संकट में हॉवर्ड की प्रतिष्ठा

दुनिया के सबसे पुराने और प्रतिष्ठित विश्वविद्यालयों में से एक हॉवर्ड विश्वविद्यालय इन दिनों विवादों में घिर गया है. विश्वविद्यालय के दो निर्णयों की दुनिया भर में आलोचना हो रही है. पहला निर्णय तो भारतीय राजनेता एवं अर्थशास्त्री सुब्रह्मण्यम स्वामी को गर्मी के दौरान चलने वाले अर्थशास्त्र के दो पाठ्यक्रमों के शिक्षण से हटा देने का है. ग़ौरतलब है कि सुब्रह्मण्यम स्वामी पिछले कई सालों से हॉवर्ड के समर स्कूल में अर्थशास्त्र पढ़ा रहे थे. स्वामी को वहां से निकालने के पीछे जो तर्क दिया गया है, वह यह है कि उन्होंने एक लेख लिखा, जिसकी वजह से एक ख़ास समुदाय की प्रतिष्ठा धूमिल हुई और उस समुदाय के पवित्र स्थलों को लेकर अपमानजनक और हिंसा भड़काने वाली टिप्पणी की गई. विश्वविद्यालय के शिक्षकों और वहां के कर्ताधर्ताओं की एक लंबी बैठक में गर्मागर्म बहस के बाद यह फैसला लिया गया कि हॉवर्ड विश्वविद्यालय का यह नैतिक दायित्व है कि वह किसी भी ऐसे व्यक्ति या संस्था के साथ न जुड़े, जो किसी अल्पसंख्यक समुदाय के ख़िला़फ घृणा फैलाता हो. विश्वविद्यालय के शिक्षकों के बीच चली बहस में कई लोगों को इस बात पर आपत्ति थी कि स्वामी का लेख अभिव्यक्ति की आज़ादी नहीं, बल्कि घृणा की राजनीति का हिस्सा है, लिहाज़ा हॉवर्ड से स्वामी को हटा दिया जाना चाहिए.

दूसरी अहम बात, जो हॉवर्ड की प्रतिष्ठा को ठेस पहुंचाती है, वह यह है कि विश्वविद्यालय ने ऑक्यूपॉय मूवमेंट के मद्देनज़र हॉवर्ड यॉर्ड को बाहरी गतिविधियों के लिए बंद कर दिया. यह एक ऐसी जगह थी, जहां छात्र, पर्यटक एवं सामाजिक समूह आते थे, बैठते थे, बहस-मुबाहिसे करते थे और चले जाते थे. दशकों से वहां ऐसी परंपरा चल रही थी और हॉवर्ड यार्ड कई आंदोलनों का गवाह भी रहा है, लेकिन आरोप है कि अमेरिका में जारी ऑक्यूपॉय मूवमेंट को रोकने के लिए विश्वविद्यालय ने यह क़दम उठाया.

दरअसल यह पूरा विवाद सुब्रह्मण्यम स्वामी के 16 जुलाई को लिखे एक लेख से शुरू हुआ, जिसका शीर्षक था-हाउ टू वाइप आउट इस्लामिक टेरर. अपने उस लेख में स्वामी ने लिखा कि भारत को एक संपूर्ण हिंदू राष्ट्र घोषित किया जाना चाहिए और वहां उन्हीं लोगों को वोट देने का अधिकार मिले, जो यह ऐलान करें कि उनके पूर्वज हिंदू थे. स्वामी ने अपने लेख में यह भी लिखा कि हिंदू धर्म से किसी भी धर्म में धर्मांतरण की इजाज़त नहीं दी जानी चाहिए. स्वामी इतने पर भी नहीं रुके और अपने लेख में उन्होंने मांग कर दी कि काशी विश्वनाथ मंदिर समेत तीन सौ अन्य स्थानों से विवादास्पद मस्जिदों को हटाया जाए. जब यह लेख प्रकाशित हुआ तो ज़बरदस्त प्रतिक्रिया हुई और पक्ष-विपक्ष में तर्क-वितर्क शुरू हो गया. हॉवर्ड ने भी पहले स्वामी के इस लेख को अभिव्यक्ति की आज़ादी माना और वह उनके साथ खड़ा दिखा. शुरुआत में हॉवर्ड प्रशासन को यह लेख फ्रीडम ऑफ स्पीच की कैटेगरी में दिखाई दिया, लेकिन चंद छात्रों ने स्वामी के ख़िला़फ विश्वविद्यालय में अभियान छेड़ दिया. उस अभियान में इस बात पर जोर दिया गया कि स्वामी ने हॉवर्ड की प्रतिष्ठा को धक्का पहुंचाया है, लिहाज़ा विश्वविद्यालय स्वामी के साथ अपने संबंध ख़त्म करे.

