सिर्फ़ उत्तर प्रदेश में नहीं हो रहे चुनाव

पांच राज्यों में विधानसभा चुनाव होने हैं, लेकिन ताज्जुब की बात है कि मीडिया में सबसे ज़्यादा ख़बरें स़िर्फ उत्तर प्रदेश से ही आ रही हैं. मानों मणिपुर या गोवा देश के लोगों के लिए महत्वपूर्ण नहीं है. तो आइए जानते हैं कि मणिपुर, गोवा, पंजाब और उत्तराखंड में क्या चल रहा है, यहां के मसले क्या हैं, यहां के राजनीतिक दल क्या कर रहे हैं और यहां के चुनाव देश की राजनीति को कैसे प्रभावित करेंगे.

मणिपुर

मणिपुर के लोगों को आतंकवाद और तीन माह तक चली आर्थिक नाकेबंदी के दौरान लोगों को पेट्रोल, रसोई गैस और दवा जैसी आवश्यक वस्तुओं का घोर अभाव झेलना पड़ा था. यहां के चुनाव से जुड़ा एक और दिलचस्प पहलू राजनीति में महिलाओं की भागीदारी को लेकर है. प्रदेश की राजनीति में महिलाओं की हिस्सेदारी न के बराबर है. पिछले इलेक्शन में महज एक महिला लांधोनी देवी, जो मुख्यमंत्री ओकराम इबोबी सिंह पत्नी है, वही चुनाव जीत सकी थी. इस बार कांग्रेस ने 60 सीटों में महज तीन टिकट ही महिलाओं को दिया है, जिसमें एक बार फिर इबोबी सिंह की पत्नी हैं. वहीं एमपीपी (मणिपुर पीपुल्स पार्टी) ने एक भी महिला को टिकट नहीं दिया है. भाजपा ने सिर्फ एक टिकट पर महिला उम्मीदवार को खड़ा किया है. सियासत में महिलाओं के लिए आरक्षण की बात करने वाली कांग्रेस पार्टी का चरित्र भी खुलकर सामने आ गया है. बहरहाल मणिपुर में गठबंधन की जो तस्वीर सामने आई है, उसमें जनता दल यूनाइटेड एमपीपी के साथ चुनावी मैदान में है. ख़ास बात यह है कि इसमें एनसीपी और सीपीएम भी शामिल हैं. वहीं दूसरी तरफ भारतीय जनता पार्टी का भी एमपीपी के साथ गठबंधन में शामिल होने से यह चुनाव बेहद दिलचस्प हो गया है. मणिपुर में कांग्रेस सरकार के ख़िला़फ बनी ग़ैर कांग्रेसी गठबंधन निश्चित तौर से कांग्रेस के लिए एक बड़ी चुनौती है. वैसे मणिपुर के पिछले चुनाव नतीजों पर नज़र डालें तो यहां भारतीय जनता पार्टी को एक भी सीट नहीं मिली थी. हालांकि, इस बार भाजपा नेताओं को उम्मीद है कि उन्हें इस बार कई सीटों पर कामयाबी मिलेगी. वैसे देखा जाए तो मणिपुर के तराई क्षेत्र में वैष्णव संप्रदाय के मैतई बहुल इलाके में भाजपा के हिंदुत्व का असर ज्यादा है. वहीं दूसरी तरफ कांग्रेस ने भी मैतई समुदाय के पांच जातियों को दलित जातियों का दर्जा देकर उन्हें लुभाने की कोशिश की है. इस बीच उग्रपंथियों ने पहाड़ी इलाके में कांग्रेस उम्मीदवार को न घुसने देने और प्रचार न करने देने का ऐलान किया है. इससे कांग्रेस नेताओं में खौफ पैदा हो गया है. वहीं विपक्ष इसका फायदा उठाने में कोई कोर कसर नहीं छोड़ना चाहती.

