मलेशिया : इब्राहिम आरोपमुक्त नजीब को कड़ी चुनौती

मलेशिया के पूर्व उप प्रधानमंत्री एवं प्रमुख विपक्षी नेता अनवर इब्राहिम को अपने पुरुष सहायक के साथ यौन संबंध बनाने के आरोप से मुक्त कर दिया गया है. कुआलालंपुर हाईकोर्ट के न्यायाधीश जबिदीन मोहम्मद दियाह ने कहा, हालांकि न्यायालय को इस बात का शत-प्रतिशत भरोसा नहीं है कि मामले से संबंधित डीएनए रिपोर्ट के साथ कोई छेड़छाड़ की गई है, लेकिन इब्राहिम को इस मामले में दोषी नहीं ठहराया जा सकता. न्यायालय का कहना था कि यह एक यौन अपराध का मामला है और ऐसे मामलों में अप्रमाणित साक्ष्यों के आधार पर सजा नहीं सुनाई जा सकती. ग़ौरतलब है कि इब्राहिम पर अपने पूर्व सहायक मोहम्मद सैफुल बुखारी अजलान के साथ अप्राकृतिक यौन संबंध बनाने का आरोप था. मलेशियाई क़ानून के अनुसार, ऐसे अप्राकृतिक यौन संबंध साबित होने बीस साल तक की सज़ा हो सकती है. न्यायालय इतनी कड़ी सज़ा अप्रमाणित साक्ष्यों के आधार पर नहीं दे सकता. मलेशिया में इस तरह के अपराध के लिए बहुत कम लोगों को सज़ा हो पाती है, क्योंकि पुख्ता प्रमाण जुटाना थोड़ा मुश्किल होता है. इब्राहिम पर पहली बार इस प्रकार का आरोप नहीं लगा है. इससे पहले भी उन पर अप्राकृतिक यौन संबंध का आरोप लगा था. उस समय उनका जुर्म पहली बार में साबित हो गया था और उन्हें 9 वर्ष की सज़ा सुनाई गई थी, लेकिन बाद में उन पर लगे आरोप की समीक्षा की गई और फिर उन्हें 2004 में रिहा कर दिया गया.

पचास सालों से शासन कर रही यूएमएनओ के ख़िला़फ उनका अभियान जारी है और वह लगातार प्रधानमंत्री नजीब पर हमला कर रहे हैं. हालांकि नजीब भी शासन में कई सुधार करके जनता को अपनी ओर करने की कोशिश कर रहे हैं. नजीब ने आपातकालीन आदेशों, जिसके अनुसार किसी को भी गिरफ्तार किया जा सकता था, को रद्द कर दिया. साथ ही उन्होंने जनता को कई और सुधारों का भरोसा दिलाया है.

इस बार न्यायालय उस तरह की ग़लती दोहराना नहीं चाहता था, इसलिए उसने साक्ष्यों की प्रामाणिकता की अच्छी तरह जांच की और जब उसे लगा कि यह काफी नहीं है तो इब्राहिम को रिहा कर दिया गया. इब्राहिम पर भ्रष्टाचार के भी आरोप लगे थे, जिसके लिए उन्हें 6 वर्ष की सज़ा सुनाई गई थी. चूंकि अनवर इब्राहिम एक राजनीतिक व्यक्ति हैं और मलेशिया के प्रमुख विपक्षी नेता भी, इसलिए इस मुक़दमे के फैसले पर सबकी नज़र टिकी हुई थी. पक्ष और विपक्ष दोनों पर फैसले का प्रभाव पड़ना लाज़िमी था. अगर इब्राहिम का जुर्म साबित हो जाता तो उन्हें बीस साल तक की सज़ा हो सकती थी. ऐसा होने पर उनके राजनीतिक जीवन का अंत हो जाता. इससे सत्ता पक्ष को भी नुक़सान होता. अनवर एवं उनकी पार्टी के लोग शुरू से कहते आ रहे थे कि यह आरोप राजनीति से प्रेरित है. अगर फैसला अनवर के विरुद्ध आता तो विपक्षियों का आरोप कुछ-कुछ साबित होता दिखता और 2013 में होने वाले चुनाव के दौरान प्रधानमंत्री नजीब रज़ाक को इस बारे में सफाई देनी पड़ती. उम्मीद इस बात की भी है कि मलेशिया में चुनाव इसी साल हो सकते हैं.

