महाराष्‍ट्रः चंदे के फंदे में मंत्री

पावर और पैसा आज हर महत्वाकांक्षी व्यक्ति की चाहत है. जिसके पास पावर है, उसके पास पैसे वाले स्वयं चले आते हैं. व्यवसायी, ठेकेदार एवं उद्योगपति पावर के चारों ओर सौर मंडल के ग्रहों की तरह चक्कर लगाते नज़र आते हैं. उनकी निकटता पाकर मंत्री-संतरी भी उनसे अपना उल्लू सीधा करने में गुरेज़ नहीं करते. देश की जिस कंपनी का साम्राज्य जितना बड़ा होता है, राजनेताओं से उसके उतने ही गहरे संबंध होते हैं. कंपनियां अपने हित में पावर को दुहने की खातिर राजनेताओं से संबंध मेंटेन रखने के लिए तोह़फों-चंदों का सहारा लेती हैं और नेता कंपनियों को दुहने के लिए पार्टी फंड एवं अपने सामाजिक कार्यों के नाम पर उनसे चंदा वसूलती हैं. आजकल महाराष्ट्र की राजनीति में मंत्रियों द्वारा कुछ कंपनियों से अपने-अपने सामाजिक संगठनों के नाम मोटी रक़म लेने का मामला चर्चा का विषय बना हुआ है. यह मुद्दा विधानसभा के शीतकालीन सत्र में भी उठा, लेकिन इसे गंभीरता से नहीं लिया गया.

भारतीय जनता पार्टी के नेता एकनाथ खड़से ने कुछ और ख़ुलासे किए. खड़से ने सदन को बताया कि छगन भुजबल के अलावा संसदीय कार्य मंत्री हर्षवर्धन पाटिल और उत्पादन शुल्क (कर) व ग़ैर परपंरागत ऊर्जा मंत्री गणेश नाईक ने भी अपने-अपने ट्रस्टों एवं संगठनों के लिए करोड़ों में चंदा वसूल किया है, जिसके सबूत उनके पास हैं. उन्होंने कहा कि उत्पादन शुल्क मंत्री नाईक के शिव संग्राम ट्रस्ट को पिछले दस वर्षों में करोड़ों रुपये का चंदा मिला. इसी तरह संसदीय कार्य मंत्री पाटिल के शाह जी प्रतिष्ठान को एक दिन में 16 करोड़ रुपये का चंदा दिया गया. खड़से ने पाटिल पर कई नागरी सहकारी बैंकों को कर्ज़ मा़फी का लाभ दिलाने का आरोप भी लगाया.

राज्य के सार्वजनिक निर्माण कार्य मंत्री छगन भुजबल द्वारा इंडिया बुल्स कंपनी से अपने नाम पर गठित भुजबल फाउंडेशन के लिए 2 करोड़ 45 लाख रुपये लिए जाने का मामला विधानसभा का शीतकालीन सत्र शुरू होने से पहले ही अख़बारों की सुर्ख़ियां बन गया. इससे यह सवाल उठ खड़ा हुआ कि मंत्रियों के ट्रस्टों एवं संगठनों द्वारा औद्योगिक कंपनियों से पैसा लेना कितना उचित, कितना नैतिक है? यह सवाल इसलिए उठ रहा है, क्योंकि ईमानदारी से कार्य करने वाले सामाजिक संगठनों को बड़ी कंपनियां कभी घास तक नहीं डालती हैं, लेकिन वे समाजसेवा का ढिंढोरा पीटने वाले नेताओं के पारिवारिक ट्रस्टों एवं संगठनों को करोड़ों रुपये आसानी से दे देती हैं. विधानसभा में इस मामले को उठाते हुए महाराष्ट्र नवनिर्माण सेना के विधायक बाला नांदगांवकर ने कहा कि इंडिया बुल्स कंपनी से सार्वजनिक निर्माण कार्य मंत्री छगन भुजबल के मधुर संबंध होने के चलते उनके कामकाज में संदेह की स्थिति पैदा हो गई है. उन्होंने इतिहास याद दिलाते हुए कहा कि इंदिरा गांधी प्रतिष्ठान के लिए एक लाख रुपये का चंदा स्वीकार करने पर तत्कालीन मुख्यमंत्री ए आर अंतुले को विपक्ष के भारी विरोध के चलते इस्ती़फा देना पड़ा था. उस समय अंतुले से इस्ती़फा देने की मांग करने वालों में शरद पवार भी शामिल थे. विशेष बात यह है कि छगन भुजबल उसी पार्टी के नेता हैं, जिसके मुखिया आज शरद पवार हैं, लेकिन पार्टी ने छगन भुजबल के ख़िला़फ कोई एक्शन नहीं लिया हैं. उन्होंने यह भी आरोप लगाया कि चंदा लेने के बदले में सार्वजनिक निर्माण मंत्रालय द्वारा विकास के कई कार्य उक्त कंपनी को दिए गए.

