होती जा रही है. वह परोक्ष तौर पर शासन करना चाहती है. संसदीय चुनाव कराना तो केवल एक बहाना है, इससे लोकतंत्र बहाल नहीं होगा. सेना जब तक शासन की बागडोर नागरिक प्रशासन के हाथों में नहीं सौंपती, तब तक देश में सही मायनों में लोकतंत्र नहीं कहा जा सकता. सेना के रवैये से लगता भी यही है कि वास्तव में वह मिस्र की जनता को सही सरकार नहीं देना चाहती, वह किसी तरह इस जनसैलाब को रोकना चाहती है. अगर सेना के मन में कोई छल-कपट न होता तो वह जनता की बात मान लेती और नागरिक प्रशासन को सत्ता सौंप देती, लेकिन वह तो इस प्रदर्शन को कुचलने पर आमादा है. उसने जिस तरह प्रदर्शनकारियों पर हमले किए, उनसे तो यही लगता है कि मार्शल मोहम्मद हुसैन तांतवी होस्नी मुबारक का स्थान लेना चाहते हैं. सेना की इस हिंसात्मक और अमानवीय कार्रवाई की कई देशों ने भर्त्सना की है. अमेरिकी विदेश मंत्री हिलेरी क्लिंटन ने मिस्र की सेना से अपील की है कि वह देश की जनता को सुरक्षा प्रदान करे और उन अधिकारियों के विरुद्ध कार्रवाई करे, जिन्होंने सेना एवं सुरक्षाबल की मर्यादा का उल्लंघन किया. अगर सेना ने अपना रवैया न बदला तो मिस्र में भी लीबिया जैसे हालात पैदा हो सकते हैं.

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