इराक के इरादे नेक नहीं

अमेरिका एवं अन्य पश्चिमी देश मानते हैं कि उनके संयुक्त ऑपरेशन से इराक की आंतरिक दशा पहले की अपेक्षा ठीक हो गई है, लेकिन बीते दिनों वहां हुए धमाकों ने यह संदेश दिया कि इराक के इरादे अब भी नेक नहीं हैं. इसके लिए मुख्य रूप से इराक की अंदरूनी सियासत को ज़िम्मेदार माना जा रहा है, जो अमेरिकी कूटनीति की वजह से पैदा हुई थी. यह अलग बात है कि अमेरिकी नेता और उसके राजनयिक इराकी नेताओं को आपसी तालमेल के ज़रिए मसले को सुलझाने की हिदायत दे रहे हैं, पर हक़ीक़त कुछ और है. तक़रीबन आठ वर्ष बाद इराक से अमेरिकी सैनिकों की विदाई हो गई है, पर यह नहीं लगता कि वहां की दशा सुधरने वाली है. पड़ोसियों से बिगड़े रिश्तों और संक्रमित सामाजिक संरचना ने इराक को धीरे-धीरे उसी राह पर धकेलना शुरू कर दिया है, जो देर से ही सही, पर रसातल की ओर जाती है. ग़ौरतलब है कि पिछले दिनों इराक से आख़िरी अमेरिकी सैन्य टुकड़ी के निकलने की तैयारी के दौरान राष्ट्रपति बराक ओबामा ने कहा कि वाशिंगटन हमेशा अच्छे दोस्त की तरह इराक के साथ खड़ा रहेगा. 2003 में इराक में घुसी अमेरिकी सेना की आख़िरी टुकड़ी बीते 17 दिसंबर को स्वदेश वापस लौटी. 2007 में एक व़क्त ऐसा भी आया, जब इराक में 1,70,000 अमेरिकी सैनिक थे. आठ साल तक चले युद्ध में 4,500 अमेरिकी जवान मारे गए और 32,000 घायल हुए. अरबों डॉलर के इस युद्ध ने अमेरिका में एक राजनीतिक बहस भी छेड़ दी.

अलकायदा अब भी इराक के लिए बड़ी मुसीबत बना हुआ है. 2006 एवं 2007 के भारी ख़ूनख़राबे के बाद सुन्नियों के हिंसक हमलों में कमी आई है, जो अमेरिकी प्रयास से संभव हो सका. सुन्नी उग्रपंथियों और अमेरिका के बीच सहयोग के बाद ही इराक अलकायदा के निशाने पर है. यहां हमले, अपहरण, हत्याएं और धमाके आम बात हैं.

अमेरिका के राष्ट्रपति बनते ही ओबामा ने ऐलान किया कि वह इराक से सेना वापस बुलाएंगे. उसी पर अमल करते हुए उन्होंने इराक से अमेरिकी सैनिकों को वापस बुला लिया. इराकी प्रधानमंत्री नूरी कमाल अल मलिकी के साथ एक साझा प्रेस कांफ्रेंस में अमेरिकी राष्ट्रपति बराक ओबामा ने यहां तक कहा कि आने वाले वर्षों में इराक की अर्थव्यवस्था भारत और चीन से भी ज़्यादा तेजी से बढ़ेगी, इराक फिर से अग्रणी तेल उत्पादक देश बनने की राह पर है. दरअसल, अमेरिका के लिए यही काफी है कि इराक फिर से ख़ुशहाली के दिन देखे. हालांकि इसमें अमेरिका का अपना स्वार्थ है, पर फिलहाल इराक के प्रति अमेरिका की सोच सकारात्मक कही जाएगी. अमेरिकी सेना ने 13 दिसंबर, 2003 को इराक के तत्कालीन राष्ट्रपति सद्दाम हुसैन को पकड़ा और तीन साल बाद उन्हें फांसी पर चढ़ा दिया. सद्दाम को मारने और इराक में अमेरिकी सेना के घुसने पर बहस अब भी होती है. यदि इराक एक सफल राष्ट्र नहीं बन सका तो यह बहस अमेरिका पर भी कई आरोप लगाएगी. इराक अब भी कई चुनौतियों से जूझ रहा है. देश के उत्तरी इलाक़े में कुर्दों की अपनी स्वायत्त सरकार है. कुर्द इलाक़ा ईरान और सीरिया की सीमा से सटा है और तेल संपदा से भरपूर है. इराक उसे अपना बताता है, जबकि कुर्द ख़ुद को इराक से अलग मानते हैं. देश की सुरक्षा एजेंसियां आंतरिक सुरक्षा बहाल रखने में कुछ हद तक सक्षम हैं, लेकिन सीमा को सुरक्षित रखने लायक़ अनुभव और संख्या इराक के पास नहीं है तथा 2020 तक भी इराक अपनी जल, थल एवं वायु सीमा की सुरक्षा करने में सक्षम नहीं हो पाएगा.