चंद छात्रों की इस मुहिम के आगे विश्व के इस प्रतिष्ठित विश्वविद्यालय ने अपने सदियों पुराने सिद्धांतों से समझौता कर लिया. पहले जो लेख विश्वविद्यालय को फ्रीडम ऑफ स्पीच दिख रहा था, वही लेख चंद छात्रों और दो-तीन वामपंथी रुझान वाले शिक्षकों की अगुवाई वाली मुहिम के बाद घृणा फैलाने वाला लगने लगा. विश्वविद्यालय प्रशासन ने स्वामी के इस लेख को घृणा फैलाने वाला वैसा लेख माना, जो हिंसा के लिए उकसाता है. यह सही है कि हॉवर्ड हमेशा से उस सिद्धांत के तहत काम करता है, जहां विश्व में एक ऐसे समाज की कल्पना की जाती है, जहां पूरी दुनिया की संस्कृतियों के लोग मिलजुल कर रह सकें, लेकिन वहीं हॉवर्ड में अभिव्यक्ति की आज़ादी को सर्वोपरि भी माना जाता है. विश्वविद्यालय की जो फ्री स्पीच गाइडलाइंस हैं, उनके अनुसार, स्वामी के ख़िला़फ लिया गया निर्णय न स़िर्फ अनुचित है, बल्कि ख़ुद हॉवर्ड द्वारा बनाई गईं गाइडलाइंस का उल्लंघन भी है. 15 मई, 1990 को हॉवर्ड में यूनिवर्सिटी फ्री स्पीच गाइडलाइंस तैयार की गईं, जो यह कहती हैं कि अभिव्यक्ति की आज़ादी विश्वविद्यालय के लिए इस वजह से बेहद अहम है, क्योंकि हमारा समूह कारणों और तर्कों पर आधारित डिस्कोर्स की वकालत करता है. अपने विचारों को बग़ैर किसी दबाव के सबके सामने रखना हमारी प्राथमिकता है. किसी भी व्यक्ति के विचारों को दबाना या फिर उसमें काट-छांट करने से हमारी बौद्धिक स्वतंत्रता के विचारों को ठेस पहुंच सकती है. यह किसी व्यक्ति के उन विचारों को भी सामने आने से रोकता है, जो बेहद अलोकप्रिय हों और किसी समुदाय को पसंद न आते हों. साथ ही उस ख़ास समुदाय को भी अपनी आलोचना सुनने के अधिकार से वंचित करता है.

विश्वविद्यालय की गाइडलाइंस में और भी बातें कही गई हैं, जो बहुत ही मज़बूती से विचारों को अभिव्यक्त करने की इजाज़त देती हैं, लेकिन अपनी ही गाइडलाइंस को दरकिनार करते हुए स्वामी को कोर्स से हटा देना कई सवाल खड़े करता है. सवाल तो इस बात पर भी खड़े हो रहे हैं कि सुब्रह्मण्यम स्वामी से इस बाबत कोई सफाई नहीं मांगी गई और न उन्हें अपना पक्ष रखने का मौक़ा दिया गया. दशकों से हॉवर्ड का हिस्सा रहे एक भारतीय विद्वान के साथ इस तरह का व्यवहार बेहद अफसोसजनक है और हॉवर्ड की प्रतिष्ठा के ख़िला़फ होने के साथ-साथ न्याय के प्राकृतिक सिद्धांत के ख़िला़फ भी है. हॉवर्ड में हर तरह के विचारों को जगह मिलती रही है. वहां के कई शिक्षकों ने एशियाई देशों के ख़िला़फ कई आपत्तिजनक लेख लिखे, हिंदू धर्म और देवी-देवताओं के बारे में टिप्पणियां कीं, लेकिन कभी कोई कार्रवाई नहीं हुई. शोध के नाम पर लिखे गए लेखों में भारतीय संस्कृति और सभ्यता की धज्जियां उड़ाई गईं, लेकिन उन सबको अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के आईने में देखा गया, कभी किसी लेखक के ख़िला़फ विश्वविद्यालय ने कोई कार्रवाई नहीं की. छात्रों और शिक्षकों के किसी समूह ने कोई विरोध नहीं किया.

