महाराष्‍ट्रः बेलगांव पर सियासत गर्म

कर्नाटक सरकार द्वारा मराठी बाहुल्य सीमावर्ती बेलगांव (बेलगाम) की महानगरपालिका बर्खास्त किए जाने को लेकर महाराष्ट्र के सियासी गलियारे में अचानक गर्मी आ गई है. सभी राजनीतिक दलों ने एक स्वर में इस निर्णय की आलोचना करते हुए कर्नाटक सरकार पर मराठीभाषियों का उत्पीड़न करने का आरोप लगाया. यह मुद्दा महाराष्ट्र विधानमंडल के शीतकालीन सत्र में भी उठा. सरकार ने एक बार फिर बेलगांव को महाराष्ट्र में शामिल किए जाने का प्रस्ताव विधानसभा एवं विधान परिषद में सर्वसम्मति से पारित करके केंद्र सरकार को भेजने का फैसला लिया, लेकिन इस मुद्दे ने राज्य के विपक्षी गठबंधन के दो बड़े घटकों यानी शिवसेना और भारतीय जनता पार्टी को एक बार फिर आमने-सामने खड़ा कर दिया है. वहीं महाराष्ट्र नवनिर्माण सेना ने भी कुछ सवाल खड़े किए हैं. ग़ौरतलब है कि मराठी बाहुल्य बेलगांव को लेकर महाराष्ट्र और कर्नाटक के बीच विवाद राज्य गठन के साथ ही शुरू हो गया था. यहां स्थानीय निकाय के चुनावों में अक्सर मराठीभाषी प्रतिनिधियों का वर्चस्व रहता है. अक्सर देखा गया है कि जब भी मनपा की सत्ता मराठीभाषियों के पास आती है तो उसके कामकाज में राज्य सरकार द्वारा अड़चनें पैदा की जाती हैं या उसे बर्खास्त कर दिया जाता है. यह भी आरोप लगाया जाता है कि कर्नाटक के सीमावर्ती गांवों में रहने वाले मराठी वहां दोयम दर्जे के नागरिक बनकर रह गए हैं. वर्ष 2005 के बाद यह विवाद पुन: बेलगांव मनपा को कर्नाटक सरकार द्वारा बर्खास्त किए जाने से सुलग उठा. बीते 10 दिसंबर को कर्नाटक के मुख्यमंत्री सदानंद गौड़ा जब मुंबई में कर्नाटक संघ द्वारा आयोजित कार्यक्रम में भाग लेने मुलुंड स्थित कालिदास नाट्यगृह पहुंचे तो वहां शिवसैनिकों ने उनके ख़िला़फ जमकर नारे लगाए. शिवसैनिक नारे लगा रहे थे कि कर्नाटक सरकार बेलगांव के मराठीभाषियों पर अत्याचार करना बंद करे. शिवसैनिकों के विरोध के चलते सदानंद गौड़ा को पुलिस के घेरे में नाट्यगृह के पिछले दरवाजे से निकल कर कार्यक्रम से जाना पड़ा. उसके दो दिनों बाद ही नागपुर में राज्य विधानमंडल का शीतकालीन सत्र शुरू हो गया, जिसमें शिवसेना के विधायकों ने बेलगांव का मुद्दा उठाया. बेलगांव का मुद्दा राज्य की राजनीति में काफी भावनात्मक माना जाता है. शिवसेना के विधायकों ने विधानसभा में इस मुद्दे को उठाते हुए कर्नाटक सरकार द्वारा बेलगांव के मराठीभाषियों के साथ अन्याय और उनका उत्पीड़न करने की ओर राज्य सरकार का ध्यान आकर्षित किया. इस पर पूरे सदन ने एक स्वर में बेलगांव में मराठियों के साथ हो रहे अन्याय की बात स्वीकार की, लेकिन सदन की विषय सारणी में शामिल न होने के कारण इस मुद्दे पर चर्चा नहीं हो सकी और सदन की कार्यवाही चार बार स्थगित करनी पड़ी.

सरकार ने एक बार फिर बेलगांव को महाराष्ट्र में शामिल किए जाने का प्रस्ताव विधानसभा एवं विधान परिषद में सर्वसम्मति से पारित करके केंद्र सरकार को भेजने का फैसला लिया, लेकिन इस मुद्दे ने राज्य के विपक्षी गठबंधन के दो बड़े घटकों यानी शिवसेना और भारतीय जनता पार्टी को एक बार फिर आमने-सामने खड़ा कर दिया है.