अलकायदा अब भी इराक के लिए बड़ी मुसीबत बना हुआ है. 2006 एवं 2007 के भारी ख़ूनख़राबे के बाद सुन्नियों के हिंसक हमलों में कमी आई है, जो अमेरिकी प्रयास से संभव हो सका. सुन्नी उग्रपंथियों और अमेरिका के बीच सहयोग के बाद ही इराक अलकायदा के निशाने पर है. यहां हमले, अपहरण, हत्याएं और धमाके आम बात हैं. देश में दीगर संप्रदायों के लोगों को निशाना बनाया जा रहा है. देश में अब तक लोकतांत्रिक ढांचा भी ठीक से खड़ा नहीं हो सका है. राजनीतिक दलों के आपसी मतभेदों के चलते देश में 2010 से अब तक न तो कोई गृह मंत्री है और न रक्षा मंत्री. ट्रांसपेरेंसी इंटरनेशनल के मुताबिक़, इराक दुनिया का आठवां सबसे भ्रष्ट देश है. आठ साल के युद्ध में क़रीब एक लाख लोगों को गंवाने वाले इराक की सामाजिक स्थिति काफी दयनीय है. क़रीब 25 फीसदी जनता बेहद ग़रीब है, महिलाओं की स्थिति भी अच्छी नहीं है और कट्टरपंथी ताक़तों का प्रभाव बढ़ा है. क़रीब 18 लाख लोग आज भी विस्थापितों की तरह ज़िंदगी गुजार रहे हैं. इसमें कोई शक नहीं कि इराक का भला तेल से ही होगा, लेकिन 2003 से अब तक इराक में तेल उद्योग को लेकर कोई क़ानून नहीं बना. तेल से होने वाली आय को लेकर केंद्र और राज्यों के बीच खींचतान मची हुई है. इराक अगर तेल उद्योग के लिए सही संरचना बना दे तो एक दशक के  भीतर देश में बड़े सकारात्मक बदलाव दिखने लगेंगे.सद्दाम और इराक विरोधी अभियान के तहत अमेरिका ने इराकी जनता के बीच आपसी फूट डाली. सद्दाम हुसैन के दौर में सांप्रदायिक बैर कम था, जबकि शियाओं की अगुवाई वाली सरकार अरब के सुन्नियों को सांप्रदायिक बैर का ज़िम्मेदार ठहराती है. इसके अलावा पड़ोसियों से भी इराक को परेशानी हो सकती है. सीरिया में पिछले नौ माह से प्रदर्शन हो रहे हैं. अगर सीरिया से लोग विस्थापित होकर इराक आए तो बगदाद के लिए भारी मुश्किलें पैदा होंगी. इराक सरकार पर आरोप है कि वह ईरान के शियाओं के प्रभाव में है. इराक़ की मौजूदा अंदरूनी सियासी हालत भी बेहद ख़राब है. राष्ट्रपति, उप राष्ट्रपति और प्रधानमंत्री एक-दूसरे पर तरह-तरह के आरोप लगा रहे हैं. पिछले दिनों बगदाद एवं आसपास के शहरों में जो धमाके हुए, उनके पीछे भी यही सियासी उथल-पुथल है. बहरहाल, हर दृष्टिकोण से बर्बाद हो चुके इराक में फिलहाल सुधार की कोई गुंजाइश नहीं दिख रही है.

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  • Deshbhakt

    बारबाद करने वाला अमेरिका फिर भी अमेरिका की गांड चाट रहे हो होश में आ जाओ अब भी वक़्त है.