गोवा

वर्ष 1961 तक गोवा पुर्तगाली शासन के अधीन था. पुर्तगालियों के जाने के बाद यहां के पहले मुख्यमंत्री बने महाराष्ट्रवादी गोमांतक पार्टी के  दयानंद बांदोदकर. वर्तमान में दिगंबर कामत यहां के 19वें मुख्यमंत्री हैं. आगामी 3 मार्च को होने वाले चुनाव में यहां की जनता अपना 20वां मुख्यमंत्री चुनेगी. राज्य में क़रीब 10 लाख पंजीकृत मतदाता हैं, जो 40 विधायकों का भाग्य तय करेंगे. यहां एक चरण के चुनाव के लिए 6 फरवरी को अधिसूचना जारी होगी. नामांकन की आख़िरी तारीख़ 13 फरवरी और नाम वापस लेने की आख़िरी तारीख़ 16 फरवरी. वर्तमान विधानसभा में कांग्रेस की 16, भाजपा की 14, एनसीपी की 3, महाराष्ट्रवादी गोमांतक पार्टी की 2, सेव गोवा फ्रंट की 2, यूनाइटेड गोवन्स डेमोक्रेटिक पार्टी की एक और 2 सीटें अन्य के पास हैं. इस चुनाव में अवैध खनन एक अहम सियासी मुद्दा बन सकता है. राज्य सरकार ने भी बॉम्बे हाईकोर्ट के समक्ष माना कि सूबे में अवैध खनन हो रहा है. एक आंकड़े के मुताबिक़, गोवा में 6000 करोड़ टन लौह अयस्क का अवैध खनन किया गया. गोवा विधानसभा की लोक लेखा समिति यानी पीएसी ने 3,500 करोड़ रुपये के खनन घोटाले की बात कही है. हालांकि अवैध खनन से जुड़ा एक और अहम मसला है, जिसकी वजह से हज़ारों ग़ैर गोवा वासी गोवा में रह रहे हैं, जो अवैध खनन के काम से जुड़े हुए हैं. उनका कहना है कि अगर खनन रुक गया तो उनकी रोजी-रोटी छिन जाएगी.

अपराधों में बढ़ोत्तरी भी एक अहम मसला है. खासकर, गोवा पर्यटन के लिए चिंता का एक विषय है. ब्रिटिश युवती स्कारलेट का मर्डर, एक जर्मन युवती के साथ बलात्कार जैसी घटनाओं ने गोवा की क़ानून व्यवस्था पर भी सवाल उठाए हैं. स्कारलेट मामले में तो गोवा के गृह मंत्री रवि नाईक के बेटे का भी नाम आया था. बहरहाल, यहां मुख्य मुक़ाबला कांग्रेस और भाजपा के बीच है, लेकिन कई क्षेत्रीय दल भी हैं, जो कांग्रेस और भाजपा के लिए मुश्किलें खड़ी कर सकते हैं. यूनाइटेड गोवन्स डेमोक्रेटिक पार्टी, सेव गोवा फ्रंट और गोवा विकास पार्टी आपस में गठबंधन कर सकते हैं. इसके अलावा एक और क्षेत्रीय दल इस चुनाव में कूद रहा है, गोवा सुराज पार्टी. कांग्रेस जहां एनसीपी के साथ चुनाव मैदान में उतरेगी, वहीं भाजपा महाराष्ट्रवादी गोमांतक पार्टी के साथ गठबंधन करने की कोशिश में है. बहरहाल, बनते-बिगड़ते सियासी समीकरण के बीच कांग्रेस अपनी सत्ता बचाने की जुगत में है तो भाजपा सत्ता में वापसी की कोशिश कर रही है.

उत्तराखंड

नवंबर, 2000 को भारत के मानचित्र पर 27वें राज्य के रूप में उभरने वाले उत्तराखंड में विधानसभा की 70 सीटों के लिए आगामी 30 जनवरी को वोट डाले जाएंगे, जिसमें राज्य के 58 लाख 87 हज़ार 765 मतदाता अपने सातवें मुख्यमंत्री का चुनाव करेंगे. वैसे तो यहां पर भाजपा, कांग्रेस, बसपा एवं उत्तराखंड क्रांति दल के अलावा समाजवादी पार्टी, सीपीएम, सीपीआई, जनता दल (सेकुलर), लोक जनशक्ति पार्टी जैसी दर्जनों पार्टियां मैदान में हैं, लेकिन सीधा मुक़ाबला कांग्रेस और भाजपा के बीच है. 2007 के विधानसभा चुनाव में भाजपा को 34, कांग्रेस को 21, बसपा को 8 और उत्तराखंड क्रांति दल को 3 सीटें मिली थीं, शेष पार्टियां अपना खाता खोलने में नाकाम रही थीं. कांग्रेस के दो ब़डे नेताओं एन डी तिवारी और हरीश रावत के बीच पार्टी में अपना वर्चस्व क़ायम करने को लेकर जो ल़डाई का़फी दिनों से अंदर ही अंदर चल रही थी, वह अब सामने आने लगी है. आजकल पार्टी में एन डी तिवारी की बात सुनने वाला कोई नहीं है. दूसरी ओर हरीश रावत को हर टीवी चैनल पर कांग्रेस की ओर से बोलते हुए देखा जा सकता है. लगता है, अगर यहां कांग्रेस जीतकर आई तो शायद हरीश रावत को ही राज्य का मुख्यमंत्री बनाया जाएगा, इसलिए प्रत्याशियों के नामों की घोषणा होने के बाद हरीश रावत सबसे ज़्यादा खुश दिखाई दे रहे हैं, जबकि प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष यशपाल आर्य मुरझाए हुए हैं. कारण यह है कि पार्टी हाईकमान ने सूची में रावत के चहेतों को प्राथमिकता दी है.

