देश में गठबंधन की राजनीति और राजनीतिक दलों का एक साथ मिलकर चुनाव लड़ना कोई नई बात नहीं है, लेकिन 60 सदस्यीय विधानसभा वाले मणिपुर में, जहां आगामी 28 जनवरी को मतदान होना है, गठबंधन का ऐसा खेल खेला जा रहा है, जो आपको हैरत में डाल सकता है. अब तक गठबंधन प्राय: उन्हीं दलों के बीच होता रहा है, जिनमें थोड़ी-बहुत वैचारिक समानता हो, लेकिन मणिपुर में चुनाव पूर्व गठबंधन की ऐसी खिचड़ी पक रही है, जो आपको आश्चर्यचकित कर सकती है. फिलहाल मणिपुर में मुख्यमंत्री ओकराम इबोबी सिंह के नेतृत्व में कांग्रेस की सरकार है. पिछले विधानसभा चुनाव में कांग्रेस यहां सबसे बड़ी पार्टी बनकर उभरी थी. उस चुनाव में कांग्रेस को 30, मणिपुर पीपुल्स पार्टी (एमपीपी) को 5, भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी एवं एनसीपी को 4-4, आरजेडी एवं नेशनल पीपुल्स पार्टी को 3-3 और निर्दलीय उम्मीदवारों को 10 सीटें हासिल हुई थीं. इस बार गठबंधन की जो तस्वीर उभर कर सामने आई है, उसमें राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी (एनसीपी), जनता दल यूनाइटेड और भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी ने मणिपुर पीपुल्स पार्टी के साथ मिलकर चुनाव लड़ने का ऐलान किया है. हालांकि इस गठबंधन में राष्ट्रीय जनता दल (आरजेडी) के भी शामिल होने की बात कुछ समाचार माध्यमों के ज़रिए सामने आई है.
सबसे हैरत भाजपा प्रवक्ता प्रकाश जावड़ेकर के उस बयान पर हो रही है, जिसमें उन्होंने कहा कि भाजपा मणिपुर पीपुल्स पार्टी के साथ मिलकर चुनाव लड़ेगी और प्रदेश में विकास व सांप्रदायिक एकता को समर्पित सरकार बनाएगी.
सबसे हैरत भाजपा प्रवक्ता प्रकाश जावड़ेकर के उस बयान पर हो रही है, जिसमें उन्होंने कहा कि भाजपा मणिपुर पीपुल्स पार्टी के साथ मिलकर चुनाव लड़ेगी और प्रदेश में विकास और सांप्रदायिक एकता को समर्पित सरकार बनाएगी. ख़ैर गठबंधन की ऐसी अस्पष्ट तस्वीर शायद ही किसी दूसरे राज्य में देखने को मिले, जैसी मणिपुर में देखने को मिल रही है. एक तऱफ जदयू का कहना है कि एमपीपी के साथ उसका गठबंधन है, जिसमें एनसीपी और सीपीआई भी शामिल हैं. दूसरी तऱफ भाजपा का भी दावा है कि एमपीपी के साथ उसका गठबंधन है. अगर भाजपा और जदयू की बात मान लें तो यह एक ऐसा गठबंधन होगा, जिसमें भाजपा की धुर विरोधी पार्टियां यानी सीपीआई और एनसीपी उसके साथ शामिल होंगी. हालांकि मणिपुर में भाजपा का कोई ख़ास वजूद नहीं है, क्योंकि पिछले चुनाव में वह एक भी सीट नहीं जीत पाई थी. फिलहाल मणिपुर की जो हालत है, उसमें विपक्षी पार्टियों की क़वायद और मणिपुर पीपुल्स पार्टी के साथ गठबंधन करने की होड़ के चलते एक अनार सौ बीमार वाली कहावत चरितार्थ हो रही है.
उधर मणिपुर के लोगों में मौजूदा कांग्रेस सरकार के ख़िला़फ कुशासन और भ्रष्टाचार को लेकर काफी गुस्सा देखा जा रहा है. ख़ासकर आतंकवाद और जातीय दंगों के अलावा 100 दिनों से अधिक समय तक चली आर्थिक नाकेबंदी के दौरान जनता को काफी परेशानियों का सामना करना पड़ा. इस वजह से कांग्रेस सरकार की छवि काफी ख़राब हुई. ग़ौरतलब है कि सदर हिल्स ज़िला मांग समिति (एसएचडीडीसी) की ओर से कुकी जनजाति बहुल सदर हिल्स इलाक़े को पूर्ण ज़िले का दर्जा दिए जाने की मांग को लेकर पिछले एक अगस्त से आर्थिक नाकेबंदी शुरू की गई थी, जिसका नगा समुदाय ने विरोध किया. तीन माह तक चली इस आर्थिक नाकेबंदी के दौरान लोगों को पेट्रोल, रसोई गैस और दवा जैसी आवश्यक वस्तुओ का घोर अभाव झेलना पड़ा. ज्ञात हो कि मणिपुर पूर्ण रूप से बाहर से आने वाली रसद-सामग्री पर निर्भर है. इस लिहाज़ से मणिपुर में होने वाला विधानसभा चुनाव इस बार काफी दिलचस्प हो सकता है. विपक्षी पार्टियों का आरोप है कि मौजूदा कांग्रेस सरकार जनता की बुनियादी समस्याएं हल कर पाने में पूरी तरह नाकाम रही है.
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