स्वामी ने भी भारत के एक अख़बार में लिखकर अपने विचारों को प्रकट किया है. वह भारत को हिंदू राष्ट्र के तौर पर देखना चाहते हैं तो इसमें ग़लत क्या है. ये उनके व्यक्तिगत विचार हैं और अपने विचार बनाना, उन्हें प्रकट करना हर व्यक्ति का हक़ है. भारत और विदेशों में भी कई ऐसे लोग मिल जाएंगे, जो भारत को हिंदू राष्ट्र के तौर पर देखना चाहते हैं. विवादास्पद मस्जिदों को मंदिर परिसरों से हटाने की वकालत तो भारत का प्रमुख विपक्षी दल भी करता है और यह भारत के एक बड़े समुदाय का मत है. तो अगर स्वामी ने अपना मत ज़ाहिर कर दिया तो क्या गुनाह कर दिया. तीसरी बात स्वामी ने धर्मांतरण के ख़िला़फ कही है, वह भी उनका निजी विचार है और उस पर किसी भी तरह की पाबंदी लगाना जायज़ नहीं कहा जाएगा. आप उन्हें अपने विचारों को प्रकट करने से नहीं रोक सकते, असहमत हो सकते हैं, लेकिन असहमति का दंड लेखक को देना हॉवर्ड विश्वविद्यालय की ख़ुद की गाइडलाइंस और फ्रीडम ऑफ एक्सप्रेशन के सिद्धांत के ख़िला़फ है. हॉवर्ड ने तो स्वामी से बग़ैर कुछ पूछे, बग़ैर उनका पक्ष जाने उन्हें अपने कोर्स से हटा दिया.

दूसरी अहम बात, जो हॉवर्ड की प्रतिष्ठा को ठेस पहुंचाती है, वह यह है कि विश्वविद्यालय ने ऑक्यूपॉय मूवमेंट के मद्देनज़र हॉवर्ड यॉर्ड को बाहरी गतिविधियों के लिए बंद कर दिया. यह एक ऐसी जगह थी, जहां छात्र, पर्यटक एवं सामाजिक समूह आते थे, बैठते थे, बहस-मुबाहिसे करते थे और चले जाते थे. दशकों से वहां ऐसी परंपरा चल रही थी और हॉवर्ड यार्ड कई आंदोलनों का गवाह भी रहा है, लेकिन आरोप है कि अमेरिका में जारी ऑक्यूपॉय मूवमेंट को रोकने के लिए विश्वविद्यालय ने यह क़दम उठाया. इन दो क़दमों से विश्वविद्यालय की अभिव्यक्ति की आज़ादी के समर्थक वाली छवि को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर ठेस पहुंची है, जिसके लिए वह जाना जाता है. ज़रूरत इस बात की है कि विश्वविद्यालय अपनी पुरानी परंपरा की ओर लौटे और विचारों को बेख़ौ़फ होकर अभिव्यक्त करने वालों को मंच प्रदान करे. अंतरराष्ट्रीय जगत को इस बात का इंतज़ार भी है कि हॉवर्ड अपनी ग़लतियों को सुधारे, स्वामी से माफी मांगे और हॉवर्ड यॉर्ड पर लगाई गई पाबंदी को हटाए.

(लेखक IBN7 से जुड़े हैं)