दूसरी ओर कांग्रेस के वरिष्ठ नेता एवं राज्य के पूर्व मुख्यमंत्री एन डी तिवारी पहले जितने नाराज़ दिखाई दे रहे थे, अब उतने नाराज़ नहीं हैं. भाजपा ने उत्तराखंड विधानसभा चुनाव के लिए अपने 68 प्रत्याशियों की सूची जारी कर दी है. दो सीटें उसने वर्तमान सरकार में शामिल उत्तराखंड क्रांति दल के नेताओं दिवाकर भट (देव प्रयाग) और ओम गोपाल रावत (नरेंद्र नगर) के लिए छो़ड दी हैं, लेकिन आश्चर्य की बात यह है कि उक्रांद के दोनों प्रत्याशी अपनी पार्टी के निशान पर नहीं, बल्कि भाजपा के निशान पर चुनाव ल़डेंगे. एक करो़ड से अधिक आबादी वाले उत्तराखंड की वर्तमान स्थिति बताती है कि यहां पर सबसे ब़डी समस्या वनों की कटाई और तेज़ी से हाइड्रो इलेक्ट्रो डैमों का निर्माण है, जिसके चलते हिमालय के ऊंचे क्षेत्रों में रहने वाले लोगों के मकान तो़डे जा रहे हैं और उन्हें निचले क्षेत्रों में पलायन के लिए विवश किया जा रहा है.

पंजाब

यहां मतदाताओं की संख्या 1.74 करोड़ है, जिनमें 30 प्रतिशत दलित हैं. यहां 117 सीटों के लिए आगामी 30 जनवरी से चुनाव होने जा रहे हैं. नामांकन पत्र दाख़िल करने की आख़िरी तारीख़ 12 जनवरी है और नाम वापस लेने की आख़िरी तारीख़ 16 जनवरी. यहां 19,724 मतदान केंद्र बनाए गए हैं. चुनाव में हिस्सा लेने वाली पार्टियों में कांग्रेस, भाजपा, बसपा, सीपीआई, सीपीआई (एम), शिरोमणि अकाली दल, शिरोमणि अकाली दल (लोंगोवाल) और पीपुल्स पार्टी ऑफ पंजाब आदि प्रमुख हैं. यहां मुख्य मुक़ाबला अकाली दल-भाजपा गठबंधन और कांग्रेस के बीच है. पिछले चुनाव में अकाली दल ने 49 सीटें हासिल की थीं, जबकि उसकी सहयोगी पार्टी भाजपा को 19 सीटें मिली थीं. कांग्रेस को 44 और आज़ाद उम्मीदवारों को 5 सीटें मिली थीं. पंजाब में किसानों की संख्या सर्वाधिक है. इसलिए हर पार्टी उन्हें लुभाने की कोशिश करती है. पिछले चुनाव में अकाली दल ने पॉवर र्मर का नारा दिया था, लेकिन उसकी तरफ़ सरकार ने कोई ध्यान नहीं दिया. यहां आलू की पैदावार बड़ी तादाद में होती है, लेकिन सरकार की ग़लत नीतियों की वजह से अक्सर आलू की फसल बर्बाद हो जाती है. पंजाब में तक़रीबन 8 लाख रिटायर्ड फौजी हैं, लेकिन कोई भी सरकार उनके लिए कुछ नहीं करती है. इसलिए फौजियों की नुमाइंदगी करने वाले 16 संगठनों ने फैसला किया है कि वे चुनाव का बहिष्कार करेंगे.

– अभिषेक रंजन सिंह

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