इसके बाद सरकार बेलगांव पर चर्चा कराने के लिए तैयार हो गई. चूंकि बेलगांव मनपा में सत्तारूढ़ दल के पास पूर्ण बहुमत होने के बाद भी उसे बर्खास्त किया गया, इसलिए मुख्यमंत्री पृथ्वीराज चव्हाण ने दोनों सदनों में स्थगन प्रस्ताव रखते हुए कहा कि कर्नाटक सरकार का क़दम संविधान सम्मत नहीं है. इससे बेलगांव वासियों की भावनाओं को ठेस पहुंची है और दोनों राज्यों के बीच तनाव की स्थिति पैदा हो सकती है. सरकार द्वारा सदन में रखे गए स्थगन प्रस्ताव में बर्खास्त शब्द का उपयोग न किए जाने पर शिवसेना के विधायकों ने आपत्ति दर्ज कराई. विधान परिषद में शिवसेना के उपनेता दिवाकर रावते ने नियम 289 के तहत अपना स्थगन प्रस्ताव रखते हुए कर्नाटक सरकार को बर्खास्त करने की मांग की. इस मांग पर भाजपा को छोड़कर लगभग सभी दल एकमत दिखे. उप मुख्यमंत्री अजीत पवार ने कर्नाटक सरकार के खिलाफ कठोर कार्रवाई की मांग की. विशेष बात यह रही कि बेलगांव पर दोनों सदनों में जो प्रस्ताव पारित किया गया, उसका शिवसेना ने बहिष्कार किया.

शिवसेना नेता दिवाकर रावते एवं रामदास क़दम बर्खास्त शब्द को प्रस्ताव में शामिल करने की मांग कर रहे थे. सरकार ने भाजपा के सहयोग से सर्वसम्मति से प्रस्ताव पारित किया. प्रस्ताव में केंद्र सरकार से मांग की गई कि बेलगांव को लेकर कर्नाटक-महाराष्ट्र के बीच जो विवाद सुप्रीम कोर्ट में है, उस पर फैसला आने तक उसे केंद्र शासित क्षेत्र घोषित किया जाए, वहां रहने वाले मराठीभाषियों पर हो रहे अन्याय को रोका जाए, क्योंकि यह मुद्दा महाराष्ट्र की अस्मिता का है.

राज ठाकरे का अंदाज़ अलग

महाराष्ट्र नवनिर्माण सेना के प्रमुख राज ठाकरे का कहना है कि बेलगांव के मराठीभाषियों को कर्नाटक में ही रहना चाहिए, वहां की भाषा सीखकर स्थानीय लोगों से सामंजस्य बनाना चाहिए, जैसा महाराष्ट्र में रहने वाले कर्नाटक और आंध्र के लोग करते हैं. राज ने कहा कि यदि महाराष्ट्र में बेलगांव को शामिल किए जाने पर बेलगांव वासियों की दशा विदर्भ की तरह होनी है तो उसका कर्नाटक में ही रहना उचित होगा. इस मुद्दे पर राज ठाकरे और शिवसेना के कार्यकारी अध्यक्ष उद्धव ठाकरे आमने-सामने हैं.

भाजपा-शिवसेना आमने-सामने

बेलगांव मुद्दे पर एक बार फिर भाजपा और शिवसेना के मतभेद खुलकर सामने आए. शिवसेना जहां दोनों सदनों में पारित प्रस्ताव में कर्नाटक सरकार को बर्खास्त किए जाने की मांग शामिल कराना चाहती थी, वहीं भाजपा ने बेलगांव के मराठीभाषियों के साथ अन्याय-अत्याचार रोकने की मांग का तो समर्थन किया, पर कर्नाटक सरकार को बर्खास्त करने की मांग का विरोध किया, क्योंकि कर्नाटक में उसकी पार्टी की सरकार है. इसके चलते शिवसेना ने दोनों सदनों में प्रस्ताव पारित किए जाने पर बहिष्कार का रास्ता अपनाया, जबकि सरकार ने भाजपा की मदद से प्रस्ताव पारित कर केंद्र सरकार को भेजने की घोषणा कर दी.