भारतीय जनता पार्टी के नेता एकनाथ खड़से ने कुछ और ख़ुलासे किए. खड़से ने सदन को बताया कि छगन भुजबल के अलावा संसदीय कार्य मंत्री हर्षवर्धन पाटिल और उत्पादन शुल्क (कर) व ग़ैर परपंरागत ऊर्जा मंत्री गणेश नाईक ने भी अपने-अपने ट्रस्टों एवं संगठनों के लिए करोड़ों में चंदा वसूल किया है, जिसके सबूत उनके पास हैं. उन्होंने कहा कि उत्पादन शुल्क मंत्री नाईक के शिव संग्राम ट्रस्ट को पिछले दस वर्षों में करोड़ों रुपये का चंदा मिला. इसी तरह संसदीय कार्य मंत्री पाटिल के शाह जी प्रतिष्ठान को एक दिन में 16 करोड़ रुपये का चंदा दिया गया. खड़से ने पाटिल पर कई नागरी सहकारी बैंकों को कर्ज़ मा़फी का लाभ दिलाने का आरोप भी लगाया. उन्होंने कहा कि मंत्री पैसे लिए जाने से इंक़ार करते हैं, लेकिन दूसरी ओर कामकाज के बदले कंपनियों से अपने ट्रस्टों एवं संगठनों के नाम पर करोड़ों रुपये वसूल करते हैं. कंपनियां मंत्रियों के ट्रस्टों-संगठनों को बैंक ड्राफ्ट के माध्यम से पैसे देती हैं. अपने पास इसके सबूत होने का दावा करते हुए उन्होंने मुख्यमंत्री पृथ्वीराज चव्हाण से इस मामले की जांच कराने की मांग की. चव्हाण ने यह कहते हुए इस मामले को ख़त्म कर दिया कि अगर ऐसा कुछ हुआ है तो इसकी जानकारी ली जाएगी. बावजूद इसके चंदे के फंदे का मामला यहीं ख़त्म नहीं हुआ है. इस पर बहस शुरू हो गई है.

राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि सभी बड़ी कंपनियों से नेताओं के मधुर संबंध रहते हैं. जिन कंपनियों के मंत्रियों से संबंध नहीं होते,  उनके प्रोजेक्ट्‌स की फाइलें आसानी से आगे नहीं बढ़ती हैं. हर मंत्री के किसी न किसी कंपनी के अध्यक्ष या प्रबंधन से मधुर संबंध रहते हैं. कंपनियों से मधुर संबंध होने का फायदा मंत्री एवं उनके घर वाले किसी न किसी रूप में उठाते हैं. कोई अपने पुत्र-पुत्रियों को कंपनी में डायरेक्टर बनवा देता है तो कोई शेयर होल्डर हो जाता है. इसके अलावा मंत्री अपनी पार्टी को फंड दिलाते हैं तो कई अपने ट्रस्टों एवं संगठनों के लिए चंदे में मोटी रक़म वसूल करते हैं. यह काम स़िर्फ राजनेता ही नहीं करते, बल्कि कई ऊंचे पद पर बैठे अफसरशाहों द्वारा भी कंपनियों से येन-केन-प्रकारेण लेनदेन किया जाता है. यहीं से भ्रष्टाचार की शुरुआत होती है. व्यापार जगत में बिना उद्देश्य कोई लेनदेन नहीं होता, लेकिन कोई भी सरकार इस विषय को गंभीरता से नहीं लेती. वजह यह है कि इन बड़ी कंपनियों से सभी दलों के वरिष्ठ नेताओं के संबंध होते हैं. भाजपा के वरिष्ठ नेता स्वर्गीय प्रमोद महाजन के अनिल अंबानी से मधुर संबंध होने की चर्चा कई बार हो चुकी है. राकांपा नेता शरद पवार की पुत्री एवं दामाद के लवासा कॉरपोरेशन और डी बी रियलटी जैसी कंपनियों से संबंध होने की बातें सामने आ चुकी हैं. इंडिया बुल्स में कई बड़े नेताओं के शेयर होल्डर होने की बातें जब-तब उठती रहती हैं. आख़िर कुछ न कुछ बात ज़रूर होगी, तभी तो चर्चा हो रही है.

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