इब्राहिम का कहना है, खुदा का शुक्र है कि न्याय की जीत हुई और मैं निर्दोष ठहराया गया. सच तो यह है कि मैं थोड़ा हैरान हूं. इस फैसले ने यह साबित कर दिया है कि मलेशिया की न्यायपालिका अभी सही तरीक़ से काम कर रही है. सत्ता पक्ष भी इस अवसर को खोना नहीं चाहता. सूचना मंत्री रायेस यतिम ने कहा कि यह फैसला साबित करता है कि देशमें न्यायाधीशों को निष्पक्ष तरीक़े से काम करने का अधिकार है और सरकार न्यायपालिका के कामों में कोई हस्तक्षेप नहीं करती है. पूर्व प्रधानमंत्री महातिर मोहम्मद ने कहा कि हालांकि फैसले से आश्चर्य हुआ, लेकिन इससे यह साबित होता है कि इब्राहिम पर लगाया गया आरोप राजनीति से प्रेरित नहीं था और न सरकार उनके विरुद्ध कोई षड्‌यंत्र कर रही है. फैसले से सत्ता पक्ष को बचाव का मौक़ा तो मिल गया, लेकिन यह नहीं कहा जा सकता कि सरकार इब्राहिम के ख़िला़फ किसी भी प्रकार का कोई षड्‌यंत्र नहीं कर रही है. यह आरोप इब्राहिम के सहायक द्वारा लगाया गया था. कहा जा सकता है कि ऐसा करने के लिए उसे कोई प्रलोभन दिया गया हो. अगर मलेशिया सरकार को अपनी निष्पक्षता साबित करनी है तो उसे इस बात की जांच करानी चाहिए कि आख़िर इब्राहिम के विरुद्ध यह षड्‌यंत्र किसने किया है यानी इसके पीछे किसका हाथ है. न्यायालय के फैसले को आधार बनाकर सरकार यह साबित नहीं कर सकती कि इस मामले में उसकी कोई भूमिका नहीं है.

ग़ौरतलब है कि अनवर इब्राहिम मलेशिया के प्रमुख विपक्षी नेता हैं और अगले चुनाव में उनकी जीत की उम्मीद जताई जा रही है. वह महातिर मोहम्मद के कार्यकाल में उप प्रधानमंत्री थे, लेकिन बाद में वह उनकी सरकार के सबसे बड़े आलोचक बन गए. इब्राहिम छात्र जीवन से ही राजनीति से जुड़े हैं. वह मुस्लिम स्टूडेंट ऑर्गेनाइजेशन के अध्यक्ष रहे और उन्होंने 1974 में भूख और ग़रीबी के ख़िला़फ प्रदर्शन किया था, जिसके चलते उन्हें जेल भी जाना पड़ा. जब वह महातिर मुहम्मद के नेतृत्व वाली पार्टी यूनाइटेड मलइज नेशनल ऑर्गेनाइजेशन (यूएमएनओ) में शामिल हो गए तो उनके समर्थकों को काफी निराशा हुई. महातिर की सरकार में वह कई विभागों में मंत्री रहे. बाद में वह मलेशिया के उप प्रधानमंत्री भी बने और उन्हें महातिर मोहम्मद के उत्तराधिकारी के रूप में देखा जाने लगा, लेकिन जब इब्राहिम ने सरकार की आर्थिक नीति का विरोध किया और शासन में सुधार की बात उठाई, तो उनका विरोध होने लगा. वह पार्टी में भाई-भतीजावाद के विरोधी थे. महातिर मोहम्मद से अनबन होने के बाद उन पर भ्रष्टाचार का आरोप लगा, जो साबित हुआ और उन्हें 6 साल की सज़ा हुई. बाद में उन पर अप्राकृतिक यौन संबंध बनाने का आरोप लगा और 9 साल की सज़ा हुई, लेकिन समीक्षा के बाद उन्हें 2004 में रिहा कर दिया गया. जब चुनाव के लिए अयोग्य क़रार दिए जाने की समय सीमा समाप्त हो गई तो वह फिर राजनीति में आ गए और 2008 के उपचुनाव में उन्होंने जीत हासिल की. इसी दौरान उनके सहायक ने उन पर अप्राकृतिक यौन संबंध बनाने का आरोप लगा दिया, जिस पर 2010 से सुनवाई चल रही थी.

पचास सालों से शासन कर रही यूएमएनओ के ख़िला़फ उनका अभियान जारी है और वह लगातार प्रधानमंत्री नजीब पर हमला कर रहे हैं. हालांकि नजीब भी शासन में कई सुधार करके जनता को अपनी ओर करने की कोशिश कर रहे हैं. नजीब ने आपातकालीन आदेशों, जिसके अनुसार किसी को भी गिरफ्तार किया जा सकता था, को रद्द कर दिया. साथ ही उन्होंने जनता को कई और सुधारों का भरोसा दिलाया है. इब्राहिम समर्थकों की संख्या भी कम नहीं है. रिहाई के व़क्त उनके तीन-चार हज़ार समर्थक अदालत के बाहर मौजूद थे. उसी समय एक विस्फोट भी हुआ, जिसका लाभ इब्राहिम को मिल सकता है. आगामी चुनाव में प्रधानमंत्री नजीब रज्ज़ाक का सीधा मुक़ाबला इब्राहिम से है. अगर इब्राहिम ने समय का सही उपयोग किया और भ्रष्टाचार एवं भाई-भतीजावाद आदि को मुद्दा बना लिया तो उन्हें सफलता मिल सकती है. मलेशिया में आगामी सरकार किसकी होगी, यह तो दोनों दलों की रणनीति पर निर्भर करता है. सरकार विरोधी भावनाओं को इब्राहिम उभार पाते हैं या नजीब सुधारों का भरोसा दिलाकर जनता को अपने पक्ष में करने में सफल होंगे, यह तो समय बताएगा, लेकिन इतना तय है कि इस बार टक्कर कांटे की